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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@yahoo.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Wednesday, 20 March 2019

भा. युवा साहित्यकार परिषद और स्टे,रा.भा.का.स., का होली मिलन काव्योत्सव 19.3.2019 को संपन्न

होली में नशा का क्या कहना /  साली को कहे घरवाली और घरवाली को बहना 
( बिहार दिवस - 22  मार्च पर भागवतशरण झा 'अनिमेष' की विशेष कविता पढ़िए - यहाँ क्लिक कीजिए )



भारतीय युवा साहित्यकार परिषद् और स्टेशन राजभाषा कार्यान्वयन समिति के संयुक्त तत्वावधान में राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्थित रामवृक्ष बेनीपुरी पुस्तकालय में होली मिलन काव्योत्सव का आयोजन किया गया.काव्योत्सव की अध्यक्षता जाने माने शायर रमेश कंवल ने की. संचालन कवि, कथाकार और चित्रकार सिद्धेश्वर ने किया. इस अवसर पर पूर्व मध्य रेलवे दानापुर के राजभाषा अधिकारी राजमणि मिश्र ने मुख्य अतिथि के रूप में आयोजन का शुभारंभ होली पर अपने संस्मरणात्मक ललित निबंध के पाठ से किया.

रंगों से खेलती हैं जाग रहीं संवेदना
जोशीले गीत लिखती हैं ये कल्पनाएँ
होली में नशा का क्या कहना 
  साली को कहे घरवाली और घरवाली को बहना 
(सिद्धेश्वर प्रसाद)

हौले हौले चुपके चुपके है ये किसकी आहट
खिड़की से बाहर झांका तो खड़ी मिली फगुनाहट 
(-मधुरेश नारायण)

फागुन ने तन को छुआ मन में उठी उमंग 
पुलकित होकर झूमने लगा अंग प्रत्यंग 
(-घनश्याम) 

होली की उमंग है बाजे मिरदंग है 
मौसम के यौवन पर चढ़ गया रंग है 
(-एम. के. मधु)

हर शिकवे गिले मिटाकर लग जाओ गले कि  आज होली है 
ज़ुज्फें अपनी बिखराकर आ जाओ कि आज होली है 
(-शमा कौसार शमा)

काँटों को भी अबीर लगाती हुई गली
उड़ता हुआ गुलाल फिजां में गली गली 
हर सम्त नाचती हुई मस्तों की मंडली 
(-मो. नसीम अख्तर)

होली के अवसर पर शुभकामनायें लीजिए 
मेरी और पंक्तियाँ चाँद लिजीये 
(-जयंत)

कैसे मनाऊँ अब के बरस अब मैं होली 
भले जवानी में सज धज कर खेली सपनों की होली 
वहीं आतंकी सरहद पर खून की खेलें होली 
(-अर्चना त्रिपाठी)

महबूब की याद में भटकते क्यों 
फंदे गले में डाल  के लटकते क्यों 
मोहब्बत किया तो क्या होश नहीं था
अपने सर को शिला पर पटकते क्यों 
(- श्रीकांत व्यास)

कौन रिश्ता वफ़ा निभाता है 
आजमाते हैं तो रुलाता है 
मरकजज़े- दिल रहे वहीं कायम 
मौत तक साथ जो निभाता है 
(- सुनील कुमार)

होली की बहारें आई हैं 
मस्ती की फुहारें लाई हैं
फागुन का महीना नस नस में 
शालीनता ने तोड़ी कसमें 
(-रमेश कँवल)

काव्य गोष्ठी में कवयित्री लता प्रासर, डा.अर्चना त्रिपाठी, शमा कौसर, शायर सुनील कुमार, नसीम अख़्तर, जयंत कुमार, श्रीकांत व्यास, डा.एम.के.मधु, मधुरेश नारायण, रमेश कंवल और सिद्धेश्वर के अलावा घनश्याम ने  भी काव्य पाठ किया.इस अवसर पर उर्दू एकेडमी, पटना के सचिव परवेज़ आलम ने होली के उपलक्ष्य में अपना उद्गार व्यक्त करते हुए उपस्थित कवियों और शायरों को अपनी शुभकामनाएं अर्पित की. धन्यवाद ज्ञापन नसीम अख्तर ने किया.

