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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@gmail.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Thursday, 14 May 2020

राष्ट्रीय संस्था "महिला काव्य मंच" बिहार प्रांत की मासिक काव्य - गोष्ठी (आभासी) दिनांक 10-5-2020 को संपन्न

जहां गयी आवाज तो देदो

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अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक गोष्ठी आयोजित करने वाली राष्ट्रीय संस्था "महिला काव्य मंच" बिहार प्रांत  की मासिक काव्य - गोष्ठी दिनांक 10-5-2020 को 3 बजे से प्रारंभ हो कर 6 बजे तक बिहार अध्यक्ष डॉ उषा किरण श्रीवास्तव, उपाध्यक्ष डॉ अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, सचिव डॉ सुधा सिंहा सावी , पटना जिलाध्यक्ष डॉ मीना परिहार बेतिया की डॉ शिप्रा मिश्रा, डॉ अणिमा, नूतन सिंहा  डॉ संगीता  आदि कवयित्रियों की उपस्थिति एवंआन लाइन काव्य पाठ  से आयोजन सार्थक हुआ   बिहार के विभिन्न जिलों कीअध्यक्ष एवं सदस्यों ने बढ़ चढ कर भाग लिया! सुखद संयोग कल मातृदिवस रहने के कारण अधिकांश कवयित्रियों के काव्य पाठ की केन्द्र बिंदु माँ ही रही। सबों ने विभिन्न रूपों में "माँ " को अपनी भावनाएँ समर्पित की!अध्यक्ष डॉ उषा किरण जी,उपाध्यक्ष डॉ अन्नपूर्णा श्रीवास्तव एवं सचिव डॉ सुधा सिंहा सावी की उपस्थिति एवं संगीता जी के कुशल संचालन में सम्पन्न की गई!


पढ़ी गई रचनाओं में से कुछ की झलक प्रस्तुत है - 

अध्यक्ष ऊषा किरण ने माँ  की विविध रूप को दिखाया -
ये मां तुम क्या कहां नहीं हो,
तुम प्रकृति की हरियाली हो
बच्चों के होंठों की लाली  हो

उपाध्यक्ष डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव ने माँ को अप्रतिम भगवान् बताया -
तेरी ममता का प्रतिदान नहीं
तुझ जैसा तो भगवान नहीं
  
सचिव डॉ. सुधा सिन्हा ने अपनी दिवंगत माँ को बुलाना चाहा - 
जहां गयी आवाज तो देदो
अपनी एक झलक दिखला दो,
समझाना मुश्किल आंखों को,
रोक न सकूं अश्रुधार को।

इस कार्यक्रम के आल्योजन में महासचि डॉ. नीलिमा वर्मा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही.

......
रपट की प्रस्तुति - डॉ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव / डॉ. सुधा सिन्हा
प्रथम प्रस्तोता का ईमेल आईडी - 
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल आईडी -  editorbejodindia@gmail.com


Wednesday, 13 May 2020

सिद्धेश्वर का डायरीनामा / साहित्य प्रभात नामक आभासी गोष्ठी 10.5.2020 को संपन्न

इस लॉक डाउन की अवधि में रिश्तों को जीते जाना है

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साहित्य प्रभात का आरंभ करते हुए  उपरोक्त उद्गार  समिति के अध्यक्ष और संयोजक सिद्धेश्वर ने कहा।  मातृत्व दिवस  के अवसर पर  ऑनलाइन  दैनिक गोष्ठी  के उद्घाटन के तहत  मातृदिवस से संदर्भित  कविता, गीत  और लघुकथा  का पाठ, देश भर के साहित्यकारों ने  किया ! मुख्य अतिथि   भगवती प्रसाद द्विवेदी ने  मातृ दिवस पर अपनो एक भावपूर्ण लघुकथा का पाठ किया  और कहा कि  - "अपनी तरह का  यह अनोखा आयोजन है, जो गृहबंदी में भी साहित्य की ज्योति जलाए रखने का  सार्थक प्रयास कर रहे हैं सिद्धेश्वर जी।

कवि गोष्ठी में पढ़ी गई कुछ कविताओं का अंश:
आस्था  दीपाली  (नई दिल्ली) का कोरोना गीत इस प्रकार था - 
प्रतिकूल समय आया है ये , संयम से साथ निभाना है
कोरोना से ये जंग हमे हिम्मत से लड़ते जाना है
**हर गली उदास है पड़ी हुई, हर दरवाज़ा भी बंद हुआ
मानव मानव से दूर खड़ा, अब खुशी का देखो रंग उड़ा
इस लॉक डाउन की अवधि में रिश्तों को जीते जाना है
कोरोना से ये जंग हमे हिम्मत से लड़ते जाना है
**ये अकथ परिश्रम करने वाले मीलों पैदल चलते हैं
संघर्ष ही जीवन है जग में, ये हममें साहस भरते हैं
इस गहन अंधेरी रात में अब, स्वर्णिम सा भोर उगाना है
कोरोना से ये जंग हमे हिम्मत से लड़ते जाना है
 **अब वक्त आ गया हे मानव, कुछ अपना भी मूल्यांकन कर
जिस अहंकार में चूर है तू , कुछ उसका भी निवारण कर
जो चला था चाँद पे बसने को, अब उसको राह दिखाना है
कोरोना से ये जंग हमे हिम्मत से लड़ते जाना है

पुष्पा "स्वाती"-
उजाले यूं उनींदी आंख से देखे नहीं जाते,
दिवाकर को नमन शैया से यूं भेजे नहीं जाते,
जो खोला कोष दाता ने,उसे लाने स्वयं जाएं,
हैं ये इनाम" स्वाति"औरों से मंगवाए नहीं जाते

राकेश कुमार मिश्रा -
हम कहां चांद पे जाने को गजल कहते हैं
अपना दुख दर्द भुलाने को गजल कहते हैं
साथ बीते हुए लम्हों को भुलाया कैसे
बस यही याद दिलाने को गजल कहते हैं
जाने किस बात पर रूठे हैं खुदा ही जाने
हम उन्हें यार मनाने को गजल कहते हैं
महफिलें खत्म हुई यारों ने छुड़ाया दामन
अपनी तन्हाई मिटाने को गजल कहते हैं
फूल कुम्हला गए कलियों का न पूछो 'राकेश'
खाक सेहरा* में उड़ाने को गजल कहते हैं।

पुष्प रंजन कुमार -
रहीम करता है पैदा
या राम जन्म देता है
धूल में मिल जाता है कोई
और कोई धुआं हो जाता है
बरखुदार, लगता है
मेरा ईश्वर और तेरा खुदा
मिलजुलकर काम करता है।
**जबह करता है कोई मेरा
या कोई तेरा हत्या करता है
बचाने ना खुदा आता है
ना भगवान रक्षा करता है
बरखुदार, लगता है
मेरा ईश्वर और तेरा खुदा
मिलजुलकर रहता  है ।
**मैं साधना करता हूं
तुम अजान पढ़ता है
ना तेरा सुनता है
नहीं मेरा बोलता है
बरखुदार , लगता है
मेरा ईश्वर और तेरा खुदा
मिलजुलकर काम करता है।
मेरा लहू निकलता है
तेरा खून बहता है
 मैं जिंदा नहीं रह पाता 
और तू भी मर जाता है
बरखुदार , लगता है
मेरा चाकू और तेरा खंजर
मिलजुलकर वार करता है ।

ऋचा वर्मा -
एक मां हूँ मैं,
अपने बच्चों के लिए, कोमल भावनाएं रखतीं हूँ।
दुनिया की सारी खुशियां,
निछावर करना चाहती हूँ। 
चाहतीं हूँ.. मेरे बच्चे... 
तू जिन राहों से गुजरे, 
फूल बिछे हों,उन राहों पर।
पर मेरे बच्चे... 
जान ले कई बार,
यह जिंदगी फूलों की सेज है,
तो कई बार कांटों का ताज भी।
मां के आंचल की छांव,
और पिता के सरपरस्ती के बाहर, 
कभी - कभी, यह दुनिया पेश आएगी,
बहुत क्रुरता से, तुम्हारे साथ।
इसलिए दिल मजबूत कर लेती हूँ.. 
जब कभी तुम्हारे कदम लड़खड़ाते हुए देखती हूँ,
जबरन हाथों को रोक लेती हूँ,
तुम्हें पकड़ने से... 
जानती हूँ, एक दिन लड़खड़ाते - लड़खड़ाते,
तुम्हारे कदम संभल जाएंगे।
आज तो बढ़ कर पकड़ लूं तुम्हे
लेकिन तुम्हे तो रहना है,
इस दुनिया में.. मेरे बाद.., 
जब मैं न होऊंगी तो,
फिर कौन संभालेगा तुम्हे,
यही सोचकर रोक लेती हूँ, खुद को।
एक मां हूँ मैं
चाहतीं हूँ तुम्हे मजबूत देखना.. 
.. इतना मजबूत कि, कल को जब मेरे कदम लड़खड़ाएं,
तो उन्हें संभालने के लि‍ए, तुम्हारे हाथ आगे आएं

सिद्धेश्वर - 
 प्रकृति  की  अनुपम  सृष्टि  है  मां ! 
  संसार   की   दिव्य - दृष्टि   हैं  मां ।। 
  मां है तो  जीवन, कितना अनमोल है।। 
  मां  के आंचल में समाया भूगोल है।। 
  मां  की  गोद  में  पनपता  है  प्यार । 
  दूजा  कौन  दे  सकता  है  ऐसा दुलार। 
  ईश्वर  की  आराधना और भक्ति है मां ।
  लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा की शक्ति है मां!! 
   मां  की  ममता  का  नहीं  कोई  मोल ।
    नाप लो  आकाश  या  फिर  भूगोल ।। 
    मां के बिना जीवन का सफर है अधूरा।.   
    मां  की  छांव में हर ख्वाब होता है पूरा।।.     
     देवलोक से उतरी हुई प्रतिमूर्ति हैं मां ।
   धर्मग्रंथ, साहित्य की जीवंत कृति है मां।।.        
    
भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा किसाहित्य की विविध विधाओं की मार्फत माँ की बहुआयामी छवियां उकेरकर उन्हें नमन करने का यह आयोजन अविस्मरणीय है जिसमें 
रचनाकारों ने गहरी संवेदना जगाई।।
...

रपट की प्रस्तुति - सिद्धेश्वर 
प्रस्तोता का ईमेल आईडी - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का आईडी - editorbejdondia@gmail.com














Sunday, 10 May 2020

भोजपुरी और हिंदी के दिवंगत लेखक कृष्णानंद / लेखक - जितेन्द्र कुमार

भोजपुरी और हिंदी के लेखक कृष्णानंद कृष्ण 27.4.2020 को सिधारे

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कृष्णानंद कृष्ण 


कृष्णानंद कृष्ण जी हिंदी पत्रिका"पुनः"के संपादक थे।पुनः समकालीन कथा चेतना की अनियतकालीन पत्रिका रही है। हिंदी अँग्रेजी और भोजपुरी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी।हिंदी भोजपुरी के कई साहित्य रूपों में उन्होंने सृजन किया और साहित्य को समृद्ध किया।शरीर में सोडियम की कमी से वे पिछले कई सालों से जूझ रहे थे।कुछ महीनों से वे बेंगलुरू में बेटे के पास रहकर इलाज करा रहे थे। 27अप्रैल,2020 को 72 वर्ष 9 महीना 25 दिन की उम्र में उनका निधन बेंगलुरू में हो गया। भोजपुरी में उनके  पाँच कहानी-संग्रह हैं---
(1) एह देश में, (2) रावन अबहीं मरल नइखे, (3) गाँव बहुते गरम बा, (4) हादसा, (5) एक सही निर्णय

