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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@gmail.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Saturday, 2 November 2019

छठ पूजा पर कविताएँ / मधुरेश नारायण, वेद प्रकाश तिवारी, सिद्धेश्वर

क्या बताएँ - छठ क्या है / मधुरेश नारायण

(मुख्य पेज पर जायें- bejodindia.blogspot.com / हर 12 घंटे पर देखते रहें - FB+ Today Bejod India)



छठ, नहाय-खाय का "कद्दू-भात" है
छठ, खरना का पवित्र "प्रसाद" है
छठ, बाबुजी के ललाट का टीका है
छठ, माँ के हाथ का आशीर्वाद है।

छठ, डाला के फलों की ख़रीदायी है
छठ, बांस से सूप की बनवाई है
छठ, प्रसाद के आटे की पिसवाई है
छठ, ठेकुआ के सोंधी महक की छनाई है।

छठ, घाट की सजावट और सफाई है,
छठ, सुबह सुबह उठके घाट की छेकाई है,
छठ, सबसे पहले प्रसाद की लुटाई है,
छठ, घर से घाट तक डाला की धुलाई है।

छठ, अर्ध्य के दूध की धार है
छठ, बच्चे के मुंडन की बहार है
छठ, बचे हुए पटाखों की बौछार है
छठ, सुरुज भगवान के उगने का इंतज़ार है।

छठ, डूबते सूरज का प्रणाम है
छठ, उगते सूरज का सलाम है
छठ, प्रकृति का मान-सम्मान है
छठ, पूजा-अर्चना का विधान है।

छठ, खून में रचा-बसा संस्कार है
छठ, जेहन में उमड़ रही माटी की पुकार है
छठ, आध्यात्म चेतना की हुंकार है
छठ, मैं, आप, तुम और वो क्या, पूरा बिहार है।

छठ, बच्चों का हर्ष-कलरव है,
छठ, परिवारों का वार्षिक संगम है
छठ, शारदा सिन्हा की भजन का मर्म है,
छठ, लोक-आस्था का, मान्यताओं का महापर्व है।

छठ....छठ क्या है,
क्या बतायें, छठ क्या है,
कैसे बतायें, छठ क्या है ।
...

छठ महापर्व / वेद प्रकाश तिवारी

ताल, तलैया, नाहर, पोखर
हो गंगा, गंडक या कोशी
सबके तट पर भीड़ है भारी
सूर्य अर्घ्य की है तैयारी
जल में खड़ी सभी मातायें
हाथ अर्घ्य का सूप उठाये
सूरज से ये करें प्रार्थना
स्वीकार करो मेरी आराधना
दो दिन का उपवास ये रखकर
व्रत के नियम का पालन करतीं
दृढ़ संकल्पों की शक्ति से
मन ही मन दिनकर से कहतीं
सब शुभ हो
सब कुछ मंगल हो
अपनी कृपा बनाये रखना
तेरे प्रकाश से हो प्रकाशमान
मेरे अपनो का घर अँगना ।
...

छठ पूजा पर पांच हाइकु कविता / सिद्धेश्वर

1
महिमामयी
भाई-चारा का पर्व
छठ - प्रसाद!

2
मन है चंगा
तो कठौती में गंगा
तन पवित्र!।

3
गंदगी नहीं
चाहिए देवता को
साफ-सफाई!

4
अर्ध का सत्य
सूरज की महिमा
छठ - पूजन!

5
दौलत नहीं
प्रेम की है महिमा
पुण्य के लिए!!
...

कवि - मधुरेश नारायण, वेद प्रकाश तिवारी और सिद्धेश्वर 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com

कवि - मधुरेश नारायण

कवि - वेद प्रकाश तिवारी

कवि सिद्धेश्वर

हरेक रंग में दिखती हो तुम / कवि- लक्ष्मीकांत मुकुल

कविताएँ

(मुख्य पेज पर जायें- bejodindia.blogspot.com / हर 12 घंटे पर देखते रहें - FB+ Today Bejod India)



1.
मदार के उजले फूलों की तरह
तुम आई हो कूड़ेदान भरे मेरे इस जीवन में
तितलियों, भौरों जैसा उमड़ता
सूंघता रहता हूं तुम्हारी त्वचा से उठती गंध
तुम्हारे स्पर्श से उभरती चाहतों की कोमलता
तुम्हारी पनीली आंखों में छाया पोखरे का फैलाव
तुम्हारी आवाज की गूंज में चूते हैं मेरे अंदर के महुए
जब भी बहती है अप्रैल की सुबह में धीमी हवा

