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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@yahoo.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Tuesday, 31 July 2018

एक लड‌की सोचती है : रोहित ठाकुर की कविताएँ /Hindi Poems of Rohit Thakur with English translation

कविता /Poem- 1 
 एक लड़की सोचती है / A girl thinks
रोहित ठाकुर /  Rohit Thakur



एक लड़की सोचती है 
 दुनिया इस लिये बदरंग है
क्योंकि उसके  लाल
 नीले और गुलाबी रंग की 
रीबन खो गयी है 
A little girl thinks
That this world is faded 
Since she has lost
Her ribbons coloured Red
Blue and pink


एक लड़की सोचती है 
माँ के माथे की बिंदी 
के खो जाने से
सूरज कम लाल उगता है 
A girl thinks 
That if her mother
Loses the bindi on her forehead
And this is why
The sun rises with less redness


एक लड़की सोचती है 
उसके फ्राॅक पर टंके सितारों
के टूटकर गिरने से 
उसके पिता की हँसी खो जाती है 
A girl thinks 
That if the stars studded on her frock
Is broken
Her father loses his laughter

एक लड़की सोचती है 
रोटी के बारे में 
और चाँद के साथ 
आँख मिचौली खेलती है.
A girl thinks 
About her bread 
And plays hide and seek
With the moon.

     
कविता / Poem -2
प्रेम

उन दोनों के बीच प्रेम था 
पर वह प्रत्यक्ष नहीं था
उन दोनों ने एक दूसरे को कई साल फूल भेजे 
एक - दूसरे के लिये कई नाम रचे 
There was love between both of them
But that was not direct
Both sent flowers to each other for years
Called out each other by numerous names

वे शहर बदलते रहे और एक दूसरे को याद करते रहे
वे कई-कई बार अनायास चलते हुए पीछे मुड़कर देखते थे
उन्होंने कई बार गलियों में झांक कर देखा होगा
They changed their cities but remembered each other
Many a time they stalled and turned back 
Just to take a glimpse of each other 
Many a time they must have peeped into the streets

फिर कई सदियाँ बीती 
वे दोनों पर्वत बने
पिछली सदी में वे बारिश बने 
इतना मुझे यकीन है 
इस सदी में वे ओस बने
फिर किसी सफेद फूल पर गिरते रहे   
Many centuries past after that
Both of them became mountains
And turned into rainfall in last century
I am sure that 
In this century they became dewdrops
And kept dripping on some white flowers.
...........
कवि /Poet  - रोहित ठाकुर / Rohit Thakur
कवि का ईमेल / E-mail of the poet-  rrtpatna1@gmail.com 
Translated into English by - hemant Das 'Him'
E-mail: editorbiharidhamaka@yahoo.com

कवि का परिचय:
नाम  रोहित ठाकुर 
जन्म तिथि - 06/12/ 1978
शैक्षणिक योग्यता  -   परा-स्नातक राजनीति विज्ञान
विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित , विभिन्न कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ 
वृत्ति  -   सिविल सेवा परीक्षा हेतु शिक्षण  
रूचि : - हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य अध्ययन 
पत्राचार :- जयंती- प्रकाश बिल्डिंग, काली मंदिर रोड
संजय गांधी नगर, कंकड़बाग , पटना-800020, बिहार 
मोबाइल नंबर-  9570352164
कवि - रोहित ठाकुर / Poet- Rohit Thakur

Monday, 30 July 2018

काव्य सम्मेलन :कला जागरण और सामयिक परिवेश द्वारा पटना में 29.7.2018 को सम्पन्न - प्रेमनाथ खन्ना स्मृति समारोह

तामीरे-मुहब्बत से मैं बाज न आऊँगी /  तुम शहर जलाओगे मैं शहर बसाऊँगी




युवा कवि-कवयित्रियों में सिर्फ ऊर्जा ही नहीं विचारों की ताजगी भी होती हैं इसलिए जिस काव्य सम्मेलन में युवा लोग रहते हैं वहाँ श्रोताओं की भीड़ का इकट्ठा हो जाना लाज़मी है. एक ऐसी ही कवि गोष्ठी हाल ही में हुई जो यादगार बन गई. संचालन कर रहे थे डॉ. रामनाथ शोधार्थी और अध्यक्ष थे कासिम खुरशीद.

