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# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Saturday, 4 January 2020

इंद्रधनुषी कविताओं का मेला साहित्य कला संसद बिहार द्वारा 29.12.2019 को पटना में आयोजित - सिद्धेश्वर की डायरी

कविता मनुष्यता की मातृभाषा है

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साल को गुडबाय कहता हुआ, नए  साल के भव्य स्वागत में, पटना के साहित्यकारों ने जश्न-ए-बहार मनाया इन्द्रधनुषी कविताओं के माध्यम से। साहित्यिक संस्था साहित्य कला संसद के बैनर तले कड़कती ठंड में भी पचास से अधिक कवियों और लगभग उतनी ही संख्या में प्रबुद्ध श्रोताओं (जो अक्सर साहित्यिक आयोजनों में अपवाद ही बने रहते हैं) की गहमागहमी पटना के कालिदास रंगालय में देखने को मिली।

इस बार भी हमारी संस्था भारतीय युवा साहित्यकार परिषद् ने जब अलविदा साल और नए साल के स्वागत में गोष्ठी की तारीख रखी तब साहित्यिक मित्र पंकज प्रियम ने मेरे  फोन पर अपने आयोजन की जानकारी देते हुए मुझे आमंत्रित किया और काव्य पाठ के साथ साथ मेरी कविता पोस्टर प्रदर्शनी को इसी समारोह में समायोजित करने का प्रस्ताव रखा। हम करें या पंकज प्रियम। पटना में हमारे लगभग वही साहित्यकार मित्र हैं जो उनके!ऐसे में दो या चार  संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में भी आयोजन करना श्रेयस्कर हो सकता है। हमारे  दिग्गज साहित्यकार ऐसा करते रहे हैं। खैर, अंततः मैं अपनी संस्था का कार्यक्रम रद्द कर इस संगोष्ठी में सह भागीदार बना। 

साहित्य कला मंच की ओर से आयोजित इस सारस्वत समारोह के मुख्य अतिथि, वरिष्ठ कथाकार कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे आयोजन की सार्थकता को रेखांकित करते हुए कहा कि "इस तरह का कार्यक्रम हमें जीवन और जगत को निरपेक्ष ढ़ंग से देखने का संदेश देता है। यह कविताओं का इन्द्रधनुषी मेला और इसमें कविता के ढेर सारे रंगों ने हम सबको सराबोर कर दिया है।"

कविता के संदर्भ में उन्होंने कहा कि "कविता भाषा में आदमी होने की तमीज ही नहीं, बल्कि कविता आत्मा और मनुष्यता की मातृभाषा है। मेरे लिए अंतस की असह्य अकुलाहट की अभिव्यक्ति है।"   
   
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ समालोचक डॉ. शिवनारायण ने कविता की जीवंतता के संदर्भ में कहा कि  "कविता हमें अपने समय और समाज की संवेदना से जोड़ कर एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देती है। इसलिए कविताओं से साल की विदाई और स्वागत का यह आयोजन अनूठा है।"

साहित्य कला संसद के अध्यक्ष और इस समारोह के संयोजक डॉ. पंकज प्रियम ने कहा कि -" इन्द्रधनुषी कविताओं के इस मेले में सभी विचारधाराओं के कवियों का समागम हुआ है जिन्होंने अपनी- अपनी शब्द साधना से मानवता की सीख समाज को दी है।.

कविता मेले में कई पीढ़ियों के कवियों की हिस्सेदारी रही। इस इन्द्रधनुषी कविताओं के मेले में भगवती प्रसाद द्विवेदी, शिवनारायण, संजय कुमार कुंदन, शहंशाह आलम, निविड़ शिवपुत्र, विजय गुंजन, अश्विनी कविराज, डॉ. सीमा रानी, सुमन चतुर्वेदी, मो मोईन, विभा कुमारी, कुमारी मेनका, प्रभात कुमार धवन, सीमा रानी, सिंधु कुमारी, गौरी गुप्ता, विजय प्रकाश, रश्मि गुप्ता, घमंडी राम समेत चालीस से ज्यादा कवियों की जबरदस्त काव्य प्रस्तुति हुई। ठंड भरे मौसम में भी इस मेले में गर्मजोशी रही। । मिलकर, कविताएं सुन-सुनाकर मुझे भी इतना आनंद आया कि लगा बीतते साल ने जाते-जाते अमूल्य सौगात दे दी है। हलाकि आए हुए कवियों में कुछ ऐसे महान कवि भी थे जिन्हें मंच पर जगह नहीं मिली तो वे बिना काव्य पाठ किए ही चुपचाप घिसक गए। और कई और भी ऐसे कवि थे जो आमंत्रित कवियों में अपना नाम और काव्य पंक्तियां देकर भी अनुपस्थित रहे। बावजूद इसके "रेडिमेड तैयार न्यूज" की वजह से और पत्रकार बंधु की कृपा से उन अनुपस्थित कवियों का नाम अखबार में प्रकाशित हुआ और कई उपस्थित कवियों का नाम न छपने की भी विवशता भी बनी रही।

अध्यक्ष डॉ शिवनारायण की ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ यूं थी- 
"ग़म का क्या उपचार नहीं है
लोगों में किरदार नहीं है
ऊपर ऊपर क्या  पढ़  लोगे
जीवन यह अखबार नहीं है
हम रिश्तों में जीनेवाले
कोई भी दीवार नहीं है
जो खुशियों पर ताला जड़ दे
ऐसी  भी  सरकार  नहीं  है
'शिव' को यह मालूम हुआ है
जीना यह दुश्वार नहीं है।"
...... 
"कदम कदम पर लाखों छल
भीड़  बहुत  है  धीरे  चल
सारे खत को खोले हम
शायद कोई निकले हल।"
(-शिवनारायण)

इतने विविधतापूर्ण आयोजन की पूरी सफलता कवि सम्मेलन के संचालन पर निर्भर करता है जिसकी जिम्मेवारी बखूबी निभाई युवा कवयित्री  रश्मि गुप्ता ने। अपने मधुर और सशक्त संचालन के दौरान ही रश्मि गुप्ता ने काव्य पाठ भी किया -
"जिनके जीवन में कोई हमसफर नहीं होता।
 उनका तो लोगों सकूं से सफर नहीं होता।"

संजय कुमार कुंदन की यह नज़्म ठेठ उर्दू भाषा समझने वालों के लिए ख़ास लज़्जतदार रही -
"ये एक अजीब दौर है / खिंजां रसीदा नख्ल है
 मगर है शोरे फसले गुल / कसीदें पढ़ रहे सभी
वो बारिशों की शाम में!"

विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचासीन कवि शहंशाह आलम की समय संदर्भित एक समकालीन कविता का पाठ किया, जिसमें लोग अर्थ तलाश रहे थे-
"भय को मैंने भगाया / शत्रुओं को चेतावनी मैंने दी
गहरे मौन को  स्वर मैंनें दिया / तोतों को मैंनें पुकारा
अदृश्य घर को दृश्य मैंने दिया!"