डुलती है चांदनी की हरी  पत्तियां अपने धवल फूलों के साथ 
मचलता हूं घड़ी दो घड़ी के लिए भी 
बनी रहे हमारी सन्निकटता

2.
बभनी पहाड़ी के माथे पर उगा
संजीवनी बूटी हूं मैं 
जो तप रहा हूं मई के जलते अंगारों से 
जीवित हूं यह उम्मीद लगाए 
कि तुम आओगी बारिश की मेघ- मालाओं के साथ
बस एक छुअन से हरा हो जाएगा 
झुलस चुकी मेरी देह की यह काया

3.
चूल्हे की राख-सा नीला पड़ गया है मेरे मन का आकाश
 तभी तुम झम से आती हो
जलकुंभी के नीले फूलों जैसी खिली- खिली 
तुम्हें देखकर पिघलने लगती हैं 
दुनिया की कठोरता से सिकुड़े
 मेरे सपनों के हिमखंड

4.
शगुन की पीली साड़ी में लिपटी 
तुम देखी थी पहली बार 
जैसे बसंत बहार की टहनियों में भर गए हों फूल
सरसों के फूलों से छा गए हो खेत
भर गई हो बगिया लिली- पुष्पों से
कनेर की लचकती डालियां डुल रही हों धीमी
तुम्हें देखकर पीला रंग उतरता गया 
आंखों के सहारे मेरी आत्मा के गह्वर में 
समय के इस मोड़ पर नदी किनारे खड़ा एक जड़ वृक्ष हूं मैं 
तुम कुदरुन की लताओं- सी चढ़ गई हो पुलुई पात पर
हवा के झोंकों से गतिमान है तुम्हारे अंग- प्रत्यंग
तुम्हारे स्पर्श से थिरकता है मेरा निष्कलुश उद्वेग

5.
दीए की मद्धिम लौ में पारा 
काजल लगाती हो जब आंखों की बरौनिओं में 
काले रंग से चमक जाता है तुम्हारा चेहरा 
जिसके बीच जोहता हूं मीठे सपने
आशंकाओं के घने अंधकार में भी 
दिख जाती है फांक भर मुझे रोशनी की लकीरें 
जिसके सहारे निर्विघ्न चल देता हूं जिंदगी की हर जंग में

6.
भोर का उगता सूरज 
गुलाब की खुलती पंखुड़ियां 
स्थिर हो गई हैं तुम्हारे होठों की लाली पर 
जिसके आगे फीके हैं अबीर - गुलाल के रंग
 चकाचौंध से भरे बाजार की नकली उत्पादों के  बरअक्स 
हमने अपने हिस्से में बचा कर रखी है
 यह अद्भुत नैसर्गिकता !

7.
इंद्रधनुष के रंग युग्मों -सी
 घुल गई हो तुम मेरे संग
आंचल की किनारी से चलाती हो जब 
सहलाती हो जब मेरे टभकते घावों को 
घिर आता हूं मीठे सपनों की
 बारिश की झड़ी में..!
        

ग़ज़ल

कोहरे से झांकता हुआ आया
मांगी थी रोशनी ये क्या आया

सूर्य रथ पर सवार था कोई
उसके आते ही जलजला आया

घोंसले पंछियों के फिर उजड़े
फिर कहीं से बहेलिया आया

दूर अब भी बहार आँखों से
दरमियाँ बस ये फ़ासला आया

काकी की रेत में भूली बटुली
मेघ गरजा तो जल बहा आया

जो गया था उधर उम्मीदों से
उसका चेहरा बुझा बुझा आया

बागों में शोख तितलियां भी थीं
पर नहीं  फूल का पता आया.
....