कृष्णानंद कृष्ण एक अच्छे शायर और कवि थे । भोजपुरी में उन्होंने ग़ज़लें और सॉनेट लिखे। उनका ग़ज़ल-संग्रह है:नया सूरज चढ़ल जाता। 51 सॉनेटों का संग्रह है: आपन गाँव भेंटाते नइखे।

भोजपुरी साहित्य के वे चर्चित आलोचक थे। भोजपुरी आलोचना की उनकी उल्लेखनीय किताबें हैं:(1) भोजपुरी कहानी:विकास आ परम्परा, (2) हिंदी लघुकथा:स्वरूप और दिशा,।

इसके अतिरिक्त संपादित कृतियाँ हैं: (1) भोजपुरी कहानी,(2) समकालीन भोजपुरी कहानियाँ, (3) प्रतिनिधि कहानी भोजपुरी के,(4) इसी दिन के लिए, (5)लघुकथा:सृजन और मूल्यांकन (6) शताब्दी शिखर की हिंदी लघुकथाएँ (7) एक मुट्ठी लाई,(8) एकइसवीं सदी आ भोजपुरी,।उन्होंने आनंद संधिदूत और भाष्कर जी के साथ मिलकर"भोजपुरी के अस्मिता चिंतन"का संपादन किया।

वे भोजपुरी साहित्य के ऐक्टिविस्ट साहित्यकार थे।वे अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन के पूर्व महासचिव थे।

उनका आशियाना पथ संख्या-8,अशोक नगर, कंकड़बाग कॉलोनी, पटना-20 में था। शायद उनके दो पुत्र और एक सुपुत्री हैं। तीनों व्यवस्थित हैं। उनकी पत्नी अभी हैं।

कंकड़बाग स्थित आवास पर मैं उनसे कई बार मिला था।अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन के विलासपुर और जमशेदपुर अधिवेशन में एवं कार्यकारिणी की बैठकों में उनसे मुलाकात होती थी।वे रिटायर्ड सहायक अभियंत्रण अभियंता थे। उनका जन्म 2 जुलाई,1947 को भोजपुर जिला के चाँदी गाँव (नरहीं चाँदी) में हुआ था।

उन्होंने भोजपुरी साहित्य की अप्रतिम सेवा की। उनके निधन से भोजपुरी और हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है।इधर भोजपुरी के कई साहित्यकार लगातार मंच छोड़ते जा रहे हैं:पाण्डेय कपिल, गीतकार अनिरुद्ध, प्रो ब्रजकिशोर, कथाकार बरमेश्वर सिंह, कवि कथाकार संपादक जगन्नाथ जी, अक्षयवर दीक्षित जी सभी थोड़े समय में दिवंगत हो गए।

कृष्णानंद कृष्ण जी की स्मृति को नमन।
...................

लेखक - जितेन्द्र कुमार
लेखक का ईमेल आईडी -  jitendrakumarara46@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल आईडी - editorbejodindia@gmail.com






इस लेख के लेखक - जितेंद्र कुमार


Sunday, 3 May 2020

जनगीतकार नचिकेता) / लेखक-जितेन्द्र कुमार

साहित्याटन

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साहित्यकार नचिकेता


23 अप्रैल,2017. कल वरिष्ठ जनगीतकार नचिकेता से सेलफोन पर बात हुई है। वे मुजफ्फरपुर में हैं, गीतकार डॉ यशोधरा राठौर के किसी घरेलू कार्यक्रम में।शाम तक पटना लौट आयेंगे। 23अप्रैल को पटना आवास पर मुलाकात हो सकती है।उन्होंने कहा कि पटना जंक्शन पहुँचकर फोन से सूचित कर दीजिए, वैसे बाहर जाने का प्रोग्राम नहीं है।संभव हो तो बहादुर पुर कॉलोनी के लिए ऑटो पकड़कर भूतनाथ रोड मोड़ आ जाइए, वहाँ मैं आ जाऊँगा।भूतनाथ मोड़ से दूसरा ऑटो पकड़ना होगा।अच्छा होगा भूतनाथ रोड मोड़ में मेरा इंतजार कीजिए।