गीतकार विजय गुंजन का गीत श्रोताओं को खूब भाया-
"साँस-साँस में यति-गति-लय है
यह जीवन है छंद ,
विना छंद के हम निबंध हैं
कवि तो अब हैं चंद।
अनुशासन में रह कर ही हम
सबकुछ कर सकते हैं,
निर्जीवन में सुकर सौर्य -बल
अतुलित भर सकते हैं ।
यति-गति-लय में नियत नियंत्रण,
 से- अग-जग गतिमय है,
इनके विना उपग्रह-ग्रह - भू-अम्बर
समझो क्षय है।"
   
आयोजक संस्था साहित्य कला संसद बिहार के अध्यक्ष कवि पंकज प्रियम ने सुनाया -
 "हिंदु हैं, सिक्ख हैं, ईसाई हैं,  मुस्लिम हैं
जो कुछ भी हो / एक साथ है
लोग खून को चाहते हैं पतला बनाना/
किंतु हम अस्तित्व में घनत्व में एक हैं।

 "कवयित्री सुधा सिन्हा ने नए वर्ष के संदर्भ में काव्य पाठ किया -
"नव वर्ष का प्रणाम करते हैं!
हर दिन का सलाम करते हैं!!
जिन्दगी खुशियों से भरी रहे
यही तो कलाम पढ़ते हैं!"

कवि सिद्धेश्वर ने नए वर्ष की शुभकामनाएं देते हुए सकारात्मक संदर्भों को रेखांकित करते हुए अपनी एक नई कविता प्रस्तुत की -
" कितना बुरा बीता पिछला वर्ष
     इसका पश्चाताप करने से
     क्या दुःख भरे जीवन में
     जाग उठेगा, उत्साह और हर्ष?
             अतीत की कब्र पर बैठकर
              जी भर आंसू बहाने के बदले
               वर्तमान की कर्मभूमि पर
                क्यों न रोपें /उम्मीदों के बीज ?
  ताकि फिर से जाग उठे नए सपनें
  खिल उठे मुरझाया हुआ जीवन!
  सुख-समृद्धि से हो मिलन !
  नए साल में, महके-चहके तेरा उपवन!"

कवयित्री मधुरानी की कविता में ग़ज़ब की कशिश थी-
"न  कुछ  कहा, न  इकरार  किया
बस दिल ने कहा और प्यार किया।
जाने  कौन से  बंधन  में बँध  कर
अंतर्मन  ने  तुम्हें  स्वीकार किया।"

एक मधुर गीत का पाठ किया सिंधु कुमारी ने-
"सूरज को क्षितिज पर
बुला रही वो कौन है?"

श्रोताओं ने नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर विजय प्रकाश के गीतों की भूरि भूरि प्रशंसा की -
 "खट्टी-मीठी यादें देकर हायन अंतर्ध्यान हो रहा
यहीं कहीं तुम छिपी हुई हो ऐसा रह-रह भान हो रहा।
सपना देखा है मैंने इक, सपना यह सच हो जाए,
तुम मेरे गीतों की गरिमा, मैं तेरी मुसकान हो रहा।"
उन्होंने  वर्ष को संबोधित करते हुए कहा -
"मुट्ठी से रेत जैसी
पल-पल फिसल रही हैं
ये सांस, उम्र, घड़ियाँ-
कैसे इन्हें संभालूँ?
शायद न वश में अपने
इसके सिवा बचा कुछ
कि साथ-साथ तेरे
कुछ और दूर चल लूँ,
कुछ और गीत गा लूँ!
नववर्ष तुम मना लो
मैं हर्ष में नहा लूँ

 हिंदी गजल की एक विशेषता यह भी है कि वह सीधे तौर पर श्रोताओं के हृदय में समा जाती है जैसा कि मशहूर शायर ऋतुराज राकेश ने अपनी रचना से उदाहरण प्रस्तुत किया -
"मुझको   कैसी   बीमारी   है  तुम्हीं कहो
जागते   शब   गुजारी   है    तुम्हीं  कहो। 
करके  वादे  न  आये  सर-ए-बज़्म  क्यों
आज   कैसी   लाचारी   है   तुम्हीं  कहो?
हम  तुम्हारी  तरफ  जो  बढ़े  दो   कदम
भूल   क्या   ये   हमारी  है   तुम्हीं  कहो।
जाम नज़रों   से  मैंने  पीया  था  कभी
आज  तक  क्यूं  खुमारी  है  तुम्हीं कहो?
उम्र   भर   साथ   देने   का  अरमान  है
ये  क्या  गलती   हमारी  है  तुम्हीं  कहो।
हमसफ़र मैं तुम्हारा  हूँ  और  हमनशीन
मैंने  हिम्मत  क्या  हारी  है  तुम्हीं  कहो।
हिज्र की शब क़यामत सी मुझको लगी
रात  तुम पर भी  भारी  है तुम्हीं कहो।
तुम  अना वाले  हो  और  मैं  खुद्दार हूँ
बाजी  किसने  यूं  हारी  है  तुम्हीं कहो।
पूछता  है   ऋतुराज   क्या   है   सबब
अश्क़  क्यूं  आज  जारी है तुम्हीं कहो।"

समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर निविड़ शिवपुत्र ने आधुनिक बोध की कविता प्रस्तुत की -
" हैप्पी न्यू ईयर / माफ करना /
खरीदी हुई कामनाएँ / नहीं भेज पा रहा हूं मित्र 
क्या इन सारे शब्दों में 
मेरी शुभकामनाओं को जिंदा कर सकोगे
कि नया वर्ष तुम्हें  / नया आकाश दें ?"

आयोजक के अनुरोध पर राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध रेखाचित्रकार सिद्धेश्वर ने इस इंद्रधनुषी कविता मेला में अपनी कविता पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई। जिसे दर्शकों और उपस्थित कवियों में उपरोक्त कवियों के अतिरिक्त राजकिशोर राजन, मनीष राही, ऋतुराज राकेश, अश्विनी कविराज, मधु वर्मा, सिंधु कुमारी, संजय कु. कुंदन और युवा कवयित्री रश्मि गुप्ता समेत सैंकड़ो लोगों ने खूब सराहा।

कविता पोस्टर प्रदर्शनी की विस्तृत रपट, डायरीनामा के रुप में, पचास से अधिक फोटो के साथ अलग से आपके सामने प्रस्तुत करुंगा। 
..................

