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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@gmail.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Sunday, 13 October 2019

नवगीतिका लोक रसधार द्वारा छठ पर्व के गीतों पर नीतू कुमारी नवगीत का गायन 13.10.2019 को पटना में सम्पन्न

केलवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके झुके

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यूथ हॉस्टल एसोसिएशन बिहार और सांस्कृतिक संस्था नवगीतिका लोक रसधार द्वारा लोक आस्था के महापर्व छठ से जुड़े पारंपरिक गीतों पर आधारित कार्यक्रम जय छठी मैया का आयोजन यूथ हॉस्टल परिसर,  फ्रेजर रोड, पटना में किया गया । 

कार्यक्रम का उद्घाटन रेल ब्हील फैक्टरी की प्रधान वित्त सलाहकार पुष्पा रानी, बिहार प्रशासनिक वाइव्स एसोसिएशन की अध्यक्ष पुष्पलता मोहन, अलका प्रियदर्शिनी, कलाकार मनोज कुमार बच्चन, वरिष्ठ कवि अनिल विभाकर, नीलांशु रंजन, यूथ हॉस्टल एसोसिएशन बिहार शाखा के अध्यक्ष मोहन कुमार, संगठन सचिव सुधीर मधुकर, रतन कुमार मिश्रा, सचिव एके बॉस और हॉस्टल प्रबंधक कैप्टन राम कुमार सिंह ने किया ।

 लोक गायिका डॉ नीतू कुमारी नवगीत ने सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वंदना मंगल के दाता भगवन बिगड़ी बनाई जी गौरी के ललना हमरा अंगना में आई जी के साथ की । उसके बाद उन्होंने शुद्धता, सच्चाई और समर्पण के महापर्व छठ से जुड़े अनेक लोक गीतों की प्रस्तुति की।

केलवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके झुके, उगिहैं सुरुज देव होते भिनुसरबा अरग के रे बेरिया हो, उ जे केरवा जे फरेला घवद से, ओह पे सुगा मंडराय, मार्बो रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरझाए, कांचे ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए, पटना के घाट पर हमहुं अरगिया देवई हे छठी मईया, हम ना जाइब दोसर घाट हे छठी मईया, छठ के बरतिया करा दीह, घाट बनवा दीह ओ पिया, हाजीपुर से केलवा मंगा दीह ओ पिया जैसे गीतों को गाकर गायिका नीतू कुमारी नवगीत ने माहौल को छठमय बना दिया। 

गंगा माता की महिमा का बखान करते हुए नीतू कुमारी नवगीत में कई गीत गाए जिसे श्रोताओं ने खूब पसंद किया । उन्होंने मांगी ला हम वरदान हे गंगा मईया मांगी ला हम वरदान, मनवा बसेला हे गंगा, तोहरी लहरिया, जियारा में उठेला हिलोर हो माई तोरे जगमग पनिया और चलली गंगोत्री से गंगा मैया जग के करे उद्धार जैसे गीत मां गंगा को समर्पित किए। 

सांस्कृतिक कार्यक्रम में राजन कुमार ने तबला पर, राकेश कुमार ने हारमोनियम पर अजीत कुमार यादव ने झंझरी पर और विष्णु थापा ने बांसुरी पर संगत किया।  यूथ हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहन कुमार ने कहा कि लोक आस्था के महापर्व छठ और दूसरे त्योहारों के अवसर पर डीजे से जितना दूर रहा जाए उतना ही बढ़िया है ।

डीजे से शोर बढ़ता है जबकि हमारे पारंपरिक लोक संगीत से मन को शांति मिलती है और भक्ति की भावना बढ़ती है । कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ ध्रुव कुमार ने छठ की ऐतिहासिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह पर्व हमें प्रकृति से जोड़ता है छठ के दौरान प्रयोग में आने वाली प्रायः हर वस्तु जैसे सूप चूल्हा, दउरा प्रकृति के अनुकूल है । प्लास्टिक और इस से बनी चीजों का प्रयोग छठ के दौरान वर्जित है। जल जमाव और जल प्रदूषण का एक बड़ा कारण प्लास्टिक से बनी वस्तुएं हैं।
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आलेख - दिलीप कुमार द्वारा भेजी गई सामग्री के आधार पर
छायाचित्र - 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com