कला जागरण एवं सामयिक परिवेश की ओर से प्रेमनाथ खन्ना स्मृति समारोह के अंतर्गत कालिदास रंगालय, पटना में 29.7.2018 को एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में  कवि-कवयित्रियों ने भाग लिया.  युवाओं की भागीदारी सबसे अधिक रही. श्रोतागण में अच्छी संख्या में उपस्थित थे और कविताओं पर तालियाँ बजाकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे. पूरा सभागार वाहवाह और तालियों से गुंजायमान रहा. काव्य गोष्ठी के आरम्भ में दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन हुआ और फिर ममता मेहरोत्रा और समीर परिमल द्वारा सम्पादित यात्रा संस्मरण "सफर... ज़िंदगी की तलाश" का लोकार्पण किया ग्या. सभा में बिहार पुलिस एसोशिएअशन के मृत्युंजय कुमार सिंह और अभिषेक प्रकाशन के प्रकाशक भी थे.

केशव कौशिक ने तीन सुंदर छवियों से अपनी कविता की निर्मिती बताई-
तुम मेरी आभा, मेरी ज्योत्सना, मेरी सरिता हो
तुम मेरी कविता हो

युवा कवि को अपनी आवाज उठाते देख वहाँ मौजूद युवा कवयित्री नेहा नारायण सिंह ने अपनी आवाज और ज्यादा बुलंद कर दी-
अब आवाज बुलंद कर चल पड़े हैं हम 
इन्हें दबाने वाला तू होता है कौन?

ऐसे माहौल में कौशिकी मिश्रा ने देश के बच्चों को पैदाईशी गरीब कहने पर अपना आक्रोश जता देना उचित समझा-
एक बच्चा बस बच्चा कहलाता है
उसकी तकदीर में गरीबी नहीं होती

डॉ. रामनाथ शोधार्थी परिंदों के नीचे उतारने का एक जादू किया- 
मैंने काग़ज़ पे लिख दिया था दरख़्त
सब परिंदे उतर के बैठ गये

सुंदर सुरीले कंठ के स्वामी युवाकवि सूरज ठाकुर बिहारी ने भी प्रेम में बहुत कुछ देखा-
प्रेम खामोश एक कहानी है
प्रेम से रूह की जवानी है

नीतेश सागर ने अपनी शायरी को मयखाना बना दिया-
मैं खुली इक किताब हो जाऊँ
तू पिये तो शराब हो जाए

शराब की चर्चा होते ही अक्स समस्तीपुरी इश्क की गहराई में डूब गए-
आँख पलकों के बीच ऐसी है
जैसे दरिया हो साहिलों के बीच

सभा को इश्क के नशे में डूबता देख  खुरशीद अनवर ने सब को सम्भाला और व्यक्तित्व को उठाने की बात की-
हथेली की लकीरों को मिटाकर
मैं अपना कद बढ़ाना चाहता हूँ

शादिया नाज़ ने भी प्रतिज्ञा कर डाली कि सारे जलनेवाले शहरों को बसा डालेंगी-
तामीरे-मुहब्बत से मैं बाज न आऊँगी
तुम शहर जलाओगे मैं शहर बसाऊँगी

विकास राज भी देश के लिए अपनी जान देने हेतु तत्पर दिखे-
तू ऐसी जिन्दगी देना मुझे मेरे मौला
मैं जो मर जाऊँ कफन में मेरे तिरंगा हो

लता प्रासर का कहना था कि उन पर चाहे कितनी भी नजरें टिके लेकिन उनकी बेकरारी कुछ और है-
नजरें कई टिकी थी मेरी सरगोशियों पर
बेकरार हुई मैं तेरी राह तकते तकते

अमीर हमज़ा युवा हास्यकवि हैं जिन्हेंं थोड़ा और निखरना है दहेज पर करारा व्यंग्य करते हैं- 
आलिया जैसी काया हो दहेज मिले भरपूर
चाहे उसका चेहरा हो लंगूर की तरह

प्राची झा अभी किशोरावस्था में ही हैं लेकिन दिमाग इतना प्रबुद्ध है मुहब्बत की राह को बखूबी जानती हैं.
तुमसे ज्यादा प्यारी हो ऐसी कोई चाह नहीं
मुहब्बत जैसी बेतुकी शायद होगी राह नहीं

प्रियंका ने अपने पलों को आफताब बना डाला-
ख्वाबों की जानिब तराशा है जिसे
वो पल वो मंजर सब आफताब हो रहे

सुनील कुमार ने अपनी महबूबा के प्रति प्रतिबद्धता को दिखा कर खुद को सुरक्षित कर लिया-
प्यार में यार हम आपके ही रहे रहगुजर में रहे फ़ासले ही रहे

अंत में अध्यक्श कासिम खुरशीद  ने अपनी बेहतरीन गज़लों का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया-
वो बेखबर हैं अभी ज़लज़लों की फितरत से
जो पेड़ कटाकर दुनिया बसाते रहते हैं.