आलेख - सिद्धेश्वर
प्रस्तुति सहयोग - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र -  सिद्धेश्वर
रपट के लेखक का ईमेल-  sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com
नोट - जिन कवियों का जिक्र छूट गया हो, कृपया तुरंत ऊपर दिये गए सम्पादक के ईमेल आईडी पर अपनी कविता की चार पंक्तियों के साथ शीघ्र भेजने का कष्ट कीजिएगा। उसे इस रपट में जोड़ दिया जाएगा




























Monday, 30 December 2019

रामवृक्ष बेनीपुरी और धर्मवीर भारती की जयंती पर चर्चा और काव्यपाठ पटना में सम्पन्न -

बेनीपुरी रथ का टूटा हुआ पहिया थे और धर्मवीर भारती अतिप्रसिद्ध  'अंधा युग" के रचयिता

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रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने देश प्रेम, त्याग की महत्ता, साहित्यकारों के प्रति सम्मान भाव दर्शाया है, वह अविस्मरणीय है। वहीं धर्मवीर भारती की कविताओं कहानियों और उपन्यासों में प्रेम और रोमांस के तत्व स्पष्ट रुप से मौजूद है।"

मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग की ओर से आयोजित जयंती समारोह में "बेनीपुरी के शब्दचित्र तथा धर्मवीर के भावोत्कर्ष:एक विश्लेषन" विषय पर, संस्था के  निदेशक इम्तियाज अहमद करीमी ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया।

बिहार राज्य अभिलेख भवन में आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डां रामदेव प्रसाद ने कहा, "रामवृक्ष बेनीपुरी को अंधकार के खिलाफ रौशनी की तलाश के लिए  सतत बेचैन साहित्यसेवी के रुप में याद करना अधिक सही होगा। बेनीपुर विलक्षण व्यक्तिव के थे, जिन्होंने जीवन की बहुरंगी धाराओं को समेटकर आगे बढ़ने मे विश्वास रखा।"

(हालालँ कि किसी के व्यक्तिगत कार्य पर अपनी उंगली उठाना, कुछ अजीब- सा जरुर लगता है। लेकिन जब हम किसी महापुरुष के व्यक्तित्व की बात करते हैं तब क्या उनसे प्रेरणा लेने की बात हम आम आदमी से नहीं करते हैं ? जब हम खुद साहित्यिक गोष्ठियों की मर्यादा और अनुशासन नहीं अपना पातें तो श्रोताओं  से पूरे भाषण, विचार और विद्वत लोगों के संवाद सुनने की अपेक्षा क्यों करते हैं? अक्सर यही होती है, जैसा कि आज भी हुआ, कि अपने वयक्तव देकर, निदेशक /संयोजक महोदय , किसी कार्य की व्यस्तता प्रकट कर, फिर वे गोष्ठी से बाहर चले गए।) 

सवाल यह भी है कि जब  राजभाषा विभाग माह में एक पूरा दिन भी साहित्यिक गोष्ठियों के लिए पूरी तरह नहीं निकाल सकता  तो फिर  यह आयोजन क्यों और किसलिए, किसके लिए ? और ऐसा ही कुछ अन्य संस्थाओं की गोष्ठियों में होता है, तो फिर उसकी आलोचना क्यों ?

क्या यह सब कुछ प्रायोजित तमाशा-भर नहीं लगता ? मेरी समझ से साहित्य को बाजारु बनाने के बजाए, साहित्य में जीना ही, ऐसे अमर साहित्यकारों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और एक साफ- सुथरा साहित्यिक समाज का निर्माण कर सकेंगे हम !

इस संगोष्ठी में, संस्था के निदेशक इम्तियाज साहब के चले जाने के बाद स्कूल कालेज से आमंत्रित कुछ छात्र-छात्राओं ने भी अपने-अपने  सारगर्भित विचार प्रस्तुत किये, जो एक स्वस्थ परंपरा को जन्म दे रही है और विभाग का यह सराहनीय प्रयास है।

रश्मि कुमारी ने कहा कि "धर्मवीर जी को पढाई और घूमक्करी में बहुत रुचि थी।। जबकि रामवृक्ष बेनीपुरी कहा करते थे कि मैं रथ का टूटा हुआ पहिया हूं। टूटा पहिया निम्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। अन्याय के खिलाफ मेरी लेखनी उठेगी और टटा हुआ पहिया को ही अपना अस्त्र बनाएगी।"

सुरभि कुमारी ने कहा कि  बेनीपुरी हिंदी साहित्य के पुरोधा थे। कई करिश्माई प्रतिभाओं के जनक रहे हैं बेनीपुरी जी। उनकी रचनाओं को पढ़कर ऐसा जरूर लगता है कि वे देशभक्त और क्रांतिकारी प्रवृत्ति के थे। उनके साहित्य सृजन  की भाषा सहज, सरल और व्यावहारिक थी।"

कुमारी ज्योत्सना के विचार में रेखाचित्र को समृद्ध करने में बेनीपुरी जी का अभूतपूर्व योगदान रहा है।

धर्मवीर भारती के कृतित्व पर चर्चा करते हुए मनीषा साह कहती हैं ,"उनकी "गुनाहों का देवता" सदाबहार रचना थीं। "सूरज का सातवां घोड़ा" तो इतनी जीवंत रचना है कि इस कहानी पर श्याम बेनेगल जैसे श्रेष्ठ फिल्मकार ने फिल्मांकन भी किया। समाज की विद्रूपता पर व्यंग्य कसने में उनकी अद्भुत क्षमता देखी मैंने।

यह सच भी है कि' धर्मयुग' की पत्रकारिता से लेकर 'अंधायुग' नाटक की सृजनात्मक तक, धर्मवीर भारती ने अपनी अलग पहचान बना रखी है। 

डां रेखा सिंहा ने कहा कि" धर्मवीर भारती ने आर्थिक संकट के दौर में मात्र सौ रुपए में संपादन का काम संभाला था। उन्होंने पत्रिका को एक नई ऊंचाई दी। अंधायुग उनका प्रसिद्ध नाटक तो है ही "चांद और टुटे हुए लोग" उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना रही है। उनके संदर्भ में एक काव्य पंक्ति याद रही  है -
"जिंदगी के फलसफों में,कुछ धूप बाकी है !
  तपते हुए चुल्हो में,अभी कुछ आंच बाकी है!"

अब मौका था, मंच पर आसीन अतिथियों की बातें और चर्चा की । सभी एक से बढ़कर एक विद्वान। भाई कालेज के प्रोफेसर हैं तो, विद्वान तो होंगे ही। किंतु विद्वता का कोई विद्वान तांडव करने लगे, अपनी मंचानुसासन ही भूल जाए तो, श्रोताओं में कानाफूसी शुरू तो हो ही जाती है,और तब  सबसे अधिक परेशान दिखता है मंच का संचालन कर रहा मानुष। बार बार उठकर पहुंचता है माईक तक, फिर आतंक के मूड में पांडित्य दिखला रहे विद्वान का तेवर देख कर वापस भी लौट आता है, अपनी जगह पर। बच्चों को अनुशासन सिखलाने वाले ही दिग्भ्रमित हो जाएं, तो बंटाधार होगा न?
               