कवि - लक्ष्मीकांत मुकुल
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com
________
परिचय
लक्ष्मीकांत मुकुल
जन्म – 08 जनवरी 1973
शिक्षा – विधि स्नातक
संप्रति - स्वतंत्र लेखन / सामाजिक कार्य ।किसान कवि/मौन प्रतिरोध का कवि.
कवितायें एवं आलेख विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित .
पुष्पांजलि प्रकाशन ,दिल्ली से कविता संकलन “लाल चोंच वाले पंछी’’ प्रकाशित.
संपर्क :- ग्राम – मैरा, पोस्ट – सैसड, भाया – धनसोई , जिला – रोहतास  (बिहार) – 802117
ईमेल – kvimukul12111@gmail.com
मोबाइल नंबर- 6202077236

"अनारकली ऑफ आर" फिल्म की नायिका स्वरा भास्कर

कवि - लक्ष्मीकांत मुकुल

"अनारकली ऑफ आरा" के निर्देशक अविनाश दास के साथ


Wednesday, 30 October 2019

भाईदूज पर दो कविताएँ / कवयित्री - अलका पाण्डेय

कविता -1

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कवयित्री अपने भाई के साथ

भाई दूज का पर्व है आया
कुमकुम अक्षत थाल सजाया
भाई को प्रेम से तिलक लगा
रक्षा का अनमोल वादा पाया

भाई पर अटूट प्रेम बरसाये
बहनों के मन खूब हर्ष समाये
बचपन का वो लड़ना झड़ना
बीती हुई यादों से मन हर्षाये

भाई बहन रिश्ता होता खास है
कोई फ़र्क़ नहीं दूर है या पास है
ह्दय से जब एक दूजे से प्रेम हो
हर दिन ही होता फिर ख़ास है

घर आँगन में ख़ुशियाँ छाई
बहनें अक्षत रोली ले कर आई
सजी हुई थाली प्रेम की हाथो में
अधरो पर मुस्कान सजाकर आई

ह्दय की गगरी से ममता रस छलके
प्रीत डोर के प्यार में एक दूजे में बँधके
हरदम दूर रहे बहन- भाई की विपदाएँ
दुख न हो जीवन में सुख के अंकुर फूटे

मस्तक चंदन तिलक लगाकर
रक्षा का अनमोल वादा पाकर
बहना की ख़ाली झोली भर जाऐ
आओ धूम धाम से हम पर्व मनाएँ.


कविता -2

भाई दूज का पर्व मनाया
रोली अक्षत थाल सजाया
भई बहन का प्यार अमर है
हर कोई यह है जाने- माने
माँ देती खूब दुआएँ
सब की लेती है बलाऐ
भाई छोटा हो या बड़ा
बहन रक्षा का वचन है लेती
जीवन की हर कठिन डगर पर 
साथ कभी न छूटे
जीवन की आपा धापी में
रिश्तों की ये नाव कभी न टूटे
मस्तक तिलक लगाकर
गाऐ प्यार के नगमें
भर कर आँखों में आशाएँ
ममता का रस छलकाए
प्रेम ही प्रेम ह्दय समाये
एक दूजे पर विश्वास अटूट
बहन भाई का प्यार है अटूट
भाईदूज की अनुपम बेला
बहन खुशहाली के दीपजलाये
भाईदूज का पर्व मनाये
रोली अक्षत थाल सजाये.
....
कवयित्री - अलका पाण्डेय
कवयित्री का ईमेल- alkapandey74@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com


हम कौन? / कवि - मनीश वर्मा

कविता

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नाटक "काली सलवार" के एक दृश्य में रास राज और अन्य कलाकार

हम कौन हैं?
हमारा वजूद क्या है?
हम आपकी सरपरस्ती मे ही तो पलते बढते हैं 
कभी  वैधानिक तरीकों से 
तो कभी अवैधानिक तरीकों से

पर हमारी सरपरस्ती बदस्तूर जारी रहती है
सनातन काल से 
 कभी परंपरा तो कभी धर्म के नाम पर 
कभी मंदिरों में तो कभी प्रासादों मे 
हमारा स्वरूप बदलता रहा है 
हमारा नाम बदलता रहा
पर हमारी प्रकृति कभी नही बदली

कभी जोर से तो कभी पैसों की ताकत से
कभी मजबूरी में तो कभी किन्हीं और कारणों से
हम हमेशा से रहे अभिशप्त 
धक्के दिए जाते रहने को

हम समाज के अनचाहे हिस्से हैं 
 ठीक उस बच्चे की तरह 
जो इस दुनिया मे आ गया हो 
 समाज के विपरीत नियमों की वजह से

हमