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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@gmail.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Tuesday, 19 July 2022

मंटो लिखित नाटक 'शारदा' का 'रंगम' द्वारा 17.7.2022 को पटना में सफल मंचन

प्यार की तलाश में वेश्या 



(रास राज बिहार के एक मंझे हुए अभिनेता और रंग-निर्देशक हैं जो पिछले कुछ वर्षों से मुख्यत: सदाअत हसन मंटो की कहानियों पर नाटक कर रहे हैं. मंटो के नाटक में आजादी के बाद की सामाजिक सच्चाई का जो नंगा रूप उभरकर सामने आते है उसमें न सिर्फ समाज के धार्मिक विभाजन का बल्कि उसके लैंगिक आयाम का परिदृश्य भी काफी मजबूती से उभरता है. औरतें खास कर निचले आर्थिक वर्ग की औरतें सबसे ज्यादा भुक्तभोगी रहीं. लोग भले ही किसी भी चश्मे से देखें लेकिन यह कहानी दर-असल देश-धर्म से परे नारी-जाति की व्यथा पर फोकस करती है. मंटो की कहानियों का अपना खास अंदाज है - डरावने अंधेरे को छुपाए हुए रंगीनियाँ, जो रास राज के ग्लैमर भरे प्रदर्शन में और भी प्रखर विरोधाभास के साथ प्रकट होता है. रास राज और उनकी टीम अपने मकसद में कामयाब हों इस शुभकामना के साथ उनके द्वारा हाल ही में मंचित नाटक 'शारदा' की रपट नीचे प्रस्तुत है- हेमन्त दास 'हिम')

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कहानी कुछ इस तरह है कि शारदा अपनी छोटी बहन को ढूंढते-ढूंढते हुए बम्बई पहुँच जाती है वह अपनी बहन को एक रेड लाइट एरिया में पाती है | वहां एक ग्राहक नज़ीर से मुलाकात होती जिसे शारदा दिलोदिल उसे चाहने लगती और उसके रहना चाहती है इधर नज़ीर को बिस्तर में उसे शारदा ऐसी लज्ज़त महसूस होती है कि वह उसे भूल नही पाता है |

तवायफ़ों की ज़िन्दगी एक खुली किताब की तरह होती है। जिसे हर पुरुष पढ़ना चाहता है। उसके रूप यौवन को पाना चाहता है । लेकिन उसे अपनाने में परिवार और समाज से डरता है। तवायफ़ कोई शौक से नही बनता उसके पीछे कई मजबूरियाँ होती है। 

पटना के स्थानीय कालिदास रंगालय में रंगम नाट्य संस्था की ओर से सआदत हसन मंटो की कहानी शारदा का मंचन 17 जुलाई को संध्या 7 बजे हुआ । मंटो की कहानी शारदा का नाट्य रूपांतरण , परिकल्पना एंव निर्देशन किया  युवा अभिनेता एंव नाट्य निर्देशक रास राज ने।। हॉउसफुल शो ऊपर से मंच सज्जा का कमाल, और सभी अभिनेताओं का अभिनय दर्शकों को बांधे रहा और हर दृश्य के बाद तालियों की गरगराहट से हॉल गूंजता रहा।।

शारदा अपनी छोटी बहन को ढूंढते-ढूंढते हुए बम्बई पहुँच जाती है वह अपनी बहन को एक रेड लाइट एरिया में पाती है | वहां एक ग्राहक नज़ीर से मुलाकात होती जिसे शारदा दिलोदिल उसे चाहने लगती और उसके रहना चाहती है इधर नज़ीर को बिस्तर में उसे शारदा ऐसी लज्ज़त महसूस होती है कि वह उसे भूल नही पाता है |  शारदा का प्यार परवान चढ़ता है , और वह नज़ीर के साथ ही रहना चाहती है लेकिन एक दिन नज़ीर कहता है मैं शादी शुदा आदमी हूँ और  मेरा रुपया सब खतम हो गया है समझ में नही आता तुम्हारे पास अब कैसे आ पाउँगा , शारदा  को यह सुनकर ठेस पहुँचती है मगर अपने प्यार की खातिर कहती है की नजीर साहब मेरे पास जितने रूपये हैं आप रख लें बस मुझे जयपुर का किराया दे दे ताकि मैं मुन्नी और अपनी बहन  शकुन्तला को लेकर वापस चली जाऊ, लेकिन नज़ीर उसकी बातो से नाराज़ और गुस्सा होता है और चला जाता है | घर आने पर उसके बारे में ही सोचता रहता है लेकिन पैसे न रहने की वजह से वो उसके पास नही जा पाता है | 