 ...... खैर किसी एक का नाम यहां पर नहीं लूंगा। अधिकांश प्रोफेसरों ने लम्बे - लम्बे लेक्चर जरूर दिया मगर , यह भूलकर कि यह साहित्यिक संगोष्ठी है, कालेज का क्लास रुम नहीं। इसलिए अधिक समय  लेकर भी उन्होंने विषय से संदर्भित बहुत कम उल्लेखनीय बातें कही। ... और जब तक राजभाषा या सरकारी/ गैर  विभाग, केवल प्रोफेसरों  में विद्वता का गुण खोजते रहेंगे, तब  तक ऐसी परिणित तो  होगी ही  ? अब उन्हें कौन समझाए कि साहित्य की चर्चा में, नए- पुराने रचनाकारों  की ही अधिक उपादेयता है वह भी खेमा, जाति और भाई -भतीजावाद से बाहर निकलकर । 

समारोह की अध्यक्षता करते हुए पटना विश्वविद्यालय के भू. पू. प्राध्यापक डां रामदेव प्रसाद जी  ने कहा कि  "अंधकार के बीच रौशनी की तलाश के लिए सतत बेचैन रहते थे बेनीपुरी जी। उनके विलक्षण व्यक्तिव में जीवन की बहुरंगी धराओं को समेटने का आभास मिलता है।वे माटी की मूरतों को गढ़ने वाले उनमें प्राणों की स्फूर्ति भरने वाले  आत्मा के अद्भुत शिल्पी थे।

डां उमाशंकर सिंह ने  बेनीपुरी को यूवा शक्ति के प्रति अत्यंत आस्थावान और आशावान बतलाया।

डां हरेकृष्ण तिवारी ने यह भी कहा कि बेनीपुरी को साहित्य और राजनीति दोनों क्षेत्रों में समान रुप से अधिकार था। जबकि डां रेखा सिंहा ने कहा कि " धर्मवीर भारती आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार, और सामाजिक विचारक थे। वे अपने समय की प्रतिनिधि साप्ताहिक पत्रिका 'धर्मयुग' का संपादन कर, उपकी अलग पहचान दी थी। हजारों पाठकों की संख्या बढ़ गयी थी। और वे 1972 में पद्म श्री से भी सम्मानित हुए।

.... और, जब राजभाषा विभाग के विशेष सचिव डां उपेन्द्र नाथ पांडेय के  बोलने की बारी आती है , तब सब के सब चौकन्ने हो जाते हैं - क्या पता यह प्रचंड विद्वान अधिकारी, अतिश्योक्ति में, न जाने क्या कुछ बोल जाए!
उनके संबंध में एक उद्वरण तो मैं ही आपको दे सकता हूं! वे जिस साहित्यकार की जयंती पर बोलते हैं, तब वे अपनी पिछली बातों को को ही शायद भूल जाते हैं। प्रेमचंद की जयंती में, उन्होंने ही कहा था कि - "मेरे निजी पुस्तकालय में  जितनी भी किताबें हैं, उनमें सिर्फ और सिर्फ मैं प्रेमचंद को ही पढ़ता हूं वैसा कोई दूसरा रचनाकार हुआ ही नहीं। कुछ ऐसा ही वे तुलसीदास, फिर संत रविदास, फिर कबीर,फिर दिनकर, फिर महावीर प्रसाद द्विवेदी, फिर माखन लाल चतुर्वेदी, फिर निराला...... के बारे में भी कहा।.

और आज बारी थी, दो अद्वितीय साहित्यकारों की, रचनाकारों की। और उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी के बारे में कहा कि पूरे देश में बेनीपुरी जैसा कोई भी रचनाकार नहीं है और मैं सिर्फ उन्हीं को खूब पढ़ता हूं।

हालाँकि वे जो कुछ भी बोलते हैं उसमें ऐसा लालित्य होता है कि एकटक होकर पूरे लोग उन्हें गंभीरता से देखते और सुनते हैं। उनके शब्दों में कुछ ऐसा ही जादू होता है शायद। उन्होंने कहा कि पद्य के अपेक्षा गद्य को शास्त्रकारों ने दुःसाध्य बतलाया है। ववामनक  ने इसीलिये गद्य को कवियों की कसौटी माना है।

उन्होंने यह भी साफ - साफ कहा कि - "पूरे भारतवर्ष में, आज हिंदी का जो मानचित्र है, उसमें रामवृक्ष बेनीपुरी और धर्मवीर भारती जैसे एक भी साहित्यकार आज नहीं दिखता। आखिर हमें सोचना ही होगा कि बेनीपुरी की "माटी की मूरतें" की साठ हजार प्रतियां कैसे बिक जाती है, जबकि आजकल के लेखकों को अपनी 500  प्रतियां भी बिकवाने में सफलता नहीं मिलती। इसलिए आज ऐसे एक भी लेखक नहीं रहें जिन पर जयंतियां मनाई जा सके।

उन्होंने यह भी कहा कि" सिलाई तो एक टेलर मास्टर भी कर लेता है और घर की मां भी। दोनों में  भावोत्कर्ष का मामला है। एक का संबंध  व्यावसाय से है तो एक का संबंध भावनात्मकता से। "

उन्होंने ऐसा कहकर, आजकल के लेखक और उनके लेखन पर सवालिया निशान नहीं लगा दिया है क्या  ?
             
इस साहित्यिक समारोह में एक सत्र था काव्य पाठ का। इस सत्र में अनिल कुमार सिंह/अश्मजा प्रियदर्शिनी/अमित कुमार आजाद /बिन्देश्वर प्रसाद गुप्ता /अल्पना भारती और पंकज कुमार ने काव्य पाठ किया।

........ कहना गलत न होगा कि दो-तीन कवियों को छोड़कर, औरों ने सिर्फ खानापूर्ति ही की। यानि कविता के साथ मजाक!( हलाकि, वे कवि संतुष्ट अवश्य नजर आ रहे थे, जो काफी जद्दोजहद के बाद यहां तक पहुंचने में सफलता पाई थी  और हजार रुपये का चेक भी प्राप्त किया था।

एक कवि पंकज ने तो यह कहकर श्रोताओं को अचम्भे में डाल दिया कि मैं यह कविता अपनी प्रेमिका के लिए पढ़ रहा हूं-
 " मुहब्बत में नहीं कोई भी गिला है मुझे 
जख्म ईनाम में सही, मिला है मुझे !!"
फिर भावुकता में यह भी कह गया कि - "आपलोग मेरी इन काव्य पंक्तियों  पर तालियां बजाते रहिए, तो मुझे लगेगा कि मेरी प्रेमिका खुश हो रही है।"

जबकि  ऐसा व्याख्यान देने के बिना भी एक सार्थक कविता पढा जाना अधिक प्रभावकारी होता है, जैसा कि नवोदित कवयित्री अल्पना कुमारी ने अपने प्रेम गीत को, बहुत ही संजीदगी के साथ पेश किया -"
"प्रेम में बंधकर दीवानी आ गई
 रात की रैना सुहानी आ गई।"
     आज यमुना के किनारे प्यार का त्योहार है।
     प्रेम जिसने भी किया, प्रेम का ही हो गया!!"

