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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@yahoo.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Sunday, 21 August 2016

बिहार के कुछ चर्चित कवि (Some Hindi Poets of Bihar recently in limelight)

All photos are clicked on 21.8.2016 in the studio of Doordarshan,  Patna.
From Left to Right- Hemant 'Him', Sri, Samir 'Parimal', Smt.Mamta Mehrotra,, Sri Shahanshaah Alam, Sri Sidheshwar Pd, Sri Shiv Narayan, Smt. Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh

From Left to Right- Hemant 'Him', Sri, Samir 'Parimal', Smt.Mamta Mehrotra,, Sri Shahanshaah Alam, Sri Sidheshwar Pd, Sri Shiv Narayan, Smt. Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh

From Left to Right- Sri Shmbhu P. Singh, Smt. Shiv Narayan, Sri Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh, Sri Sidheshwar Pd, Sri Shahanshah Alam, Sri Samir Parimal and Sri Hemant 'Him'

From Left to Right-  Sri Shahanshah Alam, Sri Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh and Sri Samir Parimal

From Left to Right-  Sri Shahanshah Alam, Sri Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh 

From Left to Right-  Sri Sidheshwar Prasad, Sri Shahanshah Alam, Sri Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh and Sri Samir Parimal


From Lelft to Right- Sri Shiv Narayan, Sri Bhagwat Animesh, Sri Sidheshwar Pd, Sri Shahanshah Alam, Sri Samir Parimal, Smt. Shiv Narayan and Sri Shambhu P. Singh


Monday, 25 July 2016

Aryan Patra-2 (आर्यन पात्रा-2)

Aryan Patra is pride of Bihar & Jharkhand. 
His father Binod Patra works in Income Tax Deptt. and is also a national champeon in weightlifting for 17 years in a row. 







Saturday, 16 July 2016

Scenes of Bidhichan and other play (बिधिचन और एक अन्य नाटक के दृष्य)

ये नाटक कालिदास रंगालय, पटना में 10-15 जुलाई,2016 को मंचित किये गये.
(कृपया और जानकारी देने हेतु ईमेल से hemantdas_2001@yahoo.com पर सम्पर्क करें.














Monday, 11 July 2016

Srijan Sangati Patna ki Kavya Gosthi ( सृजन संगति पटना की काव्य-गोष्ठी दिनांक 11.7.2016)

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सृजन संगति, पटना के तत्वावधान में एक काव्य-गोष्ठी का अवर अभियंता भवन, अदालतगंज, पटना में 11 जुलाई को सम्पन्न हुआ जिसमेंं न सिर्फ शहंशाह आलम, शिवनारायण, राजकिशोर राजन, हेमन्त दास 'हिम' , सुजीत वर्मा , वासवी झा समेत पटना के वरिष्ठ और चर्चित कवियों ने भाग लिया बल्कि समकालीन हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर दिल्ली से आये हुए नित्यानंद तथा दुमका से आये हुए अशोक सिंह ने भी सुशोभित किया. अध्यक्षता की डॉ. रानी श्रीवस्तव ने की तथा संचालन हृषिकेश पाठक ने किया. 

नित्यानंद ने दिल्ली और जे.एन.यू. के संस्मरणों को सुनाते हुए अनेक समकालीन  कविताएँ पढ़ी. कुछ बानगी 
प्रस्तुत है-"मैं बेचने के लिए नहीं लिखता/ बिक गया तो लिख नहीं पाऊँगा",
 "मैं पतझड़ में वसन्त लिख रहा हूँ",
"जीते जी मरते रहना/ और मर कर जी जाने में बड़ा अन्तर होता है"
"तुम अपने देवता के साथ रहो/ कवि अपने साहस के साथ रहेगा"
"गरीब इस देश का सबसे बड़ा योद्धा होता है/ और उसके लड़ने में होती है वीर रस की सबसे बड़ी कविता"
  
फिर राष्ट्रीय स्तर की तमाम प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं जैसे वागर्थ, हंस, आजकल आदि में इन दिनों छा जाने वाले वरीय कवि और समालोचक श्री शहंशाह आलम ने अनेक संदेशपूर्ण, सरल और प्रभावकारी कविताओं के द्वारा अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे. यथा-
"मैंं अपनी ही खिड़की खोलता हूँ"
"पुनर्जन्म की कथा के बारे में"

उनके बाद वासवी झा ने स्त्री विषयक मजबूत कविताओं का पाठ किया..उदाहरण स्वरूप-
स्त्री शीर्षक कविता-"वह कोमल है/ स्नेहस्पर्ष को आतुर/ नहीं /कहाँ मिलेगी  कोमलता"
"इच्छा होती है अपने माँ-बाप की नाजायज औलाद"