काव्य गोष्ठी में कवियों और शायरों ने होली पर आधारित रचनाओं का पाठ कर वातावरण को सरस और रंगीन बना दिया. गोष्ठी का समापन उपस्थित लोगों ने एक दूसरे को गले लगाकर और चेहरे पर गुलाल लगाकर किया। 
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आलेख -  घनश्याम /  सिद्धेश्वर 
छायाचित्र - भारतीय युवा साहित्यकार परिषद
संयोजन और प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com
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होली के अवसर पर एक पूरी ग़ज़ल  - 

गाल पर मल दो कभी भी रंग होली में
है नहीं छूना मनाही अंग होली में

खीर पूड़ी मालपूआ का मजा दूना
आप जब खाते मिलाकर भंग होली में

कस कमर फौलाद कर लो देह होली में
वाह क्या होती सुहानी जंग होली में

फाड़ते हैं लोग कुर्ता पायजामा भी
क्या कभी देखा नहीं हुड़दंग होली में

यार तुम बचना सँभल कर रंग को मलना
भाभियाँ करती बहुत ही तंग होली में

लोग तुमको प्यार आदर मान भी देंगे
प्यार का जब तुम बहाते गंग होली में
...
(कवि - अवधेश कुमार आशुतोष)
avadheshkumar973@gmail.com
इस होली ग़ज़ल में मात्रा अनुक्रम-  2122  2122 2122 2









   



Monday, 18 March 2019

मुजफ्फरपुर में एक संगीत महाविद्यालय का वार्षिकोत्सव 17.3.2019 को मनाया गया

नैनों की बात नैना जाने हैं
शास्त्रीय संगीत, भाव-नृत्य और होली गीतों से छा गई बहार




हमारे देश की मिट्टी में ही गीत संगीत है। हम लोकगीतों में पलते बढ़ते हैं और शास्त्रीय संगीत हमारी चेतना को अनुरंजित करता है  जीवन भर। जीवन के उल्लास का सार संगीत में ही है जहां से यह उत्पन्न भी होता है और जिसके द्वारा अभिव्यक्त भी । किन्तु हमारे जीवन में संगीत अचानक से नहीं टपकता संगीत का संस्कार बच्चों में कम उम्र से ही डालना पड़ता है। लोकगीतों से इतर हर संगीत की विधा में कठिन प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होता है। इस सन्दर्भ में देश के दूर दराज के कस्बों और शहरों में फैले संगीत महाविद्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है

हालांकि आज फ़िल्मी संगीत ने हमारे संगीत के मूल स्वरूप का काफी हद तक अतिक्रमण कर रखा है फिर भी देश के संगीत संस्थान आज भी विशुद्ध भारतीय संगीत को भी अपने मूल रूप में अक्षुण रखने में कामयाब हुए हैं

मुज़फ़्फ़रपुर के रसूलपुर जिलानी में स्थित विनोद कल्पना संगीत महाविद्यालय का वार्षिकोत्सव के अवसर पर कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला जहां एक आकर्षक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। मुज़फ़्फ़रपुर पूर्वी के एसडीओ डॉ कुंदन कुमार संदीप शुक्ला, संगीतज्ञ डॉ अरविंद कुमार, लक्ष्मेश्वर प्रसाद, विनय कुमार, कुमारी कल्पना, नीलम शुक्ला व संगीतालय के निदेशक डॉ संजय संजू ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का उद्घाटन किया।

इसके बाद अतिथियों के सम्मान में छात्राओं के द्वारा स्वागत गान प्रस्तुत किया गया। अलकनंदा वत्स ने राग मालकौंस गा कर शमा बांध दिया।'नैनों की बात नैना जाने हैं' गीत पर रजनी ने भाव नृत्य किया तो श्रोता तालियां बजाने लगे।संगीतालय के छात्र व बिग बॉस 12 के फाइनल में पहुंचने वाले दीपक ठाकुर ने एक से बढ़ कर एक गीत गाया तो पूरे श्रोता खड़ा हो कर तालियां बजाने लगे। एक सुन्दर  गीत सृष्टि शर्मा ने गाया। 