इस सत्र में, नवोदित कवि अनिल कुमार सिंह की गजल ने तो पूरी महफ़िल ही लूट लिया -
"पत्थर होते हुए इस दौड़ में
गीत अगर मैं न गाता ।
तो  धीरे-धीरे मैं भी।
 पत्थर  ही हो जाता.।। "
 शब्द बन गए शूल ।
चुभन मैं और कहां सह पाता।
मैं गीतों का फूल   उपजाता।
तो आगे और किधर  जाता.?

मुझे ऐसा लगता है कि, ऐसी संगोष्ठीयों के अंतिम सत्र में, चार - पांच ऐसे नए- पुराने कवियों को उनकी एक - एक कविता के साथ प्रस्तुत किया जाता है, जो मंच पाने के लिए छटपटा रहे होते हैं। हालांकि, भीख के रुप में मिला यह अवसर भी , कवियों को अपनी प्रतिभा को दिखलाने का अच्छा अवसर देता है। किन्तु अधिकांश कवि कविता के लिए मिले अपने  पांच मिनट के समय को  , अपने अनावश्यक व्यक्तव्य और आत्मपरिचय देने में ही बर्बाद कर देते हैं और जब उन्हें चेताने की मुद्रा में संचालक महोदय खड़े हो जाते हैं तब वे राजधानी एक्सप्रेस बनकर अपनी कविता अलापने लगते हैं। आखिर साहित्यकारगण भी अपनी मर्यादा, मान-सम्मान और अनुशासन नहीं समझेंगे  तो और दूसरों पर उंगलियां उठाने का हक हमें बनता है क्या ?

अन्यथा लेने की ये बातें है क्या कि ऐसे गरिमापूर्ण आयोजन में, कवियों का चयन, उनकी कविताओं को आमंत्रित कर, उन कविताओं का मूल्यांकन कर, फिर कवियों को आमंत्रित करना चाहिए, सिर्फ चमचागिरी, जातिगत भेदभाव, पद-प्रतिष्ठा, खेमेबाजी या किसी के दबाव में आकर नहीं! 

आज हमारे साहित्य समाज में, ऐसी विसंगतियों का ही प्रकोप क्यों बढ़ता जा रहा है? पुरस्कार से लेकर सम्मान तक, मंच से लेकर प्रकाशन तक, ऐसी अराजकता क्यों और किसलिए..?
             
..........                       
 आलेख - सिद्धेश्वर  
रपट के लेखक का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com











Sunday, 29 December 2019

नवगीतिका लोक रसधार तथा यूथ हॉस्टल एसोसिएशन द्वारा शरद उत्सव पटना में 28 .12.2019 को सम्पन्न

नई पीढ़ी के अनेक गायक भोजपुरी गीतों की विरासत को बेहतर बनाने में लगे हुए हैं 
भरत सिंह भारती द्वारा लिखे गए भोजपुरी गीतों के संकलन " का विमोचन भी 
 प्रथम नवगीतिका शिखर सम्मान उषा किरण खान को

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लोकगीत मूलत: परम्परागत रूप से विभिन्न उत्सवों में पुरानी पीढ़ी के लोगों को गाते देखकर ही सीखी जाती है ।  पहले के जमाने मेें इसके प्रचार-प्रसार का यह तरीका सशक्त था। लेकिन आधुनिक युग में जब लोग अपनी जड़, जमीन और संस्कृति से कटते जा रहे हैं यह आवश्यक है कि इस धरोहर को पुस्तक का आकार देकर प्रकाशित किया जाय ।

सांस्कृतिक संस्था नवगीतिका लोक रसधार तथा यूथ हॉस्टल एसोसिएशन, बिहार चैप्टर के तत्वावधान में सांस्कृतिक शरद उत्सव का आयोजन पटना के भारतीय नृत्य कला मंदिर बहुउद्देशीय परिसर में किया गया जिसका विधिवत उद्घाटन बिहार के पर्यटन मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि, जहानाबाद के सांसद चंद्रदेव प्रसाद चंद्रवंशी, पूर्व मध्य रेल के महाप्रबंधक ललित चंद्र त्रिवेदी और भोजपुरी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष चंद्रभूषण राय ने किया । 

इस अवसर पर प्रसिद्ध लोक गायक और गीतकार भरत सिंह भारती द्वारा लिखे गए भोजपुरी गीतों के संकलन "सप्त सरोवर" का विमोचन भी किया गया । मंत्री कृष्ण कुमार ऋषि ने इस अवसर पर कहा कि भरत सिंह भारती जैसे वरिष्ठ कलाकारों की सक्रियता और समर्पण से बिहार की लोक परंपरा को मजबूती मिली है । सरकार लोक संगीत को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है । विभिन्न महोत्सवों के माध्यम से लोक कलाकारों को बढ़ावा दिया जाता है । राज्य सरकार द्वारा बाल्मीकि नगर जाने वाले पर्यटकों के लिए भी लोक कलाकारों के नियमित प्रदर्शन की व्यवस्था की गई है । 

सांसद चंद्रदेव प्रसाद चंद्रवंशी ने भरत सिंह भारती को एक लिविंग लीजेंड करार देते हुए कहा कि उन्होंने भोजपुरी लोक संगीत को बढ़ावा देने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया । पूर्व मध्य रेल के महाप्रबंधक ललित चंद्र त्रिवेदी ने लोक गायक और गीतकार भरत सिंह भारती  को उनकी दूसरी पुस्तक सप्त सरोवर के लिए बधाई दी । 

इस अवसर पर भरत सिंह भारती ने कहा कि लोकगीतों की परंपरा मौखिक रही है । गांव-जवार में लोगों ने एक दूसरे से सुनकर, याद कर लोकगीतों की परंपरा को सुरक्षित और समृद्ध किया है । सप्त सरोवर में लोक भजन, पूर्वी, चैती , सोहर, संस्कार कजरी और विकास के गीतों को शामिल किया गया है । उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के अनेक गायक भोजपुरी गीतों की विरासत को बेहतर बनाने में लगे हुए हैं जो उनके लिए संतोष की बात है । लेकिन कई गायक भोजपुरी के नाम पर अश्लीलता को परोस कर भोजपुरी को बदनाम करने में भी लगे हुए हैं । ऐसे गायकों का सामाजिक बहिष्कार भी होना चाहिए । 

प्रसिद्ध लोक गायिका नीतू कुमारी नवगीत ने सांस्कृतिक शरद उत्सव की शुरुआत करते हुए चलेली गंगोत्री से गंगा मैया जग के करें उद्धार गीत पेश किया । उन्होंने रूसल कन्हैया के मैया मनावे खाए ना माखन चोर और कौने देसे गइले बलमुआ कथिया लईहे  ना जैसे गीतों पर श्रोताओं को झुमाया । सतेंद्र कुमार संगीत ने भी अपने गीतों पर लोगों को झुमाया । कार्यक्रम के दौरान सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्था नवगीतिका लोक रसधार की ओर से वरिष्ठ साहित्यकार उषा किरण खान को साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए प्रथम नवगीतिका शिखर सम्मान-2019 प्रदान किया गया । 