एक दिन मंटो साहब नज़ीर के घर आते है  जिससे उधार लेकर शारदा के पास जाता है और वहाँ उसे करीम से पता चलता है की वह जयपुर जा रही सबकुछ छोड़कर | नज़ीर करीम को बोलता है बुलाना जरा उसे शारदा आती है नज़ीर उसे जाने नही देने चाहता है | शारदा कहती है – मैं वैश्या हूँ न नज़ीर साहब हम वैश्याओ के रिश्ते समाज की ज़रूरत नही बन सकी हम सिर्फ वासना की भूख़ मिटाने तक ही सिमित रह गये | तवायफ़ सबको चाहिए लेकिन उस तवायफ़ को बीवी बनने का कोई अधिकार नही , मैं जा रही हूँ अपनी वजूद की तलाश में | खुदा हाफ़िज़ |  

 मंच पर                                                      
शारदाः- विभा कपूर                                                   
नज़ीरः- रास राज़
संगीत - आदर्श राज प्यासा
मंटोः- कुणाल सत्यन                                                 
करीमः- गणेश कुमार अक्षत                                                   
शबनमः- सुरभी कृष्ण                                                
शबनम  का आशिक - कमलेश सिंह                                  
शकुंतलाः- निभा                               
रहीम काका – रमेश सिंह                                                           
नृत्यांगना – पूजा भाष्कर
दारू बेचने वालाः- प्रिय राज़ पांडेय                                  
नज़ीर की पत्नीः- विभा कपूर                           
कस्टमर 2 - अमरजीत सैम                                              
कस्टमर  1 - आलोक झा                                           
आशिक़ः-  आशिक़ स्वैग
रेड लाइट की लड़किया : -  निहाल कुमार दत्ता, आदित्य शर्मा, शुभम कुमार, ख़ुशबू कुमारी, मुकेश कुमार, अभिषेक कुमार, शिवम पाण्डेय आदि |

नेपथ्य में -
मंच परिकल्पना – सतीश कुमार  एंव सुनील
प्रकाश परिकल्पना – राहुल रवि 
वस्त्र विन्यास – पिंकू राज, निभा 
रूप - सज्जा – जीतेन्द्र कुमार जीतू 
प्रस्तुति संयोजक – रमेश सिंह , मनोज राज
फोटोग्राफी – मनीष जी
टिकट पर – पिंकू राज , रंजन, बिकेश साह
वीडियोग्राफी – दिपक कुमार
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रपट हमारे सदस्य द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर.
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com अथवा hemantdas2001@gmail.com

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Wednesday, 9 June 2021

Paintings of Surendra Paswan

 अभी हाल ही में बिहार के  जाने माने लोकाशिल्पी सुरेन्द्र पासवान  एक अंतरराष्ट्रीय वर्कशॉप में भाग लिया प्रस्तुत हैं उनके द्वारा भेजे गए कुछ चित्र - 















चित्रकार का नाम - सुरेन्द्र पासवान 

चित्रकार का ईमेल आईडी - udaysp3@gmail.com

Thursday, 12 November 2020

सूचना

कुछ व्यक्तिगत कारणों से बेजोड़ इंडिया के संचालक मंडल द्वारा मुख्य पेज और सहयोगी पेजों पर सामग्रियों का प्रकाशन बहुत सीमित कर दिया गया है। FB+ पेज, एडिटोरियल पेज और रिपोर्ताज का प्रकाशन फिलहाल पूरी तरह से बंद रहेगा। असुविधा के लिए खेद है। - संपादक

Saturday, 10 October 2020

राइजिंग बिहार" के द्वारा 3.10.2020 को ऑनलाइन कवि गोष्ठी सम्पन्न

फैक्ट्री आबाद उन्हीं दीन लोगों से !
 
(मुख्य पेज - bejodindia.in / हर 12 घंटों पर देखें- FB+ Bejod India /  यहाँ कमेंट कीजिए )




जब दोस्त बनते हैं, पुराने छूट जाते हैं 
मजबूत बंधन रिश्ते के भी टूट जाते हैं ! 
कसक यूं ना होती भूल जाने से पहले !,
 परखा जो मैं होता, अपनाने से पहले !