युवा कवि दिलीप कुमार का एकल काव्य पाठ 12.10.2019 को पटना में सम्पन्न

नाम दीए का होता है / पर जलती तो बाती है

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पूर्व मध्य रेल के राजभाषा विभाग द्वारा पटना जंक्शन परिसर में स्थित रेल सभागार में युवा कवि दिलीप कुमार की कविताओं का एकल पाठ आयोजित किया गया । कवि दिलीप कुमार ने अपने संग्रह अप डाउन में फंसी जिंदगी से कई कविताओं का पाठ किया जिसमें रेल कर्मियों के जीवन के विविध रंग देखने को मिले -

समय से रेस लगाते देखा
गाते और गुनगुनाते देखा
अपनी मंजिल की खैर नहीं
सबको मंजिल पर पहुंच आते देखा।

रेल पटरियों की देखरेख करने वाले ट्रैकमैन के जीवन से जुड़ी कविता को श्रोताओं ने खूब पसंद किया -दहकता हुआ सूरज /स मा गया है रेल की पटरियों में
पैरों में पड़ गए हैं छाले / चौंधिया गई हैं आंखें
फिर भी पटरियों की देखरेख का क्रम जारी है
उसका समर्पण सूरज की तपिश पर भारी है।

दिलीप कुमार ने बिहार के लोक जीवन और त्योहारों से जुड़ी कई कविताओं का पाठ कर श्रोताओं के दिल में जगह बनाई । सरल शब्द विन्यास के बावजूद दीप का सवाल कविता श्रोताओं को खूब पसंद आई -
दीपावली के दिन अपने घर आंगन में दीप जलाया/-
धरती से आसमान तक अंधेरे को मार भगाया/-
फिर अपने मन में एक दीप क्यों नहीं जलाते/-
मन के अंधेरे को दूर क्यों नहीं भगाते ?

इसी तर्ज पर उन्होंने रावण दहन से जुड़ी कविता औपचारिकता सुनाई:
 धू-धू कर जल गया रावण का पुतला
शहर के बीच मैदान में
लोगों ने देखा तमाशा / बजाई तालियां
और लौट गए/ अपने-अपने घर को
मन की बुराई, मन में ही समेटे ।

महिला श्रोताओं को जलती तो बाती है कविता को पसंद आई -
दीया को जीवन मैंने दिया
जली रात भर, जग को रौशन किया
मैं औरत हूं
मुझे औरत ही बनाती है
वही औरत जो दिन भर खाना पकाती है
और रात में सबसे अंत में खाती है
वही औरत जो अधूरेपन में जीती है
लेकिन पूर्णता में देती है
किसी उपलब्धि का कभी श्रेय नहीं लेती है
सभी औरतों की एक जैसी थाती है
नाम दीए का होता है
पर जलती तो बाती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता स्टेशन निदेशक डॉ निलेश कुमार ने की। आयोजन के दौरान  वरिष्ठ कवयित्री भावना शेखर ने कहा कि दिलीप कुमार की कविताओं में सादगी और सच्चाई है।  मुकेश प्रत्यूष ने कहा कि इस्पाती चौखट में रहने के बावजूद उनकी कविताओं में मानवीय संवेदना है। मौके पर ध्रुव कुमार कुमार रजत, प्रणय प्रियंवद, शायर कासिम खुर्शीद, समीर परिमल, हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य वीरेंद्र यादव आदि उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन कवि राजकिशोर राजन और धन्यवाद ज्ञापन सिद्धेश्वर ने किया।
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आलेख - नीतू कुमार नवगीत द्वारा भेजी गई सामग्री के आधार पर
छायाचित्र सौजन्य - डॉ. नीतू कुमारी नवगीत
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com









बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा डॉ. कुमार विमल जयंती -सह- कवि गोष्ठी 11.10.2019 को पटना में सम्पन्न

सौंदर्य शास्त्र के महान आचार्य 

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(डॉ. कुमार विमल का जन्म 12.10.1931 को हुआ और 26.11.2011 को उनकी मृत्यु हुई. वे बिहार सरकार के अनेक महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित रहे. उन्हें समालोचना और सौंदर्यशास्त्र अध्ययन हेतु विशेष रूप से सम्मान प्राप्त था. उनकी दो पुस्तकें राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित थीं - "सौंदर्यशास्त्र के तत्व" और "छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन". उनके जन्मदिन पर एक गोष्ठी पटना में आयोजित की गई. प्रस्तुत है उसकी रपट.)

डॉ. कुमार विमल सौंदर्य शास्त्र के प्रथम विशेषज्ञ माने जाते हैं। ललित ढंग से सौंदर्य की  शब्दाकृति होती है कविता। एक साथ कई पुस्तकें पढ़ा करते थे वे। समालोचना में, नलिन विलोचन शर्मा के बाद यदि किसी को स्मरण कर सकता हूं, तो वो कुमार विमल हैं। 

अध्यक्ष अनिल सुलभ  के उपरोक्त उद्गार के पश्चात डां एस एन पी सिन्हा ने कहा कि- "वे सौंदर्य शास्त्र के महान आचार्य थे। अपने  समय के वे जीवित साहित्य कोश थे। उनका संपूर्ण जीवन साहित्य और पुस्तकों के साथ जुड़ा रहा

 पटना विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा एस एन पी सिन्हा ने यह भी कहा कि" डां विमल एक विद्वान लेखक ही नहीं, अत्यंत प्रभावकारी वक्ता भी थे।" 

इनके अतिरिक्त डां शिववंश पांडेय ने कहा कि - "कुमार विमल की ख्याति साहित्य संसार में आज भी बनी हुई है। उन्होंने कंई महत्वपूर्ण ग्रथ लिखे हैं। साथ में कल्याणी कुसुम सिंह, प्रो भूपेंद्र कलसी, नागेश्वर प्र यादव और  श्रीकांत सत्यदर्शी ने भी डां कुमार विमल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से सारगर्भित विचार व्यक्त किए। 

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में, डां कुमार विमल की जयंती सह कवि सम्मेलन में अपनी काव्यमय प्रस्तुति देने वाले कवियों में प्रमुख थे - अनिल सुलभ, डां शांति जैन ,बच्चा ठाकुर, इंद्रकांत मिश्र, नृपेन्द्र गुप्त, डां मेहता नागेन्द्र सिंह, सविता मिश्र माधवी, श्रीकांत व्यास, कुंदन आनंद, शुभचन्द्र सिंहा, पुष्पा जमुआर, सीमा रानी, ओम प्रकाश पांडेय प्रकाश, सुनील दूबे, यशोदा शर्मा, जय प्रकाश, धर्मवीर कु शर्मा, रवीन्द्र कुमार, नीरव रामदर्शी, राजकुमार प्रेमी और सिद्धेश्वर। 

गोष्ठी का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र तथा धन्यवाद ज्ञापन किया कृष्ण रंजन सिंह।
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आलेख - सिद्धेश्वर
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
लेखक का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com
नोट - जिनका वक्तव्य इसमें शामिल नहीं हो पाया है कृपया ऊपर दिये गए ईमेल पर भेजें.