राग पुरिया घनाश्री गाकर अमर सिंह राणा ने माहौल को खुशनुमा बना दिया। विजया प्रकाश ने जब भाव नृत्य किया तो श्रोता देखते ही रह गए। शुभांगी के द्वारा 'घूमर' पर नृत्य प्रस्तुत किया गया। एक लोकप्रिय गीत आयुषी राज ने गाया। मास्टर श्याम बिहारी, कुणाल राजवीर, सुधाकर नारायण, शेखर अरोड़ा, सुहानी ,सोनी, अंजलि,श्वेता,अर्चना वर्मा,श्रेया राज ,मेहंदी ,सुनील कुमार, निधी कुमारी, इक्षा यादव, स्वास्तिका, क्षमा शर्मा, गौरव ज्ञान आदि ने अपना गीत प्रस्तुत किया।

निशा, श्रेया राज, अलकनंदा वत्स, कैवल्या, मनीषा, प्रियांशी, सुहानी आदि ने भाव नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में होली का गीत प्रस्तुत किया गया। इंदु बाला सिन्हा, प्रेम रंजन व मास्टर श्याम बिहारी ने होली गीत गाया तो पूरा माहौल होलीमय हो गया।

मंच संचालन अमीर हमज़ा तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ संजय संजू ने किया। इस कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग उपस्थित थे जिनमें मुख्य रूप से डॉ संजय पंकज, एम एस हुसैन'आज़ाद', डॉ कुमार विरल, परमानंद, मधुमिता कुमारी, मो तमन्ना,  नवीन कुमार, सुमन वृक्ष, दीपक टंडेल, प्रमोद आज़ाद, प्रमोद सहनी आदि।
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आलेख - अमीर हमजा 
छायाचित्र सौजन्य - अमीर हमजा 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com
  

















Sunday, 17 March 2019

खगड़िया में हिंदी भाषा साहित्य परिषद द्वारा लोकार्पण -सह- वसंतोत्सव कवि सम्मलेन 17:03:2019 को संपन्न

संगिनी के संग छिकै ,मोन फगुआय छै
हिंदी और अंगिका  में होलियाई कवितायेँ 



हिन्दी भाषा साहित्य परिषद् खगड़िया की वार्षिक पत्रिका " स्वाधीनता संदेश -2019 " का लोकार्पण -सह-बसंतोत्सव कविसम्मेलन " का आयोजन वीणा प्राइमरी एकेडमी, पिपरा, चौथम के प्रांगन में दिनांक 17:03:2019 (रविवार) को अवधेश्वर प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम के उद्घाटन कर्ता थे समस्तीपुर से पधारे कवि हरि नारायण सिंह हरि,मुख्य अतिथि थे दरभंगा से पधारे विनोद कुमार हँसौड़ा और विशिष्ट अतिथि थे सलीमनगर से पधारे ग़ज़लकार मो0 रिज़वान खाँ अहमक । स्वागतसचिव शिवकुमार सुमन ने अतिथियों का स्वागत किया और पुष्पा झा ने स्वागत गान गाकर अतिथियों का स्वागत किया। दीप प्रज्वलित करके हरि नारायण हरि ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया। मुख्य अतिथि समेत सभी मंचस्थ अतिथियों ने स्वतंत्रता संदेश-2019 का विमोचन किया। मंच संचालन कैलाश झा किंकर ने किया।

कविसम्मेलन की शुरुआत कविता कोश के उप-निदेशक -सह-कार्यकारी सचिव,हिन्दी भाषा साहित्य परिषद  राहुल शिवाय की सरस्वती वन्दना से हुई-
सादगी-सुअम्ब गहे, सरस-मधुर बहे,
पिंगल-पीयूष भरा, मधुरस गान दो l

सुखनन्दन पासवान ने होली गाकर वसंतोत्सव को सीधे परवान पर चढ़ा दिया-
देखो बसंत बहार,ऐलो होली के त्योहार
करो मन मे विचार यही देहिया में 
रंग,अबीर लगाबो, मन के मैल मिटाबो
खुशी खुशी रहो ऐ नगरिया में ।

मो0 रिजवान खाँ अहमक-
दिल के जलते हुए शोलों पे चले हैं अब तक
इश्क में मेरी तरह कौन जले है अब तक ।