हेमन्त दास 'हिम' ने 'कविता क्या है' शीर्षक कविता पढ़ा-
"एकत्र किये की सजावट कविता नहींं/ 
कविता है/ पारे की तरह बिखड़े हुए कणों को समेटने के प्रयास में पुन:एक-एक कण के छिटकाव की रामकहानी
और आँखों में तैर रहे अखण्डत्व का/ आँखों देखा हाल"

 कवि सुजीत वर्मा ने शब्दों के माध्यम से विद्रोह का बिगुल बजा डाला-
कविता के विरुद्ध/ हमारी सत्ता की दुखती रगों से टकराने लबी है./ आज की कविता बायीं ओर थोड़ा झुक कर चलती है/

गणेश बागी ने 'सड़्क'  शीर्सक कविता सुनाई-
"बार-बार पेड़ कुचली जाती है/ सड़्क सच्ची प्रतिनिधि है इस देश की

वरीय कवि राजकिशोर राजन ने 'अंत नहीं अनंत' शीर्षक की तथा अनेक प्रभावकारी कविता सुनाई.

गोष्ठी के संचालक हृषिकेश पाठक ने बिहार में शराबबन्दी से उपजे  सकारात्मक सामाजिक बदलाव पर प्रकाश डालते हुए बड़ी मार्मिक कविता सुनाई-
"वह हरिया के पास कभी नहीं गई/ पर दारू की दरिंदगी में चार बच्चे आ गए"

फिर  'नई धारा' नामक प्रतिष्ठित पत्रिका के सम्पादक और वरिष्ठ कवि शिवनारायण ने 'टीशन वाली स्त्री' शीर्षक कविता सुनाई जो एक सुंदर स्त्री के शारीरिक सौंदर्य पर ध्यान खींचकर अचानक उसके ममत्व पर ध्यान लाकर टिका देती है. दूसरी कविता में उन्होंने एक खास पुलिस अधिकारी के अनोखे साहित्यकारिता के तरीकों पर प्रकाश डाला.

इसके बाद इस गोष्ठी के महत्वपूर्ण आकर्षण अशोक सिंह जो दुमका से आये थे, ने पारिवारिक प्रेम और विश्वास पर आधारित कविताओं का वाचन कर पूरे माहौल को भावपूर्ण कर दिया. बानगी देखिये-
"माँ, मैं ताबीज नहीं पहनता/ मैं तुम्हारा विश्वास पहन रहा हूँ"
"घर की बोझ नहीं होती बेटियाँ/  बल्कि ढोती है घर का सारा बोझ"/
उनके होने से बनी रहती है ताजी घर की हवा"
"मुझे ईश्वर नहीं तुम्हारा कंधा चाहिए"

अंत में अध्यक्षा डॉ. रानी श्रीवस्तव ने 'प्रश्नवाचक' शीर्षक भावपूर्ण कविता सुनाई जो नारी के संघर्ष पर आधारित थी.-
"अब जबकि सब कुछ खत्म हो चुका है/ करीब-करीब"
 यह कवि गोष्ठी सार्थक समकालीन कविताओं को सीधे-सीधे वाचन के द्वारा पहुँचाने का माध्यम बनने में पूरी तरह सफल रही. कभी तो व्यवस्था और सामाजिक मूल्योंं के अवमूल्यन पर स्तब्ध कर देनेवाली कविताओं ने सन्नाटा उत्पन्न कर श्रोताओं के दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख दिया तो कभी इतना जोश भर दिया कि अच्छी संख्या में उपस्थित श्रोतागण करतल ध्वनि से सभास्थल को गुंजायमान करने से स्वयं को रोक नहीं पाये.
(The  writer of this article does not claim the perfection of this write-up in terms of it's content. You are welcome to suggest improvements. Send your suggestion  to hemantdas_2001@yahoo.com,/ facebook ID- Hemant Das Patna )












दैनिक जागरण, पटना जागरण सीटी, 12.07.2016


Friday, 8 July 2016

'O Kavita Ki'' and 'Mukharit Samvedanayean' '(ओ कविता की' :कवि- गणेश झा एवम 'मुखरित सम्वेदनाएँ' :कवयित्री-किरण सिंह)

पुस्तक का नाम- ओ कविता की?
रचनाकार-श्री गणेश झा
विधा- छन्दबद्ध पद्य
भाषा- मैथिली
प्रकाशन- निघण्टू प्रकाशन, पटना-18
मूल्य- रु. 225 
श्री गणेश झा छन्द्कला के सिद्धस्त तो हैं ही उनकी कविताएँ काफी सन्देशपूर्ण तथा भावपूर्ण होने के साथ-साथ देश और दुनिया से जुड़ी हुई भी हैं,
कुछ दृष्टांत प्रस्तुत है-
"खाउ जत्ते अछि क्षुधा, मुदा
मोछ्मे नहि लागि जाय
लुटबाक अछि जे लुटि लिअ
रखाबार जा नहि जागि जाय" (1)

"दैहिक,दैविक,भौतिकता केर
दुख-सुखमे तन मन गेल मथा
सम्पूर्ण जीवनक अभिनयमे
सुख मात्र एकटा लघु कथा" (2)

काव्यक परिभाषा सँ फराक
कोइली नहि भाखय जेना काक
जे कथ्य कथानक गद्य जेना
कहबै हम ओकरा पद्य कोना" (3)






...........................................