  






पचीसी (मिथिला का पारम्परिक खेल) / कंचन कंठ

कोजागरा यानी शारदीय पूर्णिमा के अवसर पर विशेष लेख

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आज कोजगरा, यानी शारदीय पूर्णिमा है। ये मिथिला क्षेत्र में बड़ी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला पर्व है। खासतौर पर नवविवाहित लड़कों के ससुराल से तरह-तरह की मिठाईयां, मखाना, खेल के सामान, परिवार के पुरुषों के लिए वस्त्र आते थे पर अब तो महिलाओं को भी शामिल किया जाता है। उनके लिए भी वस्त्र आदि भेजे जाते हैं। 

दूल्हे को पारंपरिक वेशभूषा में तैयार करवाकर, अरिपन से सुसज्जित आंगन में "सिरागू" (पूजाघर) से लाकर दाई-माई गीतनाद के साथ लाकर उसका चुमान करती हैं, पिता, चाचा, बाबा आदि दुर्वाक्षत से दीर्घायु और यशस्वी होने का आशीष देते हैं। मखाने की खीर बनाकर रात को चांद के सामने रखते हैं। मान्यता है कि इस दिन पूर्णिमा के चांद से अमृतवर्षा होती है जो खीर में मिल जाती है और इसे सभी को बांटा जाता है।

इसके बाद कोहबर में लाकर सबके साथ 'पचीसी' खेलने की प्रथा है। 'पचीसी' यानी वही कुख्यात "द्यूतक्रीड़ा",जो महाभारत की एक प्रमुख घटना है। पर यहां दांव पर पति-पत्नी का आपस में वर्चस्व और प्रेम ही होता है। इस दिन पान, मखान, मधुर खाने की और पचीसी खेलने की प्रथा है।और इसके बाद पचीसी फिर अगले साल कोजगरा से कुछ दिन पहले से कोजगरा तक खेली जाएगी। आज के बाद फिर यह वर्जित है।

बचपन में हमने अपने घर में पचीसी खूब खेला है। दशहरे के आसपास से यह खेल शुरू हो जाता है। तो दिन के खाने के बाद रोज पचीसी का रेखाचित्र बनाते थे, जो काफी कुछ लूडो के बड़े भाई जैसा होता था, फिर चार रंगों की चार-चार गोटियां और नौ कौड़ियां और खेलने के लिए चार जन होने चाहिए। पर हमलोग दो-दो जन एक पाले में बैठते थे जनसंख्या अधिक थी भई, और सबको तो खेलना होता था।

कई सारे फकरे (कहावतें) होती थीं, जैसे  घरों की गिनती एक-दो-तीन नहीं, उसके लिए एक फकरा होता था "औंक, मौंक, जौंक, जीरा, जौं बजार खौं खीरा।" फिर नौ कौड़ियों से खेला जाता था तो जब सारी कौड़ियां चित्त होती तो "बारह"आया तो फिर एक फकरा "बारह सर्बहि हारह, गोंधियां हीलडोल"- कहकर उसके गोधिंयां यानि पार्टनर को जोर से झकझोरकर रख देते थे। 

सारी कौड़ियां पट्ट तो 'चौबीस' आना होता था। इनमें गोटियां नहीं 'पबहारि' यानी 'निकलना' नहीं होती थीं। एक कौड़ी चित्त और बाकी पट्ट तो 'पचीस' आता था,जिसमें चारों गोटियां 'पबहारि' होती थीं, एकसाथ। इसका उल्टा होने पर "दस"आता था और एक गोटी 'पबहारि' होती थीं। हरेक खिलाड़ी को चार मौके मिलतेे थे खेलने के, दस या पचीस आनेे पर एक मौका और मिलता था।  गोटियां निकलती नहीं 'पबहारि' होती थीं और लाल होने से पहले नंबर पर अटकने पर गोटियों को 'पबन्नी' लगती थीं तो दूसरे पक्ष वाले उसकी चाल के समय "नरकी पबन्नी" चिढ़ाते थे जो "दस या पचीस" आने से छुटती थीं।

अक्सर मैं पापा के संग ही खेलती थी। नूतन दी को पचीस और दस काफी आता था तो उसका गोधियां बनना जीत की गारंटी होती थी। छोटी-मोटी बेइमानी भी हो जाती थी कभी कभी तो खूब नोंकझोंक होती थी। बड़ा मज़ा आता था। एक दिन तो इतना हल्ला मचाया हमने कि पड़ोसी चिंतातुर होकर देखने चले आए कि क्या चल क्या रहा इनके घर में! 