विनोद कुमार हँसौड़ा-
ढूँढ़ता हूँ ऐसे नौजवान को
स्वर्ग जो बनाए हिन्दुस्तान को
और 
झलकता है दिलों से दिल का सच्चा प्यार होली मे
सदा होता है बत्तीसी का दीदार होली में ।

प्रीति कुमारी निराला-
धूप से गिला क्या करें जब छाँवों ने ही जला दिया।
गैरों की शिकायत क्या करूँ,जब अपनों ने ही दगा दिया

हरि नारायण सिंह हरि-
किंकर जी की बात न पूछो कालिदास अवतार
कविता को दूतिनी बनाकर प्रेम बढाते यार -जोगिरा सारा रा रा---

शिव कुमार सुमन -
सपने लाख हजारों पर
नींद कहाँ अंगारों पर ।

सुमन कुमार रवि-
हम हैं तकदीर के मारे यूँ तो
मगर खुद के हैं सहारे यूँ तो

निशान्त आर्य-
जब रात का चाँद ढल रहा होगा
उम्मीद का सूरज भी चल रहा होगा।

डा0 सुनील कुमार मिश्र-
आँखों से काजल चुराना आता है मुझको
क्या कहें आपका प्रेम बहुत भाता है मुझको ।

राहुल शिवाय की होलीपरक रचना देखें-
सरहद पर वीरों का भाल सजाने वाली है 
और कहीं होली प्रिय को अपनाने वाली है 
लाठी से बरसाना खेले बिरज संग होली 
लेकर आई है खुशियों की नव उमंग होली

कैलाश झा किंकर ने अपनी प्रस्तुति में दर्जनों रचनाएँ सुनायीं।उनमें एक मनहरण घनाक्षरी वार्णिक छन्द देखा जाए-
वासंती उमंग छिकै,भौंरा नै अनंग छिकै
संगिनी के संग छिकै ,मोन फगुआय छै ।
हरा ,लाल, पीला, रंग, गोरी के करै छै तंग
भांग पीने छै मतंग,रंग से नहाय' छै ।
उड़ै सगरो गुलाल , होलै लाल मुँह-गाल
बूढ़ा-बूढ़ी भी बेहाल,झूठे खिसिआय छै।
भनई कैलाश कवि,होली खेलै खास कवि
ढूँढ़ै छी वसंती छवि ,जहाँ वें नुकाय छै ।

अवधेश्वर प्रसाद सिंह-
घर आने पर पत्नी मुझको डाँटती रहती
ई नै छो उ नै छो घर में भाँजती रहती

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए अवधेश्वर प्रसाद सिंह ने उपस्थित श्रोताओं/ कवियों और पत्रकारों के प्रति आभार प्रकट करते हुए कार्यक्रम के समापन की घोषणा की।
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आलेख - कैलाश झा किंकर
छायाचित्र - हिंदी भाषा साहित्य परिषद, खगड़िया 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com







 
 




Friday, 15 March 2019

राष्ट्रीय कवि संगम बिहार की ओर से होली मिलन- सह- हास्य कवि सम्मलेन 14.3.2019 को पटना में संपन्न

भंवरों ने भी अन्ततः तोड़ दिया उपवास


राष्ट्रीय कवि संगम बिहार की ओर से संगम के प्रांतीय कार्यालय तेज प्रताप नगर पटना में 14 मार्च 2019 गुरुवार को होली मिलन सह हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।

होली के पावन अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में लव्ध प्रतिष्ठित शायर समीर परिमल उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रतिष्ठित ग़ज़लकार  घनश्याम ने की  हास्य कवि सम्मेलन बड़े हर्ष और उल्लास के साथ सम्पन्न हुआ।इस कवि सम्मेलन का संचालन राष्ट्रीय कवि संगम मुजफ्फरपुर के उपाध्यक्ष अमीर हमजा ने किया।

इस धरा को अपने काव्य-रस से सिंचित  करने हेतु विभिन्न जिलों से पधारे हास्य -व्यंग, श्रृंगार, गीत ,ग़ज़ल कविता ,संस्कृत गीतादि विभिन्न रसों से पूर्ण कवियों ने अविस्मरणीय कवि सम्मेलन का स्वरुप दे दिया।