मेरी जानकारी में।वरिष्ठ जनगीतकार नचिकेता के अबतक19गीत-संग्रह प्रकाशित हैं।1973में उनका पहला गीत-संग्रह 'आदमकद खबरें' प्रकाशित हुआ था।इसके अतिरिक्त एक ग़ज़ल-संग्रह 'आइना दरका हुआ' और आलोचना की दो पुस्तकें--'गीत रचना की नयी जमीन' और 'कोहरे में सच 'प्रकाशित हैं।' कोहरे में सच 'संपादित पुस्तक है जिसमें नचिकेता के संपादकीय के अलावे श्रीधर मिश्र, सतीशराज पुष्करणा, अमित कुमार और नचिकेता के एक-एक आलेख संकलित हैं।लेकिन इतने विपुल और स्तरीय लेखन के बाद भी लेखक संगठन के आलोचकों ने उन्हें उपेक्षित रखा।30-31मार्च को फणिश्वरनाथ रेणु भवन के सभागार में राजभाषा परिषद् द्वारा आयोजित पुरस्कार और सम्मान समारोह के अवसर पर काव्य-पाठ में नचिकेता के जनगीतों की श्रोताओं ने खूब सराहना की। उस अवसर पर पढ़ा गया एक जनगीत----
         डरो नहीं
       -------------
झरकी पेड़ों की डालें हैं
                  डरो नहीं
अच्छे दिन आनेवाले हैं
                 डरो नहीं
भेद समझना होगा इस अँधियारे का
महँगाई के बरस रहे अँगारे का
काले धन के मुँह काले हैं
                   .     .      डरो नहीं
खेल सियासत खेल रही कितना अच्छा
खेल नहीं पाता डर के मारे बच्चा
उगे जीभ पर गर छाले हैं
                                डरो नहीं
दूध पीला नागों को पाला पोसा क्यों
सपने तो सपने हैं, करें भरोसा क्यों
फैले मकड़ी के जाले हैं
                                 डरो नहीं
सारे गाँव स्वच्छ और सुंदर होंगे
न्युयार्क जैसे सब महानगर होंगे
अगर अभी गंदे नाले हैं
                                 डरो नहीं

उपरोक्त जनगीत में प्रतिरोध और तंज की जो धार है वो किसी समकालीन कविता से कम नहीं है।ऐसा नहीं कि यह एकलौता जनगीत है इस तरह की अभिव्यंजना का, बल्कि ऐसे जनगीतों की भरमार है नचिकेता के यहाँ।

तो 23अप्रैल है; वीर कुँवर सिंह और बाबा साहेब भीमराव अंबेदकर की जयंती है।सुबह शांत है। कोयल कूक रही है। मैं चाय पीते हुए मन ही मन पटना जाकर नचिकेता जी से मिलने की सोच रहा हूँ।अमिताभ दिल्ली गये हैं।रहते तो ट्रेन का पोजिसन बताते और स्टेशन से टिकट ला देते। मैं स्टेशन जाता हूँ।पूर्वा एक्सप्रेस तीन घंटे बिलंब से चल रही है। संभावित समय नौ बजे है।प्रभु जी जब से रेलमंत्री बने हैं, रेलगाड़ियाँ समय पर चलना भूल गई हैं।

पूर्वा साढ़े नौ बजे आरा पहुँचती है। सवा दस बजे मैं पटना जंक्शन पहुँचता हूँ। निकास वाले हॉल के एक कोने में भीड़ नहीं है।वहाँ खड़ा होकर मैं नचिकेता जी को फोन लगाने की कोशिश करता हूँ।रिंग हो रहा है, फोन कोई उठा नहीं रहा है। दस पन्द्रह मिनट की कोशिश के बाद मैं तय करता हूँ कि भूतनाथ रोड तक ऑटो से चलूँ, आगे कि आगे देखूँगा।

स्टेशन परिसर से बाहर होता हूँ।सामने महावीर मंदिर में भक्तों की अपार भीड़ से फूलमाला वाले, लड्डूवाले-पेंड़ावाले से लेकर पुजारी-पंडा लोग अतिशय प्रसन्न हैं।रेल की भाप इंजन धरोहर के रूप में नुमाइस के लिए रखी गयी है।रेल इंजन और महावीर मंदिर के बीच सड़क पर भिखारियों की भीड़ पूँजीवादी चेहरे पर काले मसा की तरह शोभायमान है।पुजारी के अनुसार ये सब पूर्व जन्म के पापों को भोग रहे हैं।इ समें व्यवस्था क्या करेगी?70साल बीत जाये या देश स्वतंत्रता की शतवार्षिकी क्यों न मना ले।

भाप इंजन के सामने गोलाकार नेहरू पार्क है जिसमें नेहरू शांति कपोत उड़ाते हुए पटना जंक्शन की ओर देख रहे हैं।शीघ्र ही नेहरू पार्क जीपीओ गोलंबर की फ्लाई ओवर को चिरैंयाटांड़ ओवरब्रिज से जोड़ने वाले ऊपरिमार्ग के नीचे आने वाला है। इंजीनियर सोच रहे हैं कि कैसे नेहरू को इस उत्तर आधुनिक उपरि पुल मार्ग से बचाया जाये।नेहरू पार्क के बायें-दाँयें फ्लाईओवर मार्ग बन गया है, बीच में बाकी है सिर्फ।कार्यस्थल लोहे के चादरों से घिरा है।चतुर्दिक धूल गर्दा कचरा बिखरा पड़ा है।वहीं ऑटो पर सवार होता हूँ, भूतनाथ मोड़ के लिए।

चिरैंयाँटांड़ ओवरब्रिज पारकर ऑटो कंकड़मार्ग मेन रोड पर पूरबदिशा में भाग रहा है।अजीब अफरातफरी, अपरिचय और भागमभाग का संसार है। भूतनाथ रोड आ गया है।ऑटो से उतर जाता हूँ। नचिकेता जी को फोन पर संपर्क करने की कोशिश करता हूँ। मोबाइल व्यस्त है या स्वीच ऑफ है।क्या करूँ?लौट जाऊँ?पटना में बहुत थोड़े साहित्यकार हैं जो आपस में मिलते जुलते हैं। हारी-बीमारी में एक दूसरे को देखने तक नहीं जाते। मैं आगे बढ़ने का निश्चय करता हूँ।भूतनाथ रोड से दूसरा ऑटो पकड़ता हूँ आनंद बिहार कॉलोनी के लिए। ऑटो चालक को मौर्या ग्लासेज बताता हूँ।वो नहीं जानता है। ऑटोवाला महावीर मंदिर सह दुर्गा मंदिर के पास उतार देता है, यहीं से पता कीजिए। बिहार में देवी देवताओं के बीच आजकल सामंजस्य बढ़ रहा है। महावीर मंदिर है तो वहाँ दुर्गा जी काली जी शंकर जी सब सह अस्तित्व में रहने को तैयार हो जाते है। पुजारी जैसा चाहते हैं वैसे रहना पड़ता है देवी देवताओं को। मंदिर के पास एकमात्र रिक्शा खड़ा है। नचिकेता जी का मोबाइल व्यस्त है।वे नियमित लेखक हैं। प्रतिदिन गीत लिखते हैं।बहुत लोग एतवार के एतवार कविता लिखते हैं, वे वैसा नहीं हैं जनगीत लिखने में मस्त हो गये होंगे। किसी तरह का व्यवधान गीत की छंद-मात्रा बिगाड़ देगा। ग्यारह बज गये हैं।अप्रैल की धूप अप्रैल की धूप की तरह है।