पर, अब तो "नहि ओ नगरी, नहि ओ ठाम"।
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आलेख - कंचन कंठ
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com

कंचन कंठ






Friday, 11 October 2019

अमन शांति की खोज में, गया स्वर्ग के द्वार

शोक में दोहे 
 22 वर्षीय श्रेष्ठ दोहाकार ग़ज़लकार अमन चांदपुरी के असामयिक निधन पर कविता
कवि - हरि नारायण सिंह 'हरि'

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अमन चाँदपुरी (जन्म 25 नवम्बर 1997 – निधन 10 अक्टूबर 2019)

(बिहारी धमाका / बेजोड़ इंडिया ब्लॉग की ओर से 
अत्यंत अल्प आयु के एक अति प्रतिभाशाली कवि के निधन पर हार्दिक शोक)

अमन शांति की खोज में, गया स्वर्ग के द्वार ।
यहाँ निरंतर रो रही, कविता जार-बेजार ।

ऐसे निष्ठुर क्यों बने, अमन! गये क्यों भाग ।
यहाँ अभागा रो रहा, सुबुक-सुबुक अनुराग ।

सबके प्रिय तुम थे बने, सबके जिगरी यार ।
अमन! तुम्हारे बिन यहाँ, फीके सब त्योहार ।

यद्यपि परिचय था नहीं, भले बहुत थे दूर ।
तुमको रचता देख-सुन, मैं भी था मगरूर ।

दोहा मंथन में अमन हम हैं तेरे साथ ।
इतनी जल्दी चल दिये, अरे, छुड़ाकर हाथ !

राहुल रो-रो कह रहा, कहाँ गये तुम यार ।
फैजाबादी हरि सुबक, करता दुख इजहार ।

खेरवार तो दुःख से हुआ कि ऐसा मौन ।
उसे मनाये किस तरह, और मनाये कौन ।

गरिमा और सुमित्र हरि, करुण और कवि अन्य ।
सभी शोक विह्वल अमन! तुम थे प्रिय अनन्य ।

वश में रही न 'भावना', आँखों में है लोर।
अमन! हाय!क्यों चल दिये, इतनी जल्दी छोड़ ।
...
कवि - हरि नारायणसिंह 'हरि'
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com

शोक संतप्त कवि - हरिनारायण सिंह 'हरि'


बिहार के कुछ कवियों के साथ अमन चांदपुरी 

बिहार के कवियों के साथ अमन चांदपुरी


Wednesday, 2 October 2019

अन्तरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस (1 अक्टूबर्) पर लेख्य मंजूषा की अंतराजाल साहित्य गोष्ठी

बैठ जाओ कदमों तले उनके / अबूझ जीवन का हर हल निकाल लो 
जिंदगी जो शेष है बस वही विशेष है

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अन्तरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस सम्पूर्ण विश्व में अक्टूबर मास के १ दिनांक को मनाया जाता है । इस दिन पर वरिष्ठ नागरिको और वरिष्ठ सम्बन्धिओं का सम्मान किया जाता है। वरिष्ठों के हित के लिए चिन्तन भी होता है। विभा रानी श्रीवास्तव ने इस अवसर पर साहित्यकारों और अन्य लोगों से अपने-अपने अनुभव बाँटने का आमंत्रण दिया  अनेक सुधी लोगों ने अपनी अभिव्यक्ति की जो नीचे प्रस्तुत है -