इस आनंदोत्सव में पुष्पमाला को रंग-बिरंगे पुष्पों सुशोभित करने वाले कवि  जहानाबाद से अमृतेश मिश्रा, अरवल से राहुल वत्स, हाजीपुर से नागेन्द्रमणि एवं कुछ नवांकुर कवि पटना से गुंजन, पटना सीटी से मनीष, अनीशाबाद से शिवम् झा, कुरथौल से रवि तथा धैर्यवान् दर्शकों की उपस्थिति सराहनीय रही।

समीर परिमल ने होली के अवसर पर सारी तल्खियों को भूल जाने की गुजारिश की - 
तल्खियां भूल जाओ होली में
दिल को दिल से मिलाओ होली में

इक जहाँ प्यार का बसायेंगे
नफ़रतों को जलाओ होली में

ये हवाएँ उदास लगती हैं
यार अब आ भी जाओ होली में

फिर उन्होंने अपने द्वारा की गई होली की तैयारी को कुछ यूं बताया- 

वफ़ा का रंग दुआ का गुलाल रक्खा है
हवा में इश्क़ ओ चाहत उछाल रक्खा है

चले भी आओ कि फागुन बुला रहा है तुम्हें
तुम्हारे वास्ते क्या-क्या सँभाल रक्खा है

वहीं देवभाषा संस्कृत के कवि और राष्ट्रीय कवि संगम के बिहार प्रांत के महासचिव अविनाश पांडेय ने 'ए कान्हा होली खेले अइह' को संस्कृत में गा कर सुनाया।

अमीर हमज़ा  पर एक लड़की मोटिवेट तो गई पर ये उसे न पाने के दर्द को कुछ यूं बयाँ करते हैं - 
एक सुंदर सी बाला मुझसे मोटीवेट हो गई
पर प्यार वाली गाड़ी मेरी लेट हो गई
किस्मत का दोष है या गरीबी है इसका कारण
जिस जिस पर मेरी नजर थी सब सेट हो गई।

अंत में गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे कवि घनश्याम ने फगुनाई में रचे दोहे उमंग के साथ सुनाये - 
शिशिर गया अवकाश पर फिर आया मधुमास
भंवरों ने भी अन्ततः तोड़ दिया उपवास

कुसुमायुद्ध से कर गया आहत हमें अनंग
अंग अंग पर चढ़ गया फिर फागुन का रंग

फागुन ने तन को छुआ मन में उठी तरंग
पुलकित होकर झूमने लगा अंग प्रत्यंग

फागुन को जब से मिला नया नया अनुबंध
बाँट रहा दिल खोलकर रूप रंग रस गंध

कविताओं पर तालियाँ गड़गड़ाती रहीं और ठहाके गूंजते रहे। इस  तरह होली के हास्य और उल्लास के साथ यह यादगार कवि गोष्ठी समाप्त हुई।
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आलेख - अमीर हमज़ा
छायाचित्र - राष्ट्रीय कवि संगम 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com
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Thursday, 14 March 2019

'आखर' के 14.3.2019 के मासिक कार्यक्रम में मैथिली साहित्यकार प्रेम लता मिश्र से केशव किशोर की बातचीत

संस्था प्रधान होती है व्यक्ति नहीं 



गत वर्ष से आखर' नामक साहित्यिक संस्था ने बिहार की लोकभाषाओं की बड़ी सेवा की है. इसने मैथिली और भोजपुरी जैसी दो भाषाओं में अनेक कार्यक्रम किये हैं जिनमें लोकभाषा के एक प्रसिद्ध साहित्यकार को बुलाकर उनका साक्षात्कार लिया है और वह भी खुले मंच पर आमंत्रित दर्शकों के बीच । इस अभियान के दौरान विद्वानों द्वारा जो जवाब दिए गए उनसे लोकभाषाओं से सम्बंधित अनेक महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुए और पता चला कि क्यों लोकभाषाओं को पर्याप्त संरक्षण और सम्मान मिलना आवश्यक है ।