बिहार की कला एवं संस्कृति तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए मनोज कुमार बच्चन, सत्येंद्र कुमार संगीत, रवि मिश्रा, पुष्प लता मोहन, डॉ ध्रुव कुमार, सुधीर मधुकर, आकांक्षा चित्रांश, शैलेश कुमार, दीप श्रेष्ठ, मधुमंजिरी, अलका प्रियदर्शनी, अभय सिन्हा, सोमा चक्रवर्ती और सीपी मिश्रा को नवगीतिका सम्मान- 2019 प्रदान किया गया । शानदार अंदाज में कार्यक्रम का संचालन शैलेश कुमार और रवि रंजन ने किया ।
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आलेख - बिहारी धमाका ब्यूरो
छायाचित्र - नवगीतिका रसधार
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com




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Friday, 27 December 2019

"साहित्य परिक्रमा" और " राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक काव्य-मंच" के द्वारा मासिक काव्य संध्या पटना में 25.12.2019 को सम्पन्न

"हाथ में जब सब के ही पत्थर रहे / कोई सलामत किस तरह फिर घर रहे"

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वैसे तो कहने को 2020 एक नया वर्ष के रूप में आ रहा है पर पता नहीं कितनी अशांतियों के मध्य यह आना पसंद करेगा। कवि जन्मजात अमनपसंद होता है लेकिन इसकी अमनपसंदगी समाज से विमुख नहीं बल्कि उसके सापेक्ष होती है अर्थात यह तमाम प्रकार की अशांतियों का पूर्ण निवारण कर अमन लाने में यकीन रखता है। कुछ ऐसा ही प्रसंग रहा हाल ही में सम्पन्न हुई एक कवि गोष्ठी का।

सिर्फ अपनी कविता को मंच पर पढ़ देने की उत्सुकता, कवियों की भीड़ वाली बड़ी गोष्ठियों में देखी जा सकती है किंतु एक दूसरे की सृजनात्मकता को आत्मसात करने की प्रवृत्ति छोटी छोटी गोष्ठियों में ही दिख पड़ती है। कुछ ऐसा ही महौल रहा पटना के रामगोबिंद पथ, कंकड़बाग स्थित कवि मधुरेश नारायण के आवास पर दिनांक 25.12.2019 को क्रिसमस के दिन  आयोजित काव्य संध्या में जो कई मायने से भरपूर सकून दे गया। 

पटना की साहित्यिक संस्था "साहित्य परिक्रमा" और " राष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक काव्य-मंच" के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित मासिक काव्य संध्या का सशक्त संचालन करते हुए उपरोक्त उद्गार, कवि - कथाकार सिद्धेश्वर ने व्यक्त किया। उन्होंने कविता के सौंदर्य बोध को रेखांकित करते हुए कहा कि - "कवि कभी भी अकेला या निहत्था नहीं होता। उसके साथ समाज और समुदाय होता है और होती है संवेदना के साथ संबधों, सरोकारों और शब्दों की रणभेदी ताकत। अंधेरों में भी भीतर के सौंदर्य और सूरज के उजालों को सहेजने की कला कवि अथवा कथाकार के पास ही होती है। यूँ हम कह सकते हैं कि मानवीय.संवेदना की सहज अभिव्यक्ति होती है कविता।"

अपने अध्यक्षीय उद्बबोधन में वरिष्ठ कवि कथाकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने इस तरह की घरेलू गोष्ठियों के प्रति भरपूर संतोष प्रकट करते हुए कहा कि "आज के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जमाने में निकट के रिश्तों से संबंध साधना भी दुर्लभ होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में इस तरह की गोष्ठियों में साहित्य के साथ- साथ पारिवारिक संवाद की भी पूरी गुंजाइश होती है।" उन्होंने इस तरह की गतिविधियों की निरंतरता के लिए मधुरेश शरण और सिद्धेश्वर की भूरि भूरि प्रशंसा की।

भगवती प्रसाद द्विवेदी ने आज पढीं गई कविताएओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि "सिर्फ कवि गोष्ठी ही नहीं, एक तरह से ऐसा आयोजन एक कार्यशाला का उद्देश्य भी पूरा करता है जहां पर हम अपनी नये सृजन का मूल्यांकन तो करते ही  हैं, हम एक - दूसरे को राय परामर्श भी देते हैं।

उन्होंने कहा कि "आज पढीं गई लगभग सभी कविताओं में ताजगी दिखी। कविता हो या गीत- गजल, समकालीनता से लैस इन कविताओं में, सृजन की कई मूल चिंताओं को अभिव्यक्त किया  गया है। व्यक्ति और समाज की जरूरतों और इतना ही नहीं, सामाजिक विसंगतियों को भी  पूरी प्रतिबद्धता के साथ उजागर किया गया है। प्रतिरोध, क्रोध और प्रेम की अभिव्यक्ति लगगभग सभी कविताओं में हुई है।"

रचनाधर्मियों की इस  सारस्वत संध्या में भगवती प्रसाद द्विवेदी (अध्यक्ष), आर पी घायल (मुख्य अतिथि), राजमणि मिश्र, मधुरेश नारायण, सिद्धेश्वर (संचालन), घनश्याम, मेहता नागेन्द्र सिंह, लता प्रासर, विश्वनाथ प्रसाद वर्मा, सुनील कुमार, नसीम अख्तर और प्रभात कुमार धवन सहित कूल बारह प्रतिनिधि कवियों ने अपनी पसंद की एक नई और एक पुरानी यानी दो - दो कविताओं का पाठ कर, पूरा वातावरण को ही काव्यमय बना दिया।
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इस साहित्यिक आयोजन के मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ शायर आर पी घायल । इस अवसर पर बिहार सरकार के राजभाषा विभाग के अधिकारी ओम प्रकाश वर्मा ने भी, पढीं गई पूरी कविताओं को बहुत ही तन्मयता के साथ सुनने के बाद कहा कि  ऐसे सार्थक प्रयास समाज के हर कोने या प्रांत में होना ही चाहिए, जो राजभाषा हिन्दी और हिंदी साहित्य के उत्थान में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह करता रहे।

नएपन की तलाश में कविगण हमेशा लगे रहते हैं यही कारण है कि नववर्ष का आगमन उनके हृदय के द्वार पर सबसे पहले होता है

 प्रभात कुमार धवन नव्य की आराधना करनेवाले ऐसे ही एक  चिरनूतन कवि हैं -
"नव वर्ष मंगलमय हो!
   स्वर्ण विभूषित
     सूर्य उदय हो!!
      हो प्रभात / मधुर जीवन का
      मिले सुख सार /तरुण जीवन का!!"

राजमणि मिश्र ने मात्र मूर्तियों की प्रतिष्ठा की बजाय उसमें प्राण फूँकने अर्थात अंत:करण  की जीवंतता के महत्व को उजागर किया -
" है तिमिर तुमने रचा
पर रचा दिनमान मैंने!
  मूर्तियां तुमने बनायीं
  किंतु फूंके प्राण मैंने!"

