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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@yahoo.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Friday, 19 July 2019

एक आम पीड़ित भारतीय पति की डायरी / हास्य कथा

हास्य कथा
कैटरीना खूबसूरत है या दीपिका इस पर डिबेट चल रहा है 
मगर मेरे ख्यालों मे तो है श्रीमती का तमतमाया चेहरा

(मुख्य पेज पर जायें- bejodindia.blogspot.com / हर 12 घंटे पर देखते रहें - FB+ Watch Bejod India) 

लेखक - प्रकाश रंजन 'शैल'

सुबह-सुबह कैंडी क्रश की सात लेवलें पार कर गया। दिन शायद अच्छा गुजरे मगर जाने क्यूँ श्रीमती गुस्से मे दिख रही हैं!

सब खैरियत हो अखबार में घुस जाऊँ। मोदी जी ने अच्छे दिनों के लिए कुछ घोषणाएं और कर दी हैं मगर श्रीमती की त्यौरियां चढी हुयी हैं। 

चलूँ  बालकनी में। पड़ोसन सामने बाल संवार रही है। चेहरा खिल उठा है। कनखियों से मगर देखता हूं तो श्रीमती अब भी नाराज दिखती हैं। 

सबेरे निकल लूँ आज। कार्यालय में दिन सामान्य-सा है। कैटरीना खूबसूरत है या दीपिका इस पर डिबेट चल रहा है मगर मेरे ख्यालों मे तो श्रीमती का लाल-लाल तमतमाया चेहरा नाच रहा है।

ओवरटाइम कर लेता हूँ मगर शाम को आफिस से घर लौटते कदम भारी हैं। पटना जंक्शन वाले महावीर मंदिर होते हुए डरते-सहमते वापस लौटा हूँ। श्रीमती बच्चों पर गुस्सा उतार रहीं है आज यकीनन कुछ होने वाला है।

मोबाइल, टीवी खतरनाक हैं सो बच्चों को पढाने को दुबक गया हूं। बीच-बीच मे हालात की बानगी लेता हूँ पर श्रीमती के सामान्य होने के आसार नही दिखते।

भारत ने पाकिस्तान से मैच जीत लिया है। मन खुश होना चाहता है उछलना चाहता है मगर श्रीमती के खौफ से जब्त कर लेता हूं। 
"जान है तो जहान है -
भारत और पाकिस्तान है।"

खाने की मेज पर खामोशी का साया है। पिन-ड्रॉप साइलेंस पसरा हुआ है और श्रीमती जी के तेवर अब भी चढे हुए हैं मेरा मन बुरी तरह से घबड़ाया हुआ है।

सिरहाने मे हनुमान चालीसा रख जल्दी से सो जाना हितकारी है मगर रात खौफनाक डरावने ख्वाबों से भरी हुयी होगी, यह सोच काँप उठता हूँ।

"पत्निम शरणं गच्छामि" - ज्ञान की प्राप्ति होती है और चरणागत हो जाता हूँ। 

"हे बच्चों की अम्मां, यह जो तुमने दुष्टों का संहार करनेवाला रूप धरा है उससे मेरा मन भावी अनिष्ट के लिए सशंकित है। अपने शरण मे आए हुए इस तुच्छ प्राणी का कल्याण करो बच्चों की माते। तुम जिस तरह जिस हाल मे रखोगी मै रह लूंगा किन्तु तुम्हारे मुखमंडल का यह तेज अब न सह सकूंगा प्रिये!"

श्रीमती के चेहरे पर अब मुस्कान है, 
हे दया की मूर्ति तू कितनी महान है।
(- एक आम पीड़ित भारतीय पति के एक आम दिन की ईमानदारी से की गयी डायरी इंट्री)
......

लेखक - प्रकाश रंजन 'शैल'
लेखक का ईमेल आईडी - prakashphc@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com

Thursday, 18 July 2019

उर्दू निदेशालय, बिहार सरकार द्वारा महफ़िल- ए-गंग-व-जमन" मुशायरा 16.7.2019 को पटना में सम्पन्न

जब कोई दीया दिल में जलाया जाय / सूरज से जरूरी नहीं कि पूछा जाय

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उर्दू निदेशालय (बिहार सरकार) के तत्वावधान में अभिलेखागार भवन, पटना में आयोजित "महफ़िल-ए-गंग-व-जमन" मुशायरा में, उर्दू - हिंदी के कई प्रतिनिधि शायरों ने, एक से बढ़कर एक शायरी से  समारोह को यादगार बना दिया। इस समारोह में "उर्दू-हिन्दी में भाषाई समरूपता" विषय पर सेमिनार का भी जबरदस्त समायोजन हुआ। 