1. विश्वमोहन (दिल्ली) -
बुजुर्गों के पास क्षमा का हथियार, अहिंसा का अस्त्र. होता है. धन रहते भी धन न देनेवाला से महान  है वह धनहीन जो अपना सर्वस्व समर्पित करनेको उद्धत रहता है... यह बेबसी के बीज से बढ़े वृक्ष नहीं हैं. ये तो आत्मिक सबलता और आंतरिक सोंदर्य से अंकुरित कल्पतरु हैं, जिसकी छाया तले भटके पथिक को जीवन के शाश्वत सत्य के दर्शन होते हैं 

2. रंजना सिंह -
बुजुर्ग हमारे प्रहरी हैं
गाँव के हों या शहरी हैं

3. पूनम देवा -
बुजूर्गु  हमारे घने वट वृक्ष की छाया है
क्या हुआ, अगर जीर्ण क्षीण ,इनकी काया है
उपर वाले की माया है
अगर हम पर इनकी छाया है।

4. प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र' -
बुजुर्ग घर के आन मान सम्मान हैं
बच्चों को उनसे मिलता सुंदर ज्ञान है

5. अभिलाषा सिंह -
खत्म होने के कगार पर खड़ी है जिंदगी
किसी खंडहर के द्वार पर पड़ी है जिंदगी
तुम्हारे ही प्यार ने दे रखी है वो ताकत
कि कई दफा मौत से लड़ी है जिंदगी
पास बैठो बुजुर्गों के कि बातें चंद कर सकें
इसी आस में आज तक धरी है जिंदगी।
लग जाना गले से फुर्सत निकाल कर कभी
यही सोचकर कि अब तो आखिरी है जिंदगी।

6. मधुरेश नारायण -
खुद बुजुर्ग हूँ, दूसरे बुजुर्गों के बारे में क्या कहूँ
अपनों को सब सुख मिले, दर्द मैं उनका सहूँ।

7. पूनम (कतरियार) -
सफेद बालों में संजोये दुनियादारी
जीवन-भर की कमाई वफादारी है
अशक्त -कमजोर हो या बीमारी
खुश दिखना इनकी लाचारी है
शब्द घुटते रहते हैं पोपले मुख के,
दिन कटते स्मरण में विगत सुख के।

8. राजेन्द्र पुरोहित (जोधपुर) -
बालों की सफेदी को सम्मान चाहिए
घर में बुजुर्गियत की पहचान चाहिए
दौलत की तबोताब की उनको नहीं है आस
बस वक़्त दीजिये, यही एहसान चाहिए।

9. मीरा प्रकाश -
बुजुर्गों के बिना घर अधूरा है
उनके पांव में स्वर्ग और धरा है
उनका प्यार मिले सभी को-
उनके ज्ञान बिना घर अंधेरा है।

10. मिनाक्षी कुमारी -
जिंदगी जो शेष है बस वही विशेष है
नहीं गुनाह बुढ़ापे का कुछ भी
एक अटल सत्य है आज यह भी।
इच्छा दफन कर जिंदगी भर तालमेल बैठाते रहे
शेष बचे जीवन के क्षण का
बाहें फैलाकर अब आप स्वागत करें।

11. नूतन सिन्हा -
बुजुर्ग हमारे लिये संचय किया हुआ धन से भी बढकर होते हैं उनके आगे धन दौलत भी फीका है धन तो खर्च हो जाता है परन्तु बुजुर्गों का शाया बरगद के पेड़ की तरह शीतल छाया देकर हरवक्त नया मार्गदर्शन देकर हमारी नई पहचान बनाते हैं। बोला जाये तो प्रकृति स्वरुप बुजुर्ग होते हैं जिनकी आवश्यकता हमारे शरीर के रक्त के समान होते हैं।

12. प्रेमलता सिंह -
बुजुर्ग के आशीर्वाद और प्यार से ही हमारा घर स्वर्ग समान बनता हैं।  जैसे पेड़ कितना भी हरा -भरा हो, इसकी जड़ काट दी जाए तो पेड़ सूख जाता हैं। वैसे ही हमारे बुजुर्ग हमारे परिवार की बुनियाद हैं।