पर्यावरण के कवि मेहता नागेन्द्र सिंह को कोई डर नहीं लगता क्योंकि उनके पास हौसला और हुनर दोनों है -
"हौंसला भी है, हुनर भी है, तो डर कैसा ?
सांस की खातिर शज़र भी है, तो डर कैसा?
पतवार थामें हाथ अपना मजबूत है बाकी!
बेताब दरिया में भंवर भी है तो डर कैसा ? "

हास्यसम्राट विश्वनाथ प्रसाद वर्मा ने आदमी को हवाईजहाज की बजाय आदमी बने रहने की बात की -
"एक कवि कहां-कहां जाएगा
   कहां-कहां गाएगा / आदमी है
कोई हवाई जहाज तो नहीं बन जाएगा? ".  

शायर नसीम अख्तर पत्थरबाजी के आदिम युग की पुनरावृति होते देख नासाज़ नजर आए-
" हाथ में  जब सभी के  ही  पत्थर रहे !
किस तरह फिर सलामत कोई सर रहे !"

प्रेम की वर्षा करनेवाली कवयित्री लता प्रासर ने पहले एक मगही रचना सुनाई फिर डाली-डाली और पत्ते-पत्ते पर अपने हृदय के इष्ट का नाम लिख डाला -
" पत्ता पत्ता डाली डाली परिचय तेरा लिख डालूं ।
  प्रेम प्रीत की वर्णमाला कली कली पर लिख डालूं।
रंग बसंती क्यारी क्यारी खिल रहा प्यारा प्यारा.
पगडंडियों पर हरियाली से नाम तुम्हारा लिख डालूं!"

संचालक सिद्धेश्वर स्वार्थचिंतन के इस दौर में भी इंसानियत की नब्ज टटोलते दिखे -
" दूसरों के लिए यहां सोचता है कौन ?
  दिल  का दरवाजा  खोलता है कौन?!
  बंद  है  पडोस  की  सारी  खिड़कियां!
इंसानियत की नब्ज, टटोलता है कौन ? "
              
शायर सुनील कुमार को अपने उसूलों के पक्के होने के कारण  अनेक परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं-
     - "मैं जिनकी आँख का तारा रहा हूँ!
          उन्हीं नज़रों में गिरता जा रहा हूँ!!
                 उसूलों का ज़रा पक्का रहा हूँ!
                  ज़माने को बहुत खलता रहा हूँ !" 

आज के जमाने में भी जब अनेक प्रकार की अशांति छाई हुई है सबको प्रेमरस में डुबो देने वाले लगे कवि और गोष्ठी के संयोजक गीतकार मधुरेश नारायण - 
          नज़रें बिछाये बैठे हैं हम, आस जगा जाओ..........
जिनके आने से,चारों दिशाओं में
महक उठा है उपवन-उपवन!
आहट पाते ही,रूप दिखाते ही,
चकाचौंध है धरती गगन.!!
      प्रीत भरे गीत गूँजे, सुर मिला जाओ.....
      जाओ कहीं दूर मगर  लौट के चले आओ!! "

गांधी जैसे युगपुरुष द्वारा बड़े जतन से जोड़े गए वतन में विध्वंश के ता-ता धिन्न को देख हिन्दी गजल को एक नयी अभिव्यक्ति देने वाले शायर घनश्याम का मन खिन्न हो गया है-
"हमारा मन सुबह से खिन्न क्यों है ?
   निगोड़ी धारणा भी  भिन्न क्यों है?
            अलाउद्दीन ! ये  क्या  हो  रहा है?
              मेरे आगे खड़ा  यह जिन्न क्यों है?
मेरे   घर   में  ढनकते  हैं   पतीले !
तुम्हारे  घर में ता-ता धिन्न क्यों है ?
             जिसे जोड़ा था गांधी ने जतन से!
             वो रिश्ता प्रेम का विच्छिन्न क्यों है ?
ज़रा "घनश्याम "से पूछो तो आखिर
   बुढ़ापे  में  वो  चक्कर घिन्न क्यों है ? "

विदित हो कि यह काव्य संध्या न सिर्फ प्रभु ईसा मसीह के परम त्याग दिवस बल्कि मधुरेश नारायण और विश्वनाथ प्रसाद वर्मा के जन्मदिनों का भी अवसर रहा।  आगत अतिथियों और कवियों ने उन्हें जन्म दिन की बधाई दी। गोष्ठी लता प्रासर के द्वारा कृतज्ञता और धन्यवाद ज्ञापन के साथ सम्पन हुई।
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आलेख - सिद्धेश्वर
प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
रपट के लेखक का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल- editorbejodindia@gmail.com




 













Tuesday, 24 December 2019

रामवृक्ष बेनीपुरी की जयंती पटना में 23.12.2019 को सम्पन्न

अनूठी शैली के यशस्वी कथाकार  
"पतितों के देश में, कैदी की पत्नी, जंजीरें और दीवारें, गेहूं और गुलाब जैसी पुस्तकें जेल में लिखीं

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पूरे साहित्यिक आवेग के साथ महान हिंदी साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी की जयंती पटना के कदमकुआँ स्थित बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन में 23.12.2019 को मनाई गई

लघुकथा विधा कहानी विधा के निकट है, ऐसी धारणा है लोगों में। लेकिन सच तो यह है कि लघुकथा आकार- प्रकार, शब्द - शैली और अभिव्यक्ति के आधार पर भी, कहानी से बहुत अलग है। यह गद्य की एक स्वतंत्र विधा के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। प्रेमचंद, मंटो, जयशंकर प्रसाद, राजाराधिकारमण सिंह, और रामवृक्ष बेनीपुरी सरीखे कथाकारों ने भी कई छोटी- छोटी रचनाएं लिखी थी, जिसे लोग लघुकहानी के रुप में पहचानते थे।

यहां पर सवाल यह है कि स्वयं इन कथाकारों भी अपनी इन रचनाओं को लघुकथा का नाम दिया था क्या? यह एक विवादास्पद प्रश्न हो सकता है। किंतु बीसवीं शताब्दी के सातवें  दशक में, समकालीन कथाकारों ने लगातार विचार-विमर्श के बाद विधागत विधान बनाकर और सतत आंदोलन का रूप देकर जब  इसका एक सैद्धांतिक और समीक्षात्मक स्वरूप बनाया (जिसका मैं भी साक्षी रहा हूं), तब एक स्वतंत्र विधा के रुप में 'लघुकथा' की पहचान बनी। तब कमलेश्वर, अवधनारायण मुद्गल, वाल्टर भेंगरा, तरुण सरीखे जागरूक संपादकों ने,सारिका, कथायात्रा और कृतसंकल्प जैसी  मुख्य धारा की पत्रिकाओं का लघुकथा विशेषांक निकालकर लघुकथा विधा को एक दिशा देने का एक महत्वपूर्ण कार्य किया था।

अब, जयंती के नाम पर लघुकथा पाठ करवाना तो एक अच्छी बात है। किंतु और अच्छी बात होगी, जब जयंती विशेष कथाकारों को लघुकथा के साथ जोड़कर, उनकी लघुकथाओं पर भी हम  चर्चा  करें।