कलाम शाफिफ ने कहा-
"प्यार का काम भी नफरत से लिया जाता है
अमन के नाम पर क्या-क्या न किया जाता है!
हम कलम वालों को कमजोर न समझों
क्योकि कलम का काम तीरों से भी लिया जाता है। "

 पूर्णिया की मंजुला उपाध्याय के गजल की बानगी देखिए -
"ऊपर-ऊपर खार समंदर होता है
भीतर भीतर मीठा-सा जल होता है!"

कासिम रजा़ ने राष्ट्रीय भावना से माहौल को ओर-प्रोत कर किया -  
"ये अपना वतन है अपना वतन 
हर रंग के फूलों का चमन ! 
खुसरो का गीत भी अपना है
भक्ति संगीत भी अपना है
दिल मोहता है मीरा का भजन!"

यशस्वी शायर नीलांशु रंजन की कविता की रवानगी भी खूब रही -
"सच तो ये है / मेरे साथ, 
फूल भी है / तुम्हारे इंतजार में!"

 कमला प्रसाद का कलाम -
"भाषा बहता हुआ  पानी  है
यह बहती हुई हवा भी है।"

सीतामढ़ी के शायर असरफ का कलाम देखिए -
"नापाक इरादों से हमें डरने की नहीं बात
 नफरत के सियासत को न हम हवा देंगे।

आराधना प्रसाद ने सरगमी आवाज में गजल  की गायिकी की-
"मैं साहिल पे बैठी थी तन्हा तमाशा
मेरी प्यास थी और दरिया तमाशा
सरे राह दामन हवा में उड़ाकर
मुझे तुमने कैसा बनाया तमाशा।"

"भाषा तोड़ने की नहीं, जोड़ने का काम करती है।"
 साहित्य का आकलन सिर्फ़ समीक्षक ही नहीं, पाठक भी करते हैं। 
पाठक को कमजोर नहीं समझना चाहिए।
" मैं बाजार जाता हूं,!" 
- इसे आप उर्दू में क्या कहेंगे? 'बाजार' को आप 'दुकान' कह सकते हैं, किन्तु "जाता हूं" को आप उर्दू में क्या कहेंगे? हिंदी उर्दू की जुबान को जब हम भाषा से जोड़ते हैं, तो 'मिठास' आती है, दोनों सगी बहनें हैं। किंतु जब इसे 'मजहब' से जोड़ते हैं, तब दुराव पैदा होता है।

यह कहना  गलत है कि 'उर्दू' में जो रवानगी है, वह हिंदी' में नहीं।'
" हिन्दी-उर्दू" के बीच 'समरूपता' की नहीं, 'समरसता' की बात होनी चाहिए।
"हिन्दी -उर्दू" में,' संज्ञा 'तो आती है, जाती है, किंतु' क्रिया',' सर्वनाम',' विशेषण' तो दोनों भाषाओं में एक है।"

"कोई बात तो ऐसी है 
कि हमारी हस्ती नहीं मिलती!" 
वह बात है, दोनों भाषाओं में समरूपता की। मजहब जानने वाले कहा करते हैं कि संस्कृत हिंदुओं और फारसी मुसलमानों की भाषा है। सच तो यह है कि धर्म की कोई भाषा नहीं होती। ये बातें भाषा विद्वान समझते हैं।

इस सभागार में बैठे विद्वान और श्रोताओं  जब यहां पर "उर्दू-हिन्दी भाषाई समरूपता" की बात कर रहे हैं, उसी समय न जाने कितने लोग सड़क से लेकर ऑफिस तक गलत कामों में लगे होंगे। भारतीय संविधान की नजर में  हिंदी और उर्दू दो अलग अलग भाषाएं हैं। उर्दूभाषी  वालों ने यह भी स्वीकार किया कि उर्दू बिहार में द्वितीय राजभाषा के रूप में होते हुए भी उर्दू बोलने वालों की कमी हो रही है, जो आज  छठे क्रम से सातवे क्रम में आ गई है।

"दोनों कौमों के बीच इतना जहर घुल चुका है कि दोनों कौम या भाषा एक नहीं हो सकती।" ऐसा अंग्रेज सरकार समझा करती थी। किंतु सदियों की सोच से आगे आज हमारी सोच हैं। बावजूद " भाषा को तहजीब और धर्म से बहुत अलग हम नहीं कर सकते! - ऐसा विचार रखनेवाले उर्दूभाषियों की भी आज कमी नहीं है!"