रिक्शावाला से मौर्या ग्लासेज के बारे में बताता हूँ। संयोग ठीक है। उसी के आसपास वह रहता है।बीस रुपये लेगा।कोई बात नहीं।रिक्शावाला एक दो मंजिला मकान के पास रिक्शा रोकता है, कहता है यही मौर्या ग्लासेज है।नाम बड़े और दर्शन छोटे।सड़क पर अप्रैल में पानी जमा है। अविकसित इलाका है।सामने दक्षिण की ओर बाई पास सड़क दिखती है।यहीं से आनंद बिहार कॉलोनी आरंभ होती है।नचिकेता जी का आवास मौर्या ग्लासेज के दक्षिण है और अगर सचमुच यही मौर्या ग्लासेज भवन है तो यहीं नचिकेता जी भी रहते होंगे।मौर्या ग्लासेज की एक छोटी सी दुकान संचालक से पूछता हूँ--इधर लेखक टाइप का कोई आदमी रहता है।वह थोड़ा दिमाग पर जोर लगाता है--लेखक टाइप का आदमी!हाँ भई, बड़े लेखक हैं।वह आदमी एक मकान के परिसर में आम का छोटा सा पेड़ दिखाता है, वहाँ पूछिए।वहाँ पूछता हूँ। वो बगल के मकान की ओर इशारा करता है। मैं लोहे के लघु गेट के पास जाता हूँ।एक विद्यार्थी सिर में हेलमेट डाले गेट से बाहर आना चाहता है।यहाँ कोई लेखक रहते हैं?हाँ।क्या नाम है?नचिकेता।नचिकेता!हैं क्या घर में?वो विद्यार्थी अंदर जाकर सूचित करता है। सामने के कमरे की खिड़की से नचिकेता जी बनियान और लुंगी में दिखते हैं। मेरा मन बहुत खुश होता है। नचिकेता जी इतनी आसानी से मिल जायेंगे, विश्वास नहीं हो रहा है। उनको आश्चर्य हो रहा है कि मैंने उनका घर इतनी आसानी से खोज लिया जबकि घर के बाहर कोई नेम प्लेट वगैरह नहीं।वे स्नेहपूर्वक अपने कमरे में ले जाते हैं।

सामान्य शिष्टाचार के बाद गीत नवगीत जनगीत की लंबी परंपरा की बात वे करते रहे।शंकर शैलेन्द्र, केदारनाथ अग्रवाल, कैलाश गौतम से लेकर शांति सुमन के गीतों की चर्चा हुई। गीतों के संदर्भ में वरिष्ठ गीतकार नचिकेता जी का अध्ययन व्यापक और गहरा है। ग्रामीण संस्कृति पर नचिकेता जी की गहरी पकड़ है।लोक जीवन के शब्दों ही नहीं बल्कि क्रियाओं प्रक्रियाओं की महीन समझ रखते हैं वे।वे लेखन के साथ अध्ययन भी करते हैं।वे बेहिचक बताते हैं कि अँग्रेजी पर उनकी पकड़ मजबूत नहीं है इसलिए अनुवादों के सहारे वे विदेशी लेखकों की पुस्तकों का अध्ययन करते हैं।वे कहते हैं कि गीतों/जनगीतों की परंपरा वेदों उपनिषदों से भी पुरानी है।गीत जनता की कंठ में बसते हैं, एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को पास ऑन किया। गीतों का उद् भव मनुष्य के श्रम से सीधा जुड़ा है। श्रम करता आदमी गुनगुनाता है।सुख-दुख, युद्ध और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति वह गीत गाकर करता है।नचिकेता जी ने जॉर्ज थाम्सन की किताब' मार्क्सिज्म एंड पोएट्री ',क्रिस्टोफर कॉडवेल की पुस्तक "इल्युजन एवं पोएट्री"अर्न्स फिशर की मशहूर पुस्तक"नेसेसिटी ऑफ आर्ट"का अनुवाद पढ़ा है।उन्होंने कहा कि"मदर"में रूसी उपन्यासकार गोर्की ने गीत के उत्स पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। नचिकेता गीत रचना की जमीन तलाशते रहे हैं।

वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय के बारे में उनकी टिप्पणी है कि वे गीतों की आलोचना के लिए गीतकार के अनुसार आलोचना के प्रतिमान बदलते रहते हैं।पाण्डेय जी शंकर शैलेन्द्र के जनगीतों को आंदोलनधर्मी बताते हैं, नचिकेता के गीतों में करूणा और ममता खोजते हैं, और शांति सुमन के गीतों में उनको लोक चेतना नयी काया में अवतरित दिखती है।आखिर जनगीत का प्रतिमान क्या है--लोकचेतना का अवतरण या आंदोलनधर्मिता या करुणा और ममता का उद्रेक।