संस्था के प्रति समर्पित रहनी चाहिए, व्यक्ति की नही। यह बातें प्रभा खेतान फाउंडेशन, मसि इंक और श्री सीमेंट की ओर से होने वाली मासिक कार्यक्रम आखर में डॉ प्रेमलता मिश्र प्रेम ने कही  । कार्यक्रम 14.3.2019 को पटना के विद्यापति भवन में हुआ

वरिष्ठ पत्रकार केशव किशोर से बातचीत के दौरान डॉ मिश्रा ने कहा कि 12 वर्ष में  विवाह हो जाने के पश्चात उच्च माध्यमिक की परीक्षा उत्तीर्ण की फिर पटना आ जाने के बाद वर्ष 1975 से रंगमंच से जुड़ाव। रेडियो पे नाटक सबसे पसंदीदा नाटक रचनात्मक कार्य मुझे लगा। अभिनय, लेखन और संपादन के द्वारा डॉ. प्रेमलता मिश्रा अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करती है। 

नौकरी इन्होंने आवश्यकता और महिला सशक्तिकरण करण दोनों को देखते हुए किया। कुछ वर्ष बाबा नागार्जुन के सानिध्य प्राप्त करने के बाद ये महिला सशक्तिकरण को लेकर सचेत हुई। घर घर जाकर नाटक के जरूरत को पूरा करने के लिए चन्दा एकत्रित करना पड़ता था। 

अपने नाट्य कर्म के यात्रा और बाधा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि विद्यालय में पढ़ने के दौरान विद्यालय के कार्यक्रम में नाटक होना तय था पर ग्रामीणों के विरोध के कारण वो नाटक नहीं हो पाया उसी समय से नाटक में कार्य करने की इच्छा उत्पन्न हुई और निरन्तर इस कर्म में 50 साल से कार्यरत हूँ।

अभिनेता या अभिनेत्री टाइप्ड नहीं होते हैं वो अपने किरदारों पर बना दिये जाते हैं। इनका अंतिम नाटक "अंतिम प्रश्न" और "बड़का साहेब" है जो कि सामान्य नाटकों से भिन्न था। उन्होंने कहा कि उसमें मुझे रिहर्सल नहीं करनी पड़ी वो अंतर्कथा थी। 

निर्देशन में नहीं आ पाने का मुझे अब बहुत अफसोस है किन्तु मैथिली नाटक के लिए मैंने अपने से कम उम्र की महिला निर्देशक "तनुजा शंकर" के अंदर कार्य किया । 

अपने लेखन कर्म पर बात करते हुए डॉ. प्रेमलता मिश्र ने कहा कि "एगो छलीह सिनेह पुस्तक" फरमाईशी या शौकिया नहीं था । मेरे मन में जितनी उधेड़बुन थी उसे शब्दों का रूप दिया। समाज को जिस समय जिसकी जरूरत होती है उसके लिए मैं प्रतिबद्ध रहती हूं। उस समय रंगमंच में महिलाओं के प्रवेश की आवश्यकता थी मैंने इसे चुनौती की तरह स्वीकार किया । अबके समय में साहित्य लेखन महिलाओं के लिए चुनौती के रूप में है।

उन्होंने कहा कि मैं किसी व्यक्ति के लिए नहीं भाषा और संस्कृति के लिए कार्य करती हूं। इसकी मुझे बहुत आत्मसंतुष्टि है। संस्था मुख्य होती है व्यक्ति नहीं व्यक्ति तो आते जाते रहते है लेकिन संस्थाएं अडिग रहती है।अपने वैचारिक पक्ष पर  बोलते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति भाव शून्य नहीं हो सकता भावुकता तभी दिग्भ्रमित करती है जब कोई कार्य पूर्ण नहीं हो सके।

इस कार्यक्रम में प्रियंका मिश्रा, धीरेंद्र कुमार झा, रामानन्द झा रमण, बटुक भाई, कथाकार अशोक, रजनीश प्रियदर्शी, विष्णु नारायण, रंजन झा, आनंद कुमार आदि भी उपस्थित हुए।

ध्यातव्य है कि यह आखर का 17वां मासिक कार्यक्रम था। इसके पहले यह आठ बार मैथिली में और आठ बार भोजपुरी में यह कार्यक्रम कर चुका है।
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आलेख - सत्यम कुमार 
छायाचित्र - आखर 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbejodindia@yahoo.com