सब कुछ आप बांट सकते हैं, किंतु नसीब को नहीं बांट सकते। पैसा, जमीन नहीं है तो उसे हम पैसा और जमीन दे रहे हैं। आप भाषा और व्याकरण में ज्यादा उंगली न कीजिए। हमारे पास भाषा की दरिद्रता है। इसे हम क्यों नहीं बांटा करते हैं? मां की आंचल में हमने जिस. भाषा को पढ़ा और जाना, उसे उपेक्षित करना, हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है?! भाषा समरूपता की बात करना और इस चर्चा में हिस्सा लेना, ये दोनों, एक राष्ट्रीय कार्य है।

 मशहूर कवि प्रेमकिरण ने कहा- 
"नफरत ही रह गई है मोहब्बत चली गई 
दो भाईयों के बीच की नफरत न पूछिए
घर की बात थी, अदालत चली गई!"

अरुण कुमार आर्या की गजल-
"गीता का मर्म कुरान का फरमान है दिल में! "
"हिंदी-उर्दू तो है सगी बहनें
इसे मजहब से न जोड़ा जाए!"

संजय कुमार कुंदन"ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज की-
"गर्म हवा बाहर से आई आकर है कमरे में बंद
दीवारों के खोल में घुसकर है गोशे-गोशे में बंद।"

"अंधेरे में साए भी साथ छोड़ देता है। 
दुखों की भीड मे हंसना - हंसाना भूल जाती है
गरीबी मुफलिसी में, मुस्कुराना भूल जाती है" - असद सिद्दीकी की ये गजल थी।

एम के बजाज की गंगा-यमुनी मिजाज की गजल सुनाया -
"हिंद की शान है उर्दू / इश्क की जुबां है उर्दू! 
लब चूमने को चाहे / वो जुबां है उर्दू!!"

वरिष्ठ कवयित्री शांति जैन नेप्यार की परिभाषा यों दी-
"प्यार दिन का उजाला नहीं है
प्यार तो रात की चांदनी है 
प्यार है आंसुओं की कहानी और 
"अपना साया भी अजनबी लगे
प्यार से मेरा नाम लेना तुम!"

वरिष्ठ शायर नौसाद औरंगाबादी का तेवर देखिए -
"ये किस शमां कि तहजीब है कि
 जुंबा पर राम-राम न हो, 
दुआ सलाम न हो।" 
"जब कोई  दीया, दिल में जलाया जाए 
सूरज से जरूरी नहीं कि पूछा जाए!"
.....

आलेख - सिद्धेश्वर
छायाचित्र - सिद्धेश्वर / आराधना प्रसाद
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com
नोट - भाग लेनेवाले जिन शायरों की पंक्तियाँ या चित्र शामिल नहीं हो पाये हैं कृपया ऊपर दिये गए ईमेल से भेजिए.
 









    




Saturday, 13 July 2019

सुधरे हमारे देश के हालात किस तरह / बाबा बैद्यनाथ झा की ग़ज़ल और कुंडलियाँ

  ग़ज़ल
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ग़ज़लों में भर  सकूँ कहो जज़्बात किस तरह  
सुधरे   हमारे   देश   के  हालात  किस  तरह

उजड़े  ही  जा  रहे  यहाँ  जंगल  पहाड़  भी 
ले साँस  जब हवा नहीं  नवजात किस तरह 

बेटी  हुई  जवान  अब  है   वह  पढ़ी-लिखी 
लाए   ग़रीब  बाप   है  बारात  किस  तरह 

'बाबा'  हमारे  मंच  पर  शायर  कमाल के
ग़ज़लों की हो रही यहाँ बरसात किस तरह
...