पुस्तक का नाम- मुखरित सम्वेदनाएँ
रचनाकार- (श्रीमती) किरण सिंंह
विधा-  पद्य
भाषा- हिन्दी
प्रकाशन- वातायण मीडिया एण्ड पब्लीकेशन प्राइवेट लि.,फ्रेजर रोड, पटना
मूल्य- रु. 125 
कवर डिजाइन- रवि गुप्ता 
शब्द संयोजन- संजय प्रजापति

किरण सिंंह उन सभी भारतीय गृहिणी महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती हैं जो मान लेती हैं कि घर-गृहस्ती में खो जाने के बाद व्यक्तिगत रचनाधर्म समाप्त हो जाता है. बड़ी ही ईमानदारी से इन्होंने लिखा है कि अठारह वर्ष की आयु में विवाह होने के बाद घर की जिम्मेदारियों के कारण पहले तो उन्हें कविता लिखने का मौका नहीं मिला परंतु जैसे ही बच्चे बड़े हुए इनमेंं रचनाधर्म पुन: जाग उठा और इन्होंने यह कविता-संग्रह रच डाला. इसमेंं मुक्तक और छ्न्दबद्ध दोनो तरह की कविताएँ हैं. कुछ बानगी देखिये-
"ये तेरे
नयनो का भेदन
मन्त्र मुग्ध हैं
कर सम्भाषण
पलकों से करत लड़ाई
क्या प्रिय तुमको लाज न आई."(1)

"उर भाव जुड़े कविता की तरह 
बहे निर्झर सरिता की तरह
लहर लेखनी चूम कदम
फहराती सत्य ध्वज रण मेंं
लेकर स्मृतियों को मन में" (2)










Thursday, 7 July 2016

Pandeji Ke Patara - a stage performance (पाण्डे जी के पतरा - नाटक का मंचन)

Played at Kalidas Rangalaya /  Patna on 07.07.2016 / Language: Maghi
Directed by Kumar Manav / Written by Abhimanyu Prasad Maurya
Presented by Ahsas Kalakriti, Patna (Bihar, India)

Folk arts including the dialectical literature can not be discounted absolutely in view of it's hold and understanding of region-specific social ailments. The play 'Pandeji Ke Patara' makes a direct assault on the menace of superstition pervading in the parochial set up of typical Magadh area. The priest christened as Pandeji is able to manage a great influence on the superstitious populace of his area by creating havoc about ominous effects of disobedience to astrological propositions. And he is able to earn a good amount of money by terrifying the meek people referring to religious quotes. Ultimately when he reveals the actual vapidity of these religious announcements the whole things become clear. The fact he uttered before his own son becomes eye-opener to the people at large.

Performance was marvelous and the director, playwright, actors all did their job well. Shri Abhimanyu Pd. Maurya is a veteran writer of Maghi and some nine books have been published from him. He is a professor in Patna and this play has already been published by the title 'Pandeji ke Patara'. He also told that approx. one hundred shows of the play has been performed mostly in interior areas of Our applauds to him and the whole team of Kumar Manav.

Actors were Sarvind, Kumar Manav, Sunita bharti, Bijay Kr. Sinha, Om Kapoor, Aparajita Nath, Ashwani Kumar, Prithwiraj Paswan, Bhuwaneshwar Kumar.
(Send suggestion to hemantdas_2001@yahoo.com)











Tuesday, 5 July 2016

Vote for Aryan Patra - our pride in dance (आर्यन पात्रा को वोट करें -नृत्य कला में हमारी शान)

(View Count -119 till last update)

Click here to go to Aryan Patra's (dance prodigy) facebook profile

Hello frnds

If you want to see me perform again in ‪#‎sytycd‬ (click here)

Then pls vote for me 
Voting lines are open till tomorrow 10am
Miss call- 7877200112
Sms ARY to 57575
From one sim you can do 200 votes 
.....
Hello guys 
Because of u all i m in top 8 now
Thnku so much 💜
Love u all

















Accident - a play (एक्सीडेंटृ - एक नाटक)

नाटककार: शम्भू पी.सिंंह
कालिदास रंगालय, पटना
06.06.2016

(Photos: Courtesy: Dharmesh Mehta and Shambhu P. Singh)