इसके पश्चात अध्यक्ष की अनुमति से सभा का समापन हुआ.
................
आलेख- हेमन्त दास 'हिम' /  लता प्रासर
छायाचित्र- विनय कुमार
ईमेल- editorbiharidhamaka@yahoo.com
नोट- कृपया सुधार, तथ्यों को जोड़ने आदि हेतु दिये गए ईमेल पर सम्पर्क करें और फेसबुक, व्हाट्सएप्प आदि पर कमेंट भी कर सकते हैं.













































Saturday, 28 July 2018

Rang Gurukul staged "Seema Par" in Premnath Khanna Smriti Samaroh on 27.7.2018 in Patna

Humanity has no borders



A soldier too have a heart and a killer of enemies can be a heartiest friend as well. The play "Seema Paar" authored by Mamta Mehrotra dissects the myth of eternal hostility beyond two borders. A woman belonging to some country  is seen in a deranged condition with a doll in her hands by the guards of the border of another country. One of the soldiers firstly have a doubt over the woman whether she is a spy of enemy and so think to finish her life. But the other come forward in her protection and says that this woman is helpless and must be  safeguarded as this would be befitting to the pride of his country.  And even facing the anguish of his own colleagues he brings that lunatic woman inside the village and provides shelter to her. The soldier has a humanly sympathy towards the woman and tries his best to provide all kinds of friendly support. The woman gradually becomes normal but the neighbors are still suspicious about her. 

One day when some goons attacks an innocent teenager girl this woman stands like a pillar against the miscreant and warns them not to move ahead with their malafide  intentions. But even after this one of them attacks the woman with a knife. This brave woman snatches the knife from that man and kills her. Others flee away. Now the people in the area begin to respect her.

In an evening that soldier who had given shelter to the woman comes to her and conveys that he is set to leave the place as he has been transferred to somewhere else. That woman is shocked and feels helpless again. But then the old villager comes and assures that she can happily stay in the village as her livelihood is the responsibility of this village now. The soldier and the woman feels the pangs thinking about separation and ultimately the soldier who is still a bachelor promises to marry her and both hugs each other.

The happy ending of the play was the characteristic of this eventful story in which happenings of the instances were rich and most important. In other words we can say that the writer is visible in every movement of the character from the very beginning to the the end. 

The begonning of the show with heavy firing across the border and the realistic sound effect created a situation as if the viewer were themselves sitting on the line of control on Indo-Pak border. The viewers were stupefied and remained so for tens of minutes. Ujjwala Ganguli in the role of woman, the main character was successful in presenting the different aspects of the struggle of a woman. When she is not ready to part with the doll to the nurse and it's only after the assurance of the soldier of enemy country when she is ready for that, has been enacted with full sensitiveness. The friendly talk with the lunatic woman to the soldier never reaches a stage when it can be said as a romance, this is purely a human bond and this is the grit and poise of the director who could present this delicate phase of their lives in a genuine manner.  The soldier (main character) acted well and so where his friends. Narendra Kumar in the role of the old villager did justice with the role. 

The actors other than Ujjwala Ganguli will have to work more on their respective roles to make them more impressive though they undoubtedly acted well.   Having said that, this would not be irrelevant to mention that the play did reflect some tinge of formula stories. But the special thing was that it succeeded in showing the soft aspect of humanity with has actually no borders. The writer Mamta Mehrotra, and director Gunjan Kumar must be praised for this. The other villagers also acted well. 

To keep the minute sensitivity of an events based play was the biggest task of the drama-artists and they succeeded in it to the farthest extent. 
 ........................
Review by - Hemant Das 'Him' / Samir Parimal
Photographs by - Binay Kumar
email : editorbiharidhamaka@yahoo.com
Note: Name of the actors and the artists may be provided to include in this report. Send the names of artists and feedback on this article through email ID as provided above.