              वृक्षारोपण  पर कुण्डलियाँ               



   1
                
भक्षक  बनते   जा  रहे, जंगल  के  हम आप।
कुपित  आज  पर्यावरण, देता  है  अभिशाप।।

देता   है   अभिशाप,  उजड़ते  जाते  जंगल।
प्राणवायु   हो   लुप्त,  कहें   कैसे  हो  मंगल।।

नित्य   लगाएँ  पेड़,  बनें  हम   वन-संरक्षक।
या कर देगी नाश, प्रकृति ही बनकर भक्षक।।


2
                    
होती  ही   है  जा  रही, हरियाली  अब  लुप्त।
मानवीय     संवेदना,   क्रमशः   होती   सुप्त।।

क्रमशः  होती  सुप्त,  नित्य   हम  पेड़ लगाएँ।
हरे   भरे   वन  बाग,  सजाकर  स्वर्ग  बसाएँ।।

करे  प्रकृति तब नाश, धैर्य जब अपना खोती।
कभी अकारण क्रुद्ध,नहीं कथमपि वह होती।।
...

कवि- बाबा वैद्यनाथ झा 
कवि का ईमेल आईडी - jhababa55@yahoo.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी- editorbejodindia@yahoo.com




Thursday, 11 July 2019

खूब मुझको अब बजाएँ झुनझुना है ज़िन्दगी / कैलाश झा किंकर की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल-1

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खूब मुझको अब बजाएँ झुनझुना है ज़िन्दगी
मुफलिसों की चारसू संवेदना है ज़िन्दगी 

नौनिहालों के लिए भी तुम नहीं गंभीर हो
लग रहा चारों तरफ उत्तेजना है ज़िन्दगी 

धन-कुबेरों पर टिकी हैं आज भी उनकी नज़र
कामगारो ! देख अन्धेरा घना है ज़िन्दगी 

आस की खेती हुई पर हर तरफ उल्टा असर
लूटने वालों से करती सामना है ज़िन्दगी 

था जहाँ संतोष धन उसकी जगह ले ली हवस
स्वार्थ में अन्धी बनी दुष्कामना है ज़िन्दगी 

हो रही घटना मुसलसल शर्म से झुकता है सिर
सिरफिरों की सोच में बस वासना है ज़िन्दगी ।
.....

ग़ज़ल-2

खुशी झूमती आशियाँ तक न आयी
कभी बात मेरी जुबां तक न आयी ।

बहन लौटकर जा चुकी माँ से मिल कर
बगल में हूँ फिर भी यहाँ तक न आयी।

पुकारा था उसने मदद को यकीनन
सदा ही मेरे कारवां तक न आयी।

दिलों में वही एक रहता है हरदम
कभी शान जिसकी गुमां तक न आयी।

अदब की ये दुनिया है जन्नत की दुनिया
न कहना ग़ज़ल कह-कशाँ तक न आयी ।
....
कवि - कैलाश झा किंकर 
कवि का ईमेल आईडी - kailashjhakinkar@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com




मुंशी प्रेमचंद लिखित "दिल की रानी" और रंगमार्च द्वारा उसका 27.6.2019 को पटना में मंचन

प्रेम कहानी के बहाने धर्मांधता का पर्दाफाश
तैमूल लंग और हबीबा बानो

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धर्म कोई भी अच्छा ही होता है लेकिन जब उसकी आड़ लेकर हत्या और आतंक जैसे खूंखार अत्याचारों को अंजाम दिया जाता है तो इसमें धर्म की नहीं बल्कि उसका गलत इस्तेमाल करनेवालों का दोष होता है। ऐसे  भटके हुए लोगों को धर्म का सच्चा स्वरूप दिखा कर सुधारा जा सकता है।

बिहार आर्ट थियेटर द्वारा 58वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित पाँच दिवसीय नाट्योत्सव के तीसरे दिन प्रेमचंद की कहानी ‘दिल की रानी’ का मंचन रंग मार्च, पटना के कलाकारों ने मृत्युंजय शर्मा के निर्देशन में किया। यह मंचन 27.6.2019 को कालिदास रंगालय, पटना में हुआ