बातचीत को मैं थोड़ा घरेलू मोड़ देता हूँजिसमें यह अकादमिक न हो जाये।माता पिता के बारे में बताते हैं कि पिता रामचंद्र दिवाकर1978में गुजर गये, माँ1992में गईं।उनके दो बेटे और दो बेटियाँ हैं।सभी विवाहित।सब के नाम के साथ उपनाम किरण लगा है--प्रत्युष किरण, अमिताभ किरण, उषा किरण और स्मृति किरण।बिहार में जाति सूचक उपनाम रखने की रूढ़ि है।चुनाव लड़ना हो तो और जरूरी है। संख्या के आधार पर वर्चस्वशाली जाति से आते हैं तो सोना में सुहागा। नचिकेता जी का परिवार जातिसूचक केंचुल झाड़ चुका है।इस बीच मिठाई, नमकीन, चाय, पानी आता रहता है।

सन् 2000में नचिकेता जी के हार्ट की ओपेन सर्जरी हुई। तब मैं व्यक्तिगत रूप से परिचित नहीं था। जानकारी बाद में मिली।बाद में कई बार हमलोग मिल चुके हैं।2015में उनके दोनों घुटनों का सफल आपरेशन हुआ।मधुकर सिंह सम्मान समारोह में वे आरा नागरी प्रचारिणी सभागार में आये थे।कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर के साथ।मैं मंच संचालन में व्यस्त था। अब वे घुटने की परेशानी से मुक्त हैं।हार्ट की सर्जरी हो या घुटनों का आपरेशन, बहुत कम रचनाकार मित्र हालचाल पूछने आवास तक आये। फोन पर समाचार लेने वाले भी कम ही रहे।

नचिकेता का ही गीत है---"कहें किससे"
मेरे घर में
घुस आया बाजार, कहें किससे
पत्नी की
फरमाईश कभी नहीं पूरी होती
बच्चों की जिद मेरे मन की
मजबूरी होती
हुए सभी रिश्ते--
नाते व्यापार, कहें किससे

विद्वान आलोचक ब्रजेश पाण्डेय ने गीत-संग्रह"तुम्हीं तो हो"की भूमिका में लिखा है----
"विद्यापति(कामिनी करये सनाने)और रीतिकाल के अधिकांश कवियों में लौकिक प्रेम के पर्याप्त और उच्चस्तरीय उदाहरण प्राप्त होते हैं।छायावाद की विशेषता यह है कि उसने नये सिरे से लौकिक प्रेम की आधुनिक भावभूमि तैयार की।उस पर उत्तर छायावाद के कवियों ने प्रेम काव्य की जो इमारतें तैयार कीं उनमें रहस्य की भी कोई विवशता नहीं रही।नायक-नायिका के अन्य पुरुष की विवशता भी कमजोर पड़ी और सीधे उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष के परस्पर प्रेम को प्रवेश मिल गया।.....उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष की प्रधानता होते ही बाह्य अलंकार शृंगार'हटा और आंतरिक भाव'प्रेम'स्वत:कवियों द्वारा गृहित हो गया।

आधुनिक प्रेम काव्य में केदारनाथ अग्रवाल की परंपरा में सर्वश्रेष्ठ गीतकार कवि नचिकेता ने हिन्दी प्रेम काव्य में इस मध्यम पुरुषीय अपनेपन को उल्लेखनीय विस्तार, गहराई और उच्चता दी है।"

नचिकेता जी ने तीन पुस्तकें मुझे भेंट स्वरूप दीं--रंग न खोने दें(2007),तुम्हीं तो हो(2015),कुहरे में सच(2014).कुहरे में सच में श्रीधर मिश्र का28पृष्ठों का आलेख:गीत-पुरुष:नचिकेता, उल्लेखनीय है।इसी तरह"तुम्हीं तो हो"की भूमिका15पृष्ठों की ब्रजेश पाण्डेय की काबिले तारीफ हीनहीं है, नचिकेता के गीतों को समझने में पाठक को मदद भी करती है।

डेढ़ दो घंटे बातचीत के बाद मैं नचिकेता से बिदा लेता हूँ तो उनके गीत'हम न रहेंगे'की पंक्तियाँ याद आ रही हैं----
       हम न रहेंगे
       तब भी चिड़िया चहकेगी
       हम न रहेंगे
        तब भी हरियाली होगी
        हर सुबह-शाम चेहरे पर
        लाली होगी
        औ'ताजा जुते
        खेत की मिट्टी महकेगी
       हम न रहेंगे
       तब भी कोंपल फूटेगी
       जनगण के होंठों की
       खामोशी टूटेगी
       हर चूल्हा के अंदर
      कुछ लकड़ी दहकेगी.
........

लेखक - जितेन्द्र कुमार 
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लेखक - जितेन्द्र कुमार

Friday, 13 March 2020

होली मिलन समारोह पटना के रामकृष्ण नगर चित्रगुप्त समिति का 7.3.2020 को संपन्न

बीवी एक सुनियोजित आतंकवाद है! तो, प्रेमिका तस्करी का माल है 

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पटना के रामकृष्ण नगर चित्रगुप्त समिति के द्वारा आयोजित होली मिलन समारोह के अंतर्गत एक यादगार फागुनी कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। फागुनी कवि गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, वरिष्ठ कवि- कथाकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि "यह होली का त्यौहार प्रेम और सौहार्द का संदेश लेकर आता है!"