13. प्रभास कुमार 'प्रभास' -
जितना माता-पिता बच्चों की सेवा करते हैं
वृद्धावस्था में वो वापस नहीं पा पाते हैं
जब आती है ऋण चुकाने की बारी
तब उनके बच्चे अपना हाथ खड़ा कर देते हैं।

14. संजय कु सिंह -
भागती जिंदगी से कुछ पल निकाल लो
आज नहीं तो कल निकाल लो
बैठ जाओ कदमों तले उनके
अबूझ जीवन का हर हल निकाल लो।

15. राजकांता राज -
दादा-दादी, माता -पिता हमारे बल है
बुजुर्ग हमारे आने वाला कल है
बुजुर्ग पारिवार की नींव है
बुजुर्ग घर की रौनक है

16. विष्णु सिंह -
काँपते हाथ
झुर्रियाँ
किसको पसंद आते हैं
कौन चाहता है, ऐसे हालात में रहना
पर क्या करें समय का तकाज़ा है
अनुभव लेते लेते, सबको आना पड़ता है इस उम्र के पड़ाव पर
सब इन्हें बुजुर्ग कहते हैं
हम इन्हें धरोहर कहते हैं, छत कहते हैं।
ज़रा सोचिएगा,
बिना छत के मकान होते हैं क्या?
आओ मिलकर प्रण लें
झूठा अहंकार त्याग दे आज
ले बुजुर्गों का आशीर्वाद
ले हम बुजुर्गों का आशीर्वाद।

17. संगीता गोविल -
सब कुछ है घर में सिर्फ एक बुजुर्ग की कमी है,
आज खुद पोंछे जो यादों से उनकी आई नमी है।
जब थे वो घर में, सुरक्षित हम आजाद परिंदे थे,
अब गृहाधिपति बने तो जिम्मेदारियों की बर्फ जमी है।

18. कंचन अपराजिता (चेन्नई) -
बरगद के पेड़ को देखे..
कितनी बैठकों के गवाह बने
हमारे बुजुर्ग है उस छाँव जैसे
आभार उनका भी हम करे
उनके चेहरे पर मुस्कान
हम से ही तो रहते है खिले
चलो अपने कुछ पलों को
सिर्फ उनके लिए जी ले।

 19. मधु खोवाला -
जिस घर में हो बुजुर्गो का सम्मान
आसमान भी करता है
उस घर को झुक कर प्रणाम।
.....

प्रस्तुति - विभा रानी श्रीवास्तव
प्रस्तोता का ईमेल - virani.shrivastava@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल -editorbejodindia@yahoo.com

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मेरा साथ निभाना होगा / सिद्धेश्वर की कुछ कविताएँ

 हिंसा के विरोध में एक कवि 

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पूर्व मध्य रेल (पटना जंक्शन) में कार्यरत उप-मुख्य टिकट निरीक्षक सिद्धेश्वर प्रसाद गुप्ता सफलतापूर्वक नौकरी करते हुए सेवानिवृत्त हो गए। उनका विदाई समारोह पटना में रेलवे के कार्यालय में 28/09/2019 को हुआ। वे पिछले बीस वर्षों से राजेन्द्र नगर टर्मिनल स्टेशन राजभाषा कार्यान्वयन समिति के सचिव एवं रामवृक्ष बेनीपुरी हिंदी पुस्तकालय के अध्यक्ष के पद पर भी अपना अभूतपूर्व योगदान देते हुए विचार गोष्ठी, कवि गोष्ठी, राजभाषा बैठक, पुस्तक लोकार्पण आदि गतिविधियों के द्वारा, राजभाषा हिन्दी से रेलकर्मियों को जोड़ने का उत्साहजनक काम किया वे इन कार्यों के लिए रेल मंत्रालय से लेकर रेल महाप्रबंधक तक के कई पुरस्कारों से सम्मानित भी हुए। 