चौदहवीं सदी का ताकतवर और खूंखार शासक तैमूर लंग अपने जीवन के अंतिम दिनों में कुस्तुनतुनिया के शासक खलीफ़ा वायजीद की सेना को अंकारा के प्रसिद्ध युद्ध में परास्त कर चुका है और पूरी सेना उसके सामने घूटनों पर बंधक है। जन्म से तुर्क तैमूर के पिता ने इस्लाम कुबूल किया था, इसलिए वो इस्लाम का कट्टर अनुयायी है। उसके सामने हारी हुई सेना का सेनापति यजदानी बेडि़यों में जकड़ा खड़ा है। उसी जमात में यजदानी का जवान बेटा जो कि वास्तव में सैन्य भेष में उसकी बेटी हबीबा बानो है, भी शामिल है। अचानक वो तैमूर को ललकारते हुये इस्लाम की सच्ची नसीहत देती है। खुद को कट्टर मुसलमान, विश्व विजेता और कुरान-ए-पाक को कंठस्थ रखने वाला तैमूर उसकी हिम्मत से इतना प्रभावित होता है कि उसे अपने शासन में बज़ीर का पद पेश करता है और हारी हुई पूरी सेना को माफ़ कर देता है। 

इधर हबीबा की माँ और यजदानी इस बात को लेकर बेहद चिंतित होते हैं कि इतने खूंखार शासक के साथ उसकी जवान बेटी कैसे रहेगी? लेकिन हबीबा इस चुनौती को इस जिम्मेदारी के साथ कबूल करती है कि खुदा ने इस्लाम की नसीहतों से भटक कर लूट और आतंक की राह पर चलने वाले एक बादशाह को अगर वो सही रास्ते पर लाती है, तो यह ईमान और इंसानियत पर बहुत बड़ा उपकार होगा। इसके बाद तैमूर हबीबा की नसीहतों, इस्लाम की इल्म का इतना मुरीद हो जाता है कि उसकी बात आंख-मूंद कर मानता है।

 एक बार तैमूर द्वारा पूर्व में अन्य धर्म के लोगों, जिसे वो काफि़र कहता था, के खिलाफ़ लिये गये कई फ़ैसले के खिलाफ़ इंसानियत के पक्ष में हबीबा खड़ी हो जाती है और बगावत कर देती है। तैमूर इससे आहत होता है, परंतु वो हबीबा के इस्लाम संगत तर्को और कुरान में छिपे मानवता के संदेश का मुरीद होता है। और वो गैर धर्मो के सारे अधिकारों, आजादी और विभिन्न लगाये गये करों से मुक्त करने का आदेश देता है। खूंखार मंगोल शासक चंगेज खाँ और विश्व विजेता सिकंदर को अपना आदर्श मानने वाले तैमूर के अन्तर्मन में अपने द्वारा किये गये अत्याचारों, हत्याओं पर पश्चाताप चल रहा होता है और ऐन वक्त पर हबीबा के इस्लाम और कुरान की आयतों में तर्ज किये गये तर्क उसे एक नई राह दिखाती है। दरअसल, पहली नजर में हीं तैमूर, हबीबा की आंखों में झांककर यह जान चुका था कि वो नवजवान एक नेक दिल लड़की है और उसे अपने दिल की रानी बना चुका था। बाद में यही हबीबा बानो इतिहास के पन्नों में तैमूर की बीबी ‘बेगम हमीदा’ के नाम से मशहूर हुई।

प्रेमचंद की कहानी के बहाने धर्म की आड़ में आतंक और लूट की वैश्विक स्तर पर चल रही अंधाधुंध घटनाओं को चित्रित करने का यह प्रयास था। यह नाटक धर्मांधता में आतंक का प्रतीक 14वीं सदी का खूंखार शासक तैमूर के बहाने विभिन्न प्रतीको, प्रासंगिक घटनाक्रम और समकालीन कथ्य से आज आतंकवाद से बदहाल मानवता को प्रेम एवं शांति का संदेश देने की कोशिश करती है। "रंग-मार्च" के अनुभवी कलाकारों के साथ एक अच्छी प्रस्तुति का होना लाज़मी था। 

मंच पर अभिनेता थे तैमूर - राजन कुमार सिंह, हबीबा - नूपुर चक्रवर्ती, यजदानी (हबीबा के पिता) - सोनू कुमार,
नगमा (हबीबा की माँ) - सरिता कुमारी, बज़ीर - समीर रंजन और अन्य भूमिकाओं में थे पंकज सिंह, रवि पाण्डेय, गौतम कुमार, जिशान साबिर, आशीष सिंह, रौनक राज एवं सृष्टि शर्मा