कार्यक्रम रामलखन महतो पथ, पटना में सम्पन्न हुआ. इस संस्था के अध्यक्ष- सत्येन्द्र नारायण, उपाध्यक्ष-अप्पू और  सचिव- वाई.के.वर्मा हैं।

होली  काव्योत्सव  का रंगारंग संचालन करते हुए कवि सिद्धेश्वर ने कहा कि "सद्भावना भाईचारा का उत्सव है होली का त्योहार। आपसी रंजिशें  भूलकर, आपसी संबंधों को प्रगाढ़ करने वाला पर्व है होली!" कवि मधुरश नारायण के संयोजन में  प्रस्तुत इस साहित्यिक आयोजन में अपनी रंगीले छबीले और मदमस्त करने वाले गीतों, गजलों और व्यंग्य कविताओं का पाठ करने वाले चर्चित कवियों में प्रमुख थे- भगवती प्रसाद द्विवेदी , विश्वनाथ वर्मा, सुनील कुमार उपाध्याय, मनोज कुमार, मधुरेश शरण, सिद्धेश्वर और लता प्रासर!" भोजपुरी और हिंदी के चर्चित कवि सुनील कुमार ने अपनी कविता में फागुनी उन्माद भरते हुए कहा-
 "जिंदगी के सोलहो शृंगार बन के आव  
 सावन के  झमझम फुहार बनके आव !"  

दूसरी तरफ गीतकार मधुरेश नारायण ने अपनी दो फागुनी गीतों गाते हुए श्रोताओं को मन मुग्ध कर दिया 
- "हौले-हौले,चुपके-चुपके है यह किसकी आहट
खिड़की से बाहर झाँका तो खड़ी मिली फगुनाहट।!"

 कवि - कथाकार भगवती प्रसाद द्विवेदी ने सावन का स्वागत इस प्रकार किया - 
"चिड़ियों की चह-चह / फूलों की मह-मह
 तितली की अठखेलियां /भंवरों की रंगरेलियां
 हैं तुम्हारी ही बदौलत तुम्हीं ने बना रखे हैं 
पशु- पक्षी, पेड़- पौधों से ताल- तलैया
नदी - पोखर घाटी - पहाड़ों से 
चंदा सूरज और  तमाम सितारों से/
अटूट मानवीय रिश्ते!" 
और उन्होंने फागुन के स्वागत में गीत सुनाया-
"फागुन आहट गाल पर /आंखों में मधुमास 
अधरों पर जगने लगी /अब पावस की प्यास/
तन के गुलशन में खिले /नए-नए ये फूल 
लगा गुदगुदाने पवन कर बैठूं न  भूल !"

 संचालन के क्रम में ही कवि सिद्धेश्वर ने  होली को रंगीन बनाते हुए कहा-
"रंगीं मिजाज लिए हम भी बैठे तेरी जानिब  / थोड़ी अबीर , थोड़ा रंग -  हमें लगा दीजिए 
यौवन के नशे में डूबे स 'मायूस' को  वासंती आंचल की जरा-सी हवा दीजिए। 
/घर - घर पहुंच गया, खुशबू का पता प्यार की तितली हवा में उड़ा दीजिए!" 

और इसी क्रम में मनोज कुमार अम्बष्टा ने सकारात्मक संदेश पहुंचाया श्रोताओं के बीच -
"दिल में हो जो उमंग तो क्या कर नहीं सकते 
करने पर जो आ जाए तो क्या कर नहीं सकते!"
नफरत की आग में जल रहा यहां हर इंसां 
दो बोल प्यार के हों तो क्या कर नहीं सकते! "

कवयित्री लता प्रासर ने फागुन का स्वागत करते हुए कहा- 
"भोरे - भोरे चली पुरवइया फागुन का लेकर संदेश
/कहां उड़े रंग , कहां गुलाल मौसम को देने संदेश!"

हास्य - व्यंग्य कवि विश्वनाथ वर्मा ने कुछ व्यंग्य कविताओं का पाठ किया -
"मोहब्बत के बिना जिंदगी नमक के बिना दाल है 
बीवी एक सुनियोजित आतंकवाद है! तो, प्रेमिका तस्करी का माल है 
बीबी सत्यनारायण जी की कथा है, तो प्रेमिका प्रसाद है!" 

फागुनी काव्योत्सव का समापन करते हुए सिद्धेश्वर ने कहा -
 "मूंठ पर गुलाल, चढ़े हैं / चित्त पर रंग
मस्त होली को / रंगीं बना दीजिए! "

समारोह में कवियों और चित्रगुप्त समिति के सैंकड़ों युवा बुजुर्ग पुरुष और महिलाओं ने जमकर अबीर गुलाल का गुब्बार उड़ाया। एक-दूसरे का अभिवादन किया। एक पारिवारिक महौल तैयार कर, नाचा गाया। 

और इन सब के साथ-- साथ हास्य-व्यंग्य से लबालब रंगीन कविताओं का आनंद भी लिया। 
.............

प्रस्तुति एवं छायाचित्र - सिद्धेश्वर 
एक प्रस्तोता का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com


Saturday, 29 February 2020

रहना है जब साथ-साथ फिर तनातनी क्यों ? / कवि - हरिनारायण सिंह 'हरि'

गीत
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1
रहना है जब साथ-साथ फिर तनातनी क्यों ?
हिलमिल रहने का अपना इक धरम बनायें।

केवल निज हित सोच हमें छोटा करता है,
सिर्फ स्वार्थ तो हाय! हमें खोटा करता है।
परहित-चिंतन ही तो हमें बनाता मानव,
आओ परहित-चिंतन में हम समय बितायें।

हिन्दू-मुस्लिम धर्म नहीं, पूजा-पद्धति है, 
हाय बड़ा दुर्भाग्य हमारी यह दुर्गति है।
सबका है इक धर्म, जो वर्णित सद्ग्रंथों में,
परोपकार,सत्कर्म!उसी को हम अपनायें। 

राजनीति तो सब दिन से बहकी-सहकी-सी,
इसके कारण युग-युग से जनता दहकी-सी।
ऋषियों, सुफियों का सानिध्य बड़ा सुखदायी 
राह उसी की चलें, वही पथ हम अपनायें ।
......