 श्रमिकों को कहां मिलती?, उनकी कमाई !, जबकि फैक्ट्री आबाद उन्हीं दीन लोगों से !/ कितना सहेज रखा फिर भी,  कभी-कभी गलतफहमी से, / रिश्तेदार यूं ही रूठ जाते हैं!/ मैं तो मर जाऊंगा,  तेरी कातिल अदा पे!/ सोच लेना जरा मुस्कुराने से पहले! / जो न बुरा देखे, बुरा  सुने, बुरा कहे !, मिला करो  बेहतरीन, ऐसे  तीन लोगों से!/ लगता कौन, कैसा कब? यह बताता है आईना /सब का सिर्फ सच ही,  दिखाता है आईना !!"

एक से बढ़कर एक अश'आर सुनाते रहे, झारखंड के वरिष्ठ शायर कामेश्वर कुमार "कामेश "ने, एकल ऑनलाइन एकल काव्य पाठ के मंच पर l  मौका था "राइजिंग बिहार"(साप्ताहिक) के तत्वाधान में आयोजित,  फेसबुक के "अवसर साहित्यधर्मी  पत्रिका" के पेज पर, "हेलो फेसबुक विविधा  कार्यक्रम के तहत!

कामेश्वर कुमार कामेश ' की सृजनात्मकता पर डायरी पढ़ते हुए, संयोजक और संचालक सिद्धेश्वर ने कहा कि-" यह  अधिकारी कवि आम-आदमी की तरह व्यक्ति, समाज, रिश्तो के बंधन की जीवंतता से भी खुद को अलग नहीं रख पाता  हैl 

जीवन की कर्म भूमि पर,  हाथों में लिए बंदूक को,  कलम बनाकर, कागज को अपने जीवन की स्याही से रंगने में,  कामेश्वर कुमार कामेश सृजनशील हैं  और संघर्षशील भी ! उनके शब्दों में गज़ब की कशिश है ! शब्दों में खनकती रवानगी है l कामेश की रचनाओं में, भविष्य की अनंत संभावनाएं देख रहा हूं l 

ऑनलाइन इस आयोजन के दूसरे सत्र में, विविधा कार्यक्रम के तहत,बेतिया से सत्यम मिश्रा, मधुरेश नारायण कुमारी अनुराधा, खुशबू मिश्रा,  ने संगीत गायन की प्रस्तुति दीl इसके अतिरिक्त नई दिल्ली से अनुजा मनु, नई दिल्ली से घनश्याम कलयुगी, गुजरात से संजीव प्रभाकर, लखीसराय से राजेंद्र राज, हाजीपुर से अपूर्व कुमार, मीना कुमारी परिहार और ऋचा वर्मा ने कविता, पूनम सिंह श्रेयसी ने शिव भजन,  राज प्रिया  रानी ने लघुकथा का पाठ कर, इंद्रधनुषी रंग बिखेरा l
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प्रस्तुति - ऋचा वर्मा
परिचय -  सचिव,  भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना 
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com

Monday, 21 September 2020

अजगैबीनाथ साहित्य मंच, सुल्तानगंज द्वारा अंगिका भाषा पर आधारित आनलाइन कवि गोष्ठी 20.9.2020 को सम्पन्न

 तब तक छै खुशी जब तक छै किसान 

(मुख्य पेज - bejodindia.in / हर 12 घंटों पर देखें- FB+ Bejod India /  यहाँ कमेंट कीजिए )


दिनांक 20.9.2020 रविवार को अजगैवीनाथ साहित्य मंच ,सुलतानगंज के तत्वावधान में अंगिका भाषा पर आधारित आनलाइन अंगिका कवि -गोष्ठी मंच के संस्थापक सदस्य डा. श्यामसुंदर आर्य की अध्यक्षता में आयोजित की गई जिसका संचालन मंच के अध्यक्ष व साहित्यकार भावानंद सिंह प्रशांत ने किया और संयोजन मशहूर शायर खडगपुर से  ब्रह्मदेव बंधु ने किया। कार्यक्रम में दर्जनों अंग कवियों ने अपनी -अपनी रचनाओं का पाठ किया। आयोजित कवि-गोष्ठी में सभी आमंत्रित कवियों को मंच द्वारा अंग-रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया। कवि -गोष्ठी में भागलपुर, बांका, मुंगेर, खड़गपुर, कहलगांव, गाजियाबाद, खड़गपुर और सुलतानगंज के अंगसपूत कवियों द्वारा कविता का पाठ किया गया।  