नेपथ्य के कलाकार थे, प्रकाश परिकल्पना - उपेन्द्र कुमार, मंच परिकल्पना - अनुप्रिया, परिधान एवं वस्त्र - सरिता कुमारी,  रूप-सज्जा - नूपुर चक्रवर्ती,  प्रस्तुति सहयोग- प्रग्यांशु शेखर, भृगृरिषी कुमार एवं राज पटेल, सगीत संयोजन / संचालन- रौशन कुमार केशरी, प्रस्तुति नियंत्रक- दिपांकर शर्मा, प्रस्तुति प्रभारी - रविचन्द्र पासबाँ, प्रेक्षागृह प्रभारी -ज्ञान पंडित, विक्की राजवीर, अभिषेक आनंद।  कहानी  मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित थी और नाट्य-रूपांतरण एवं निर्देशन किया था मृत्युंजय शर्मा  ने

प्रेमचंद रचित यह कहानी जिसका सुंदर मंचन हुआ, की प्रासंगिकता आज किसी एक राज्य या देश में नहीं बल्कि पूरे विश्व में हैं जहाँ धर्म के नाम पर आतंक अपना नंगा नाच दिखा रहा है।
............

आलेख - बेजोड़ इंडिया ब्यूरो
छायाचित्र - "नाटक बाला फोटो" से साभार
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com
















Friday, 5 July 2019

साहित्य परिक्रमा तथा व. ना. साहित्यकार मंच द्वारा पटना में 4.7.2019 को कवि गोष्ठी सम्पन्न

शाम की तन्हाइयों में तुम चले आओ
सुपौल और सिलचर के साहोत्यकारों ने भी भाग किया

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"गुलशन गुलशन खार दिखाई देता है

मौसम कुछ बीमार दिखाई देता है"
मौसम बरसात का यूँ तो बहुत सुहावना होता है लेकिन अक्सर कवियों को गुलशन की हरियाली में खार भी नजर आने लगते हैं. इस बहुरंगी मौसम में कवियों की रचनाएँ भी विविध स्वरूप लेकर बाहर आती हैं.

दिनांक 4.7.2019 को  साहित्य परिक्रमा तथा वरिष्ठ नागरिक साहित्यकार मंच,पटना के संयुक्त तत्वावधान में  मधुरेश नारायण जी के गोबिंद इंक्लैव अपार्टमेंट, चांदमारी रोड, पटना स्थित आवास पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया.

गोष्ठी की अध्यक्षता सुप्रतिष्ठित कवि,गीतकार और कथाकार भगवती प्रसाद द्विवेदी तथा संचालन मशहूर  चित्रकार और कवि सिद्धेश्वर ने किया.

गज़लकार प्रेम किरण ने अपने जोशीले अंदाज में इन्सान की नाकामियों पर सवाल उठाया-
कर सकेगा वो हमें बर्बाद क्या 
हम हुए भी हैं कभी आबाद क्या?
कोई मैंना है न बुलबुल शाख पर 
बागबां भी हो गए सैय्याद क्या?

मधुरेश शरण ने शाम को अपने इष्ट को लौटाने को कहा - 
शाम की तन्हाइयों में तुम चले आओ
जाओ कहीं दूर मगर लौट के आ जाओ.

डॉ. किशोर सिन्हा ने हसरतों का नई तस्वीर खींची -
हसरतें हरी घास बन कर उगती है आस पास.

घनश्याम ने गुलशन में आजकल सिर्फ ख़ार ही ख़ार दिख रहे हैं -
गुलशन गुलशन खार दिखाई देता है
मौसम कुछ बीमार दिखाई देता है
जाने कैसी हवा चली है जहरीली
जीना अब दुश्वार दिखाई देता है
आगजनी, पथराव, धमाके, खूंरेजी
आतंकित घर-बार दिखाई देता है
विध्वंशक हो गई समय की गतिविधियाँ
संकट में संसार दिखाई देता है.

हास्य कवि विश्वनाथ प्रसाद वर्मा ने दाँव-पेंच की बात की -
दाँव पेंच खूब जानते हो
रात दिन डींग़े हाँकते हो.

सिलचर से पधारे चितरंजन भारती ने पक्षधर होने पर भी लाभ न पाने का दृश्य रखा -
हम साधारण जन
पक्षधर होकर भी क्या मिला?

सुपौल से आये हुए योगेन्द्र हीरा ले अपने मकान की नींव कहाँ पर डालिए, देखिए -
मेरी भी कल्पना थी मकान की
लेकिन नींव ली भावना की कब्र पर.

