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# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Sunday, 30 June 2019

"दूसरा शनिवार" की मासिक गोष्ठी लंबे अंतराल के बाद 29.6.2019 को पटना में फिर आरम्भ

मूल्यों के स्थान पर प्रतिरोध और नए मूल्य गढ़ने की कोशिश
सुनील श्रीवास्तव की कविताओं में समय में घटित हो रही घटनाओं पर छटपटाहट

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दूसरा शनिवार की गोष्ठी लेखक कम, मित्रों से अधिक गुलजार होती है। गाँधी मैदान में गाँधी मूर्ति के पास मिले आठ महीने से अधिक की अवधि बीत चुकी थी और इस बीच हमारी गोष्ठी-स्थल का हाल बुरा हो चला था। नारियल के पेड़ सूख चुके थे, कहें तो जल गए थे। उनकी बची-खुची हरियाली आशा जरूर जगाती थी, पर यह भी कह रही थी कि अब वे प्राथमिकता में नहीं रहे। जमीन पर घास कहीं-कहीं नजर आ रही थी और नलों की टोंटी से पानी का आना बंद हो चुका था। अपनी गोष्ठी-स्थल की यह हालत देख कर सभी साथी चिंतित थे।

इस गोष्ठी में आदित्य कमल, अरुण नारायण, अमीर हमजा, राजेश कमल, समीर परिमल, प्रेम कुमार, प्रशांत विप्लवी, शशांक मुकुट शेखर, डॉ. विजय प्रकाश, श्याम किशोर प्रसाद, श्रीधर करुणानिधि, अरविंद पासवान, सुधीर सुमन, प्रत्यूष चंद्र मिश्रा और नरेंद्र कुमार आमंत्रित कवि सुनील श्रीवास्तव को सुनने के लिए उपस्थित हुए।

प्रत्यूष चन्द्र मिश्रा ने आमंत्रित कवि सुनील श्रीवास्तव का परिचय देते हुए सीधे उन्हें कविता-पाठ के लिए आमंत्रित कर लिया। कवि द्वारा ‘तोहफा’, ‘खुदकुशी’, ‘लड़कियों सुनो’, ‘जादू’, ‘जादू उनकी जुबान का’, ‘दिन वे लौट आते मगर’, ‘यकीन’, ‘कल सुबह’, ‘याद रखना’, ‘चावल से ककड़ियाँ चुनते हुए’, ‘समय उसके इशारे पर चलता था’, ‘रोजमर्रा’ एवं ‘जरूरी काम’ शीर्षक से कविताएं सुनाई। श्रोताओं के चेहरे पर अच्छी कविताओं को सुनने का सुकून स्पष्ट देखा जा सकता था… कवि का श्रोताओं के साथ सीधा संवाद हो रहा था। पढ़ी गयी कवितायें जीवन के हर पहलू का स्पर्श कर रही थीं और उनमें अंतर्निहित संघर्ष, प्रतिरोध, उम्मीद सभी स्पष्टता से मौजूद थीं।

अब कवि की रचनाओं पर बात होनी थी। सुधीर सुमन ने अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि जिस व्यक्ति से अंतरंगता हो और कविताओं को कई-कई बार सुना जा चुका हो तो कहना आसान नहीं होता। उन्होंने कहा कि सुनील श्रीवास्तव अच्छे अध्येता हैं। रचनाओं को पढ़ते हुए उनकी संतुलित आलोचना करते हैं। वे कविताओं में दूर की कौड़ी लाने की बात नहीं करते हैं। उनकी कविताओं में अपने समय से टकराव दिखता है। उनकी कवितायें वोकल नहीं हैं, बल्कि वह कविता में ही अंतर्निहित होती है।

कवि की रचनाओं पर बात को आगे बढ़ाते हुए राजेश कमल कहते हैं कि कविताओं को पहली बार सुनते समय यही लगा कि वे आसानी से बड़ी बात कह जाते हैं। कवि अगर कविता बुनने, गढ़ने-रचने में भाषा का धनी है तो वह चमत्कार भी दिखा सकता है। सुनील श्रीवास्तव चमत्कार न दिखाकर अपने आस-पास की चीजों से ही बिंब बनाते हैं। कवि को सुनना हमारी उपलब्धि है।