साहित्य जगत में 'सिद्धेश्वर' के नाम से साहित्य सृजन करनेवाले इस रेलकर्मी ने सर्वश्रेष्ठ साहित्य लेखन और सर्वश्रेष्ठ पुस्तक लेखन के लिए भी रेल मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा दो बार प्रथम पुरस्कार से सम्मानित होकर दानापुर रेल मंडल का नाम रौशन किया है। विदित हो कि रेल मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा इनके काव्य संग्रह "इतिहास झूठ बोलता है" को मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार और उनकी कथा संग्रह "ढलता सूरज :ढलती शाम" को प्रेमचंद पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। रेल की पत्रिकाओं में भी सिद्धेश्वर के सैंकड़ों कविताएं, कहानियाँ लघुकथाएं, आलोचनात्मक आलेख, भेंटवार्ता तथा रेखाचित्र और पेंटिंग्स भी सम्मान पूर्वक प्रकाशित होते रहे हैं। रेल विभाग में इस तरह की कई प्रतिभाएं, सेवानिवृत्त होने के बाद भी, साहित्य साधना करते रहे हैं। सिद्धेश्वर भी इस दिशा में अग्रसर हैं। 

(उपरोक्त जानकारियाँ श्री सिद्धेश्वर एवं उनकी पत्नी श्रीमती बीना गुप्ता द्वारा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर है.)

लीजिए प्रस्तुत हैं कवि सिद्धेश्वर रचित कुछ कविताएँ-
1. तू नागन है मैं चंदन

मेरा  साथ  निभाना  होगा
मंजिल तक पहुंचना  होगा
मैं  जब  तन्हा  हो  जाऊंगा
तेरे  साथ   जमाना होगा 

रूठ  के  घर से जाने वाले
 एक  दिन  वापस आना होगा
अगर  पड़ोसी जालिम है तो 
खुद को तुम्हें  बचाना  होगा

विष  का  प्याला है सच्चाई
फिर भी मुझे पी जाना होगा
 कीचड़ में  खिलते  हैं फूल 
 दुनिया  को बतलाना होगा

ये  धरती, आकाश  बताए
मेरा  कहां  ठिकाना  होगा
 दुनिया से मत पूछो 'सिद्धेश'
क्या खोना क्या पाना होगा?
...

2. भूख से परेशां
 वह
पहले 
रोटियां छीन कर 
खा लिया करता था! 
     जब
     छीनने पर भी 
      नहीं मिली रोटी,
तब
   'भाई' को खाया उसने
फिर
'बहन' को
फिर 
'मां' को
फिर 
'बाप' को
फिर 
'पत्नी' को
फिर 
'बच्चे' को
      अंततः
        और कोई न बचा
       तब..? 
      खुद को खा गया, वह! 
....

युद्ध :तीन क्षणिकाएं 
 (एक) 
युद्ध! 
वरदान भी है  
अभिशाप भी है 
युद्ध
सवाल है 
युद्ध को तुम 
अपनी लड़ाई का 
आरंभिक हथियार बनाते हो 
दरअसल है यह अंतिम हथियार.!

(दो)
दो देशों के युद्ध में
हमेशा 
जीत होती है
किसी एक देश के 
राजा की!     
लेकिन 
हमेशा हार होती है
हिंसा के विरोध में लड़ रहे
करोड़ों देश की जनता की.

(तीन)
युद्ध में
दो देश के 
योद्धाओं के बीच
सिर्फ 
अस्त्रों-शस्त्रों से
नहीं होती लडा़ई! 
एक लडा़ई होती है
भूख  से भी ! 
 जिसके योद्धा होते हैं
युद्धरत सभी देशों की
लाखों में गरीब 
और असहाय जनता!
...
प्रस्तुति - बीना गुप्ता 
कविताएँ- सिद्धेश्वर
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com
नोट - इस रपट की लेखिका श्रीमती बीना गुप्ता, सिद्धेश्वर प्रसाद गुप्ता की पत्नी हैं.