सर्वप्रथम भागलपुर के वरिष्ठ कवि व गीतकार राजकुमार ने अंगिका भाषा में माँ सरस्वती की आराधना अपना गीत गाकर किया फिर किसानों की व्यथा पर कहा -
तब तक छै खुशी जब तक छै किसान 
धरती के तोहीं हो भगवान। 
अंग जनपद के सिरमौर कवि त्रिलोकी नाथ दिवाकर ने प्रेम की परकाष्ठा और समर्पित प्रेमी की भूमिका को अंगिका गीत गाकर खूब तालियां बटोरी जिसके बोल थे - 
लाल कुरती पिन्हाय देभौं हे 

वहीं भागलपुर से कवियत्री डा. सुजाता कुमारी ने लाकडाउन में बच्चों की मनमानी पर उसकी बालपन को यूँ उतारा - 
आयको बूतरू बड़ो सियानो 
करथों भरदिन बडो मनमानो 
फिरू अंग जनपद के सम्मान में कहलकै -
अंग मंगल हुऐ ,जग मंगल हुऐ ,
अंग जनपद में प्यार सरल हुऐ । 

कहलगाँव से विख्यात कवि डा. इन्दुभूषण मिश्र देवेन्दु ने बेटी की शिक्षा को प्रसांगिक बताते हुए कहा - 
पढ़ी-लिखी के हम्हु बनवै मिस्टरनी 
गे माय ,भय्या के तों दहैं समझाय ...।

गाजियाबाद से सुप्रिया सिंह वीणा ने अपने गीत में बंटे हुए समाज के मनुष्य के एकलवाद पर प्रहार कर  कहा - उगथ्हैं सुरूज आग लगावै हमरा कि 
धधकी रौदा रौद जमावै हमरा कि । 

अंगिका के सपूत अंतरराष्ट्रीय कवि व हास्यव्यंग्य के प्रतिनिधि रचनकार रामावतार राही ने अपनी रचना से सबको लोहा मनवाया ,उन्होंने व्यंग्य में कहा - 
रोज गिनै छै नमरी बुल्लु ,हम्मे कि ,
तों छो उल्लू,घरो बैठी के फाँको बल्लू ।
पढ़ी -लिखी के तोंहे दुखिया 
ओंगठा छाप बनलै मुखिया।

बांका के कवि विकास सिंह गुलटी ने प्रकृति और पर्यावरण से जुडी रचना 
सुनाई-पीपरो के डारी पर ,
लरूआ के टाली पर ,
फुर -फुर उडै चिरैया ।

अंगिका के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय  कवि सुधीर कुमार प्रोग्रामर ने मार्मिक रचना पढ़ी-
जहिया सें आँखों के पानी हेरैलै ,
पुरानो - पुरानो कहानी हेरैलै ,
बुतरुआ के रोटी के फेरो में साहब ,
कमैतें -कमैतें जुवानी हेरैलै ,
सुनाकर अपनी रचना से सबको सोचै ले विवस करी देलकै ।

 मुंगेर से अंगिका के कवि शिवनंदन सलिल ने श्रृंगारिक रचना सुनाया - 
खुली गेलै कं खोपा .,
छिरयैलै गजरा ,छोड़ो -छोड़ो पिया जी 
ओझारै ले अचरा ,
सुनाकर मन मोह लिया।

अंग क्षेत्र के प्रतिष्ठित कवि श्यामसुंदर आर्य ने किसानों की बेबसी और वर्तमान में देश की हालात को निशाना बनाया और कहा - 
खेत में खटथैं कम्मर 
टुटलै ,देही के उड़लै खाल ,
हमरो खूनो सें देश चलै छै ,
हमरो हाल बेहाल 
,हम्मे  अपनो कि बतलैहियौं हाल ।

कवि मनीष कुमार गूंज ने समाजिक परिदृश्य की बदहाली पर कहा - 
हिन्ने जरलो ,हुन्ने मरलो ,
कचरा से सगरे छै भरलो ,
जरूरत जेकरा उ फरियावो ,
बेमतलब के नै गरियाबो ।

वहीं अंग जनपद के प्रतिनिधि अंगिका कवि डा. मनजीत सिंह किनवार ने अपने गीत के माध्यम सें समाज के वैविध्यपूर्ण चरित्र को रेखांकित किया जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में युवाओं की बेरोजगारी पर सटीक प्रहार था  - 
कोर -कसर जों रही गेल्हौं नौकरी के तैयारी में 
,इज्ज़त फेनु तें नहिएं मिलथौं ,जीवन भर सोसरारी में,
बिना नौकरिया दूल्हा के आबे हालत कि बतलैहियौं,
हमरो भोगलो बात छिकै आबे तोरा कि समझैहियौं 
कुरसी रहथैं बैठैले जग्हे दै छै गोरथारी में,...।  