डॉ. विजय प्रकाश चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जोड़ते हैं कि कवि की अधिकांश कविताओं में प्रेम है और प्रेम से कवितायें शुरू होती हैं। मूल्यों के स्थान पर प्रतिरोध है और वे नये मूल्य गढ़ने की कोशिश करते हैं। कविताओं में विवरण है, पर कवितायें उससे ही उत्पन्न होती हैं। ‘चूक’ कविता को इंगित करते हुए उन्होंने कहा कि कविता वहीं तक है जब कवि अजगररूपी ऑफिस के बॉस को देखकर खरगोश की तरह आँखें मूँद लेने की बात कहता है। कवि की ढिठाई है कि वह मौका मिलते ही उसे मारने की सोचता है। यह तो गोदान के पात्र हीरा की तरह का व्यवहार होगा। समग्र रूप में कवि की कविताएं अच्छी हैं।

श्रीधर करुणानिधि ने कहा कि सुनील श्रीवास्तव की कविताओं में विवरण भी नयी अर्थवत्ता देती हैं। कविताओं में प्रेम, उसके छलावे तथा जीवन के दुख-दर्द हैं। उन्होंने कई खास घटनाओं पर कवितायें लिखी हैं… ‘खुदकुशी’ एक ऐसी ही कविता है जिसमें कवि बताना चाहते हैं कि जीवन ऐसा क्या, जिसमें हलचल-अवरोध न हो।

आदित्य कमल चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि पूरी कविताओं में एक स्वर है, प्रवाह है तथा वे जीवन से जुड़ी हुई हैं। उनकी कविताओं में समाज और जीवन से जुड़ाव है। हाँ, छटपटाहट को विस्तार नहीं मिल पाता है। ‘खुदकुशी’ कविता में यह सीमा दिखती है। कवितायें दिल के नजदीक हैं और उनमें बनावटीपन नहीं। आज के परिदृश्य में जब स्थापित कवि खुलकर सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ नहीं आ पाते हैं। नई पीढ़ी नये बिंबों, नई अर्थचेतना के साथ सामने आ रही है। कवि तो अपने ही प्रतिमानों का भी काउंटर करता है। ये सामाजिक रूप से सचेत कवि हैं।

अरुण नारायण अपने पिछले अनुभव को बताते हुए कहते हैं कि उन्होंने ‘जनपथ’ के माध्यम से कवि की कविताओं के साथ हिंदी कविताओं पर उनके रिव्यू को पढ़ा है, जिसमें समाज-बोध एवं इतिहास-बोध है। अपने समय में घटित हो रही घटनाओं पर छटपटाहट दिखती है और वे रियेक्ट करते हैं। साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का औज़ार मानते हैं। उनकी पृष्ठभूमि आरा की है, जिसकी परंपरा में मधुकर सिंह, चन्द्रभूषण तिवारी आदि आते हैं। वैसे आरा में फ़र्जी साहित्यकारों का भी समूह है, जिसने साहित्यिक परिवेश को गंदा ही किया है। मैं ‘दूसरा शनिवार’ की टीम को सुनील श्रीवास्तव को आमंत्रित करने के लिए बधाई देता हूँ।

प्रशांत विप्लवी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि कवि दृश्यों का अवलोकन बारीकी से करते हैं और उन्हें शब्द भी देते हैं। कविताओं को पढ़ते हुए कवि को रेफरेंस नहीं देना चाहिए। इस पर अन्य मित्रों ने भी सहमति जताई।

सभी मित्रों की इच्छा थी कि ‘दूसरा शनिवार’ की गोष्ठियां आवर्ती रूप से आयोजित होती रहें ताकि हमारा संवाद बना रहे और नये रचनाकारों से हमारा साक्षात्कार हो। हमने शीघ्र मिलने का वादा किया। अंत में नरेन्द्र कुमार द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया।

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आलेख - नरेन्द्र कुमार
छायाचित्र - दूसरा शनिवार
लेखक का साइट - http://aksharchhaya.blogspot.com/
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com













  









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