2
गजल

दूर घर से रह रहे हैं, क्या कहें 
दुःख कैसा सह रहे हैं, क्या कहें 

पेट पापी भर सके इस वास्ते
कंटकों पर चल रहे हैं, क्या कहें 

उफ्! सुगंधी स्वप्न निज परिवेश का
अब नहीं मह-मह रहे हैं, क्या कहें

दिवस सोते, रात का जब शिफ्ट है
रतजगा हम कर रहे हैं, क्या कहें 

क्यों नहीं निज प्रांत में भी जाॅब हो
आप क्या-क्या कर रहे हैं,क्या कहें

पीर अपनी रोज बढ़ती जा रही
किस हवा में बह रहे हैं, क्या कहें !
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कवि - हरिनारायण सिंह 'हरि'
वर्तमान पता -अंकलेश्वर (गुजरात)
मूल पता - मोहनपुर (बिहार)
कवि का ईमेल - hindustanmohanpur@gmail.com
कवि का परिचय - कवि हिंदी और बज्जिका के जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार हैं.
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Tuesday, 25 February 2020

पाटलिपुत्र काव्य महोत्सव का आयोजन नवभारती सेवा न्यास द्वारा पटना में 23.2.2020 को पटना में सम्पन्न

कटी न बेड़ियाँ अपने ही पाँव काट लिए

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नवभारती सेवा न्यास के तत्वावधान में दिनांक 23.02.2020 दिन रविवार को संस्कारशील पुस्तकालय, गर्दनीबाग पटना में एक शानदार कार्यक्रम "पाटलिपुत्र काव्य महोत्सव" का आयोजन हुआ। कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत कार्यक्रम के अतिथियों भगवती प्रसाद द्विवेदी,  ध्रुव गुप्त, नीलांशु रंजन, वरुण सिंह, घनश्याम ने दीप प्रज्वलित कर किया।

कार्यक्रम की शुरूआत में मुख्य वक्ता ध्रुव गुप्त ने कहा कि कविता को अगर जिंदा रखना है तो उसका लय बनाये रखना होगा। वहीं वरिष्ठ कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि मंच की कविता और पत्र पत्रिकाओं में छपने वाली कविताओं में समरूपता होनी चाहिए। हास्य की कविताएँ हास्यास्पद नही प्रतीत होनी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार और शायर नीलांशु रंजन ने कहा कि सोशल साइट ने कविता की पहुँच को बढ़ाया है। रचनाकारों को शिल्प पर ध्यान देना चाहिए। इस कार्यक्रम की आयोजिका प्रीति सुमन ने कहा कि यह सम्मेलन मुख्य रूप से साहित्यिक गतिविधियों को प्रगति देने के उद्देश्य से करवाया जा रहा है। ऐसे साहित्यिक कार्यक्रमों को समाज में लगातार करवाते रहने की आवश्यकता है।  इस कार्यक्रम के संयोजक युवा कवि कुंदन आनंद ने बहुत शानदार तरीके से मंच संचालन किया। 

कार्यक्रम दो सत्रों में सम्पन्न हुआ। प्रथम सत्र में आमंत्रित वक्ताओं द्वारा वक्तव्य प्रस्तुत किया । दूसरे सत्र में बिहार के विभिन्न कोने-कोने से आये युवा कवियों ने काव्यपाठ किया जिनमें कवयित्री अल्पना आनंद ने अपनी रचना "उसने चौखट लांघी होगी, चौखट कितना रोया होगा" सुनाकर सबको मन्त्र-मुग्ध कर दिया। कवि कुंदन आनंद ने "हमको काँटों ने पाला पिता की तरह, मेरे काँटों को फूलों से ना तौलिए" सुनाकर श्रोताओं को भाव-विह्वल कर दिया। कवि विकास राज ने अपनी रचना "गजब की चाह थी उसमें रिहा होने की, कटी न बेड़ियाँ अपने ही पाँव काट लिए" सुनाकर लोगों का दिल मोह लिया। कवि उत्कर्ष आनंद भारत ने अपनी रचना "महाभारत का होना तय है" सुनाकर लोगों को आकर्षित किया।

युवा कवयित्री प्रीति सुमन ने "आई प्रणय की मधुर बेला रे" गीत सुनाकर लोगों को भावविभोर कर दिया। ज्योति स्पर्श ने भूख की विवशता पर मार्मिक ग़ज़ल का पाठ कर लोगों को भाव-विह्वल कर दिया।  अन्य कवियों में शिवांशु सिंह, प्रेरणा प्रताप, नेहा नुपूर, आराधना प्रसाद, रवि सिंह पार्थ, मुकेश ओझा, अनुराग कश्यप ठाकुर, भारती रंजन कुमारी, स्वतंत्र शांडिल्य, राहुल चौधरी, साकेत ठाकुर, सुनील कुमार, कवि घनश्याम, रंजीत दुधू, गौतम वात्स्यायन, नरेंद्र कुमार, प्रियंका प्रियदर्शिनी, सिद्धेश्वर, डॉ नीलम श्रीवास्तव, कुमार आर्यन, नवनीत कृष्ना, अभिलाषा सिंह, स्वराक्षी स्वरा, कुमारी स्मृति, कुमार रजत, चंदन द्विवेदी सहित कुल 50 कवियों ने शिरकत किया। धन्यवाद ज्ञापन संस्था की सचिव सह कार्यक्रम संयोजिका प्रीति सुमन ने किया।
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रपट का आलेख - ज्योति स्पर्श
रपट की लेखिका का ईमेल - jtgupta9@gmail.com
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