अब जो लघुकथा लिखते ही नही, वे तो अब भी आठवें दशक की बात ही दुहराएंगें न कि लघुकथा हस्तलिखित रुप में एक पेज और टंकित रुप में आधे पृष्ठ का हो वही आदर्श लघुकथा है, जैसा कि मंचासीन कवि डॉ. शंकर प्रसाद ने आज के बेनीपुरी जयंती के अवसर पर आयोजित पठित लघुकथा पर टिप्पणी करते  हुए कहा।

जबकि समारोह के अध्यक्ष अनिल सुलभ ने इसे लघुकथा कार्यशाला जैसा स्वरूप बतलाते हुए कहा कि बहुत ही सावधानी के साथ किसी भी लेखक को लघुकथा लिखनी चाहिए। लघुकथा का विस्तार रचना को कमजोर कर देती है। आवश्यक हो तो लघुकथा लिखने के बाद आवश्यक संशोधन कर उसमें कांट- छांट भी करनी चाहिए।

उन्होंने रामवृक्ष बेनीपुरी की जयंती को नमन करते हुए कहा कि "बेनीपुरी की रचनात्मक छवि अद्भुत थी। उन्होंने अपनी लेखनी से सिद्ध किया कि लेखकीय अवदान में बिहार किसी से पीछे नहीं है। हिंदी साहित्य के वे प्रतिनिधि रचनाकार के रुप में परिणित होते रहे हैं। इसमें दो मत नहीं कि वे एक विशिष्ट शैलीकार थे।

उन्होंने बेनीपुरी के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए कहा कि "बेनीपुरी जी अपने छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन का एक प्रमुख हिस्सा बने। अपनी तप्त लेखनी का मुंह अंग्रेजों और शोषक समुदायों के विरुद्ध खोल दिया था।। वे अप्रतिम साहित्यकार थे और कई वर्षों तक बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में भी अपना अभूतपूर्व योगदान दिया।"

(वैसे प्रसंगवश यह बतला दूँ कि मेरा यह सौभाग्य रहा है कि उनके नाम  से ही सही  पूर्व मध्य रेल की सेवा करते हुए हमने राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्थित रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी पुस्तकालय" के पुस्तकाध्यक्ष के पद कर, लगभग दो दशक से अधिक काम किया और इस दौरान ही रामवृक्ष बेनीपुरी के पौत्र और बहू ने रामवृक्ष बेनीपुरी की कलात्मक तस्वीरें और उनकी दर्जनों दुर्लभ पुस्तकें हमें सौंपीं, जो आज भी इस रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी पुस्तकालय में सुरक्शित हैं। -सिद्धेश्वर)

लघुकथा पाठ के इस संगोष्ठी में मंचासीन लघुकथा लेखिका पूनम आनंद, कुमार अनुपम ने भी, कार्यक्रम को यादगार तो बनाया ही, इस समारोह को गरिमापूर्ण बनाने में समारोह के संयोजक योगेन्द्र मिश्र की भी अहम भूमिका रही।

समारोह के आरंभ में शुभचंद्र सिन्हा ने कहा कि " रामवृक्ष बेनीपुरी जब जब जेल से निकलते थे, उनके हाथों में , ढेर सारी पांडुलिपियाँ होती थीं। सतत सृजनशील रहते थे बेनीपुरी जी।"

डॉ. शंकर प्रसाद ने कहा कि बेनीपुरी जी की लेखनी का जादू पूरा हिंदुस्तान मानता रहा है।  वे एक विशिष्ट शैलीकार थे।

वरिष्ठ साहित्यकार नंद मिश्र आदित्य ने  अपने उद्गार में कहा कि "पतितों के देश में कैदी की पत्नी, जंजीरें और दीवारें, गेहूं और गुलाब जैसी बहुचर्चित पुस्तकों को उन्होंने अपनी जेल की कालकोठरी में ही लिखा।       

छट्ठू ठाकुर ने कहा कि आंदोलनकारियों के बीच बेनीपुरी जी हमेशा उर्जा भरते रहें अपनी लेखनी के माध्यम से।.   
आनंद किशोर मिश्र के विचार में  रामवृक्ष बेनीपुरी अपनी आयू के तरुणाई काल से मृत्यु  तक कलम के योद्धा बन डटे रहें।

डॉ. कुंदन कुमार के अनुसार बेनीपुरी जी अग्नि का पोषण करते रहें। क्रांति और विद्रोह  की एक ज्वाला उनके हृदय में सदा धधकती रही। 

 डौली भदौरिया के विचार से  रामवृक्ष बेनीपुरी जी स्वतंत्रता आंदोलन के अमर सिपाही के प्रेरणास्रोत रहें।

कवि  त्रृतुराज ने विस्तार से उनकी रचनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि "रामवृक्ष बेनीपुरी अपने काल के यशस्वी कथाशिल्पी थे। उनकी लेखनी का जादू पूरे देश को अपनी ओर आकर्षित किया है।"

लघुकथा संगोष्ठी में डॉ. सीमा रानी ने 'प्रतीक्षा', कुमार अनुपम ने "मैं पहले से ही खुश हूं", पूनम आनंद ने "वेरी सिंपल", सिद्धेश्वर ने "फोकट की पढाई'", योगेन्द्र मिश्र ने "खुले आकाश का पंछी", डॉ. शंकर प्रसाद ने "मैं शर्मिंदा हूं", कृष्ण रंजन सिंह ने ''ज्वार भाषा" शीर्षक लघुकथा का पाठ किया तो लता प्रासर ने "मर्म", श्रीकांत व्यास ने' "कोयला और पत्थर", डॉ.  मनोज गोवर्धनपुरी ने "रानी मां'", नूतन सिंहा ने "मां - पुत्र", प्रेमलता सिंह ने "पगला बाबा",  किरण सिंह ने "आदर्श बाबू", नंद आदित्य ने "छोटा आकार, नम्रता ने "मेरी मां", रेखा भारती ने "पेंशन'", डॉ. पुष्पा जमुआर ने 'जलन'  शीर्षक लघुकथा का पाठ किया।   साथ ही तरंजन भारती ने "अच्छा कौन', प्रभात कुमार धवन ने  'कारावास '.  और राज किशोर वत्स ने "काने राजा का चित्र" शीर्षक लघुकथाएँ अपने- अपने निराले अंदाज में प्रस्तुत की  जो एक यादगार लघुकथा की शाम बनकर हमारे जेहन में समा गई। लघुकथाओं पर ऐसी जीवंत संगोष्ठी की जरूरत पहले से अधिक है जो व्यस्त और इलैक्ट्रानिक युग का एक जरूरी हिस्सा बनकर  आज भी आम आदमी को साहित्य से जोड़ने में कामयाब है। 
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आलेख - सिद्धेश्वर 
छायाचित्र - सिद्धेश्वर, पूनम आनंद 
रपट के लेखक का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
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