अंगिका के वरीय कवि व दर्जनों किताब के रचयिता हीरा प्र. हरेन्द्र ने अपनी कविता के माध्यम से सबको अचंभित कर दिया ,उनके बोल -
केकरा कौने कहा पारतै ,
धरमराज युधिष्ठिर नाकी 
जुआ में बहुओ के हारतै ,
केकरा कौने कहा पारतै । 

वहीं मंच के अध्यक्ष व साहित्यकार भावानन्द सिंह प्रशांत ने भी अंगिका भाषा में दोहा और पावस गीत सुनाकर भाव विभोर कर दिया  दोहा में उन्होने आज  के भौतिकवादी परिवेश पर प्रहार करते हुए कहा -
 नै ऐंगना नै कुइयां ,कना होतै मटकोर। 
बिहौती घर अन्हार छै होटल होय इंजोर ।।
 पावस गीत में उन्होंने कहा - 
बरसै छै रिमझिम सावन के घनमा ,
धियावै तितलो यौवनमा हो ,बरसै छै रिमझिम ...  ।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रुप में शिवनंदन सलिल ,सुप्रिया सिंह  वीणा और डा. सुजाता कुमारी  व मुख्य अतिथि हीरा प्र. हरेंद्र थे और अति विशिष्ट अतिथि के रूप में डा. इन्दुभूषण मिश्र देवेन्दु उपस्थित थे ।

भागलपुर से वरिष्ठ कवि महेन्द्र निशाकर ने प्रकृति और गाँव पर रचना पढ़कर मन मोह लिया - 
परकृति रानी के गोदी में ,रचल- बसल छै गाँव 
,किन्हौं पोखरी के किनारी ,किन्हैं पीपल के छाँव ।
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रपट के लेखक - भावानन्द सिंह 'प्रशान्त'
रपट के लेखक का ईमेल आईडी -
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हिन्दी को सम्मान दो / कवि - बी. एन. विश्वकर्मा के परिचय के साथ

 कविता 

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कवि का परिचय - श्री (डॉ.) बी. एन. विश्वकर्मा एक जुझारू किस्म के और सब के मुँह पर भी खरी-खरी सुनानेवाले एक जीवट वाले व्यक्ति हैं. किन्तु अंदर से ये निर्मल हृदय रखनेवाले और बड़े ही मिलनसार किस्म के आदमी भी हैं. सादगी की प्रतिमूर्ति श्री विश्ववकर्मा जी राष्ट्रीय स्तर पर विश्वकर्मा समाज के प्रतिनिधि रहे हैं और उनके वृहत्तर समुदाय में अत्यंत लोकप्रिय भी रहे हैं. दशकों से अपने समाज के संघठन की कार्यकारिणी के महत्वपूर्ण पद को सुशोभित करते रहे हैं और पिछले लगभग एक दशक से साहित्य के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं.  इन्हें बिहार की हर लोकभाषा और हिंदी के साहित्यकारों के बारे में काफी ज्यादा जानकारी है यूँ कह लीजिए कि ये बिहारी साहित्यकारों की जानकारी रखनेवाले एक एनसाइक्लोपीडिया हैं. पहले इनके बहुमूल्य परामर्श पर हमने "साहित्य संस्कृति संसार बिहार"   नाम का फेसबुक ग्रुप चलाया गया था जो पूरे बिहार में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया था. बाद में राजनीतिक कार्यकरताओं के अति-हस्तक्षेप के कारण उसे बंद कर देना पड़ा. "बिहारी धमाका ब्लॉग" पर जिन साहित्यकारों की लोकभाषा में रचनाएँ हैं उनके बारे में बहुमूल्य परामर्श देनेवाले श्री विश्वकर्मा ही हैं. इनकी स्वयं की अनेक रचनाएँ विशेष रूप से मगही में इस ब्लॉग पर हैं. सक्रिय सामाजिक सरोकार रखनेवाले ये महत्वपूर्ण संस्कृतिनिधि स्वयं इतनी सादगी से रहते हैं और कि इनके भूतकाल के बारे में हमें इन्हीं से जानकारी मिली. इन्होंने बताया कि ये रसायनशास्त्र के प्राध्यापक रहे हैं और इन्होंने उस विषय में पी.एच.डी किया हुआ है. वर्तमान में बिहार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के एक महत्वपूर्ण सांगठनिक अवैतनिक पद पर वर्तमान हैं. इनकी विचारधारा उदार और सबको साथ लेकर चलनेवाली है. (-हेमन्त दास 'हिम')
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