कुशल संचालन कर रहे सिद्धेश्वर ने खुद से सवाल किया -
मंदिर हो, मस्जिद हो, गुरुद्वारा ऐ सिद्धेश
तूने कहीं भी सर को झुकाया नहीं है क्या?

हरेन्द्र सिन्हा ने बरसात में वसंत की बहार ला दी -
तुम क्या मिले हर पल मेरा जीवन्त हो गया
देखो सनम मौसम हसीं वसन्त हो गया
कोई शकुन्तला तो कोई दुष्यंत हो गया.

शायर शुभचन्द्र सिन्हा पर सितम ही सितम हो रहे हैं -
इक तेरे ख्यालों के सितम हैं बेशुमार
उस पर तेरे न आने के बहाने हैं बहुत.

इनके अतिरिक्त विभारानी श्रीवास्तव, लता प्रासर और शशिकान्त श्रीवास्तव की कविताएँ भी पसंद की गईं.

अंत में गोष्ठी के अध्यक्ष भगवती प्रसाद द्विवेदी ने पढ़ी गई रचनाओं पर अपनी संक्षिप्त टिप्पणी करने के बाद अपनी कविता में सफलता पाकर जड़ को भूल जानेवालों को याद किया -
कहाँ गए वो लोग / वो बातें उजालों से भरी
कामयाब जो हुए / उड़नछू होते चले गए.

लगभग तीन घंटे तक चली इस सार्थक गोष्ठी में साहित्यानुरागी बीना गुप्ता और आशा शरण की उपस्थिति भी महत्वपूर्ण रही. सभा के विधिवत समापन के पूर्व मधुरेश नारायण ने रचनाकारों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया.
......

आलेख - घनश्याम / बीना गुप्ता सिद्धेश
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
लेखक का ईमेल आईडी - sidheshwarpoet.arat@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com








Tuesday, 2 July 2019

ये पब्लिक इस्कूल या कि सोने के अंडे हैं / हरिनारायण सिंह 'हरि' के दो गीत

 गीत-1

(मुख्य पेज पर जायें- bejodindia.blogspot.com / हर 12 घंटे पर देखते रहें - FB+ Watch Bejod India)



ये पब्लिक इस्कूल या कि सोने के अंडे हैं 
क्यों गरीब पढ़ पायेंगे, सम्मुख ये डंडे हैं ।

मोटी-मोटी फीस और ऊपर से डोनेशन
छांट-छांट बच्चों को पढ़ा रहा है यह नेशन।
'शिक्षा का अधिकार सभी को' ऊंचे झंडे हैं !
ये पब्लिक इस्कूल या कि सोने के अंडे हैं ।

रोज-रोज के ड्रेस-चेंज ये खेल अजूबे हैं
साल-साल पर पुस्तक बदले, क्या मंसूबे हैं!
संचालक के लिए देश में हर दिन संडे हैं 
ये पब्लिक इस्कूल या कि सोने के अंडे हैं ।

कैसा है यह न्याय, विषमताओं को प्रश्रय दे,
दीनों के बच्चे अनपढ़ हों ,रह -रह सुबकी लें।
और अमीरों के बच्चे विद्वान! वितंडे हैं!
ये पब्लिक इस्कूल या कि सोने के अंडे हैं !

शिक्षा की यह नीति देश को कित ले जायेगा,
सिर्फ अमीरों का बच्चा ही इत रह पायेगा ।
ये समानता लाने वाले ही हथकंडे हैं !
ये पब्लिक इस्कूल या कि सोने के अंडे हैं !
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 गीत-2
    
तुम्हारे नेह का न्योता अभी तक याद है मुझको !

निमंत्रण प्रेयसी तेरा कभी क्या भूल पाऊँगा 
जनम भर याद रक्खूंगा,सदा सुधि में बुलाऊंगा।
नहीं जो पा सका तुझको, कहाँ अवसाद है मुझको !

स्वयं को देख सकती हो, अरे ये गीत  मुखरित हैं
ललित लय छंद तो सारे प्रिये तुमको समर्पित हैं।
इसी के मार्फत तुमसे हुआ संवाद है मुझको !

मिलन कब सतत रहता है, विरह शाश्वत रहा सब दिन
खुशी के पल क्षणिक होते,न कटते विरह-दिन गिन-गिन।
              तुम्हारी याद ने ही तो किया आबाद है मुझको!              
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कवि- हरिनारायण सिंह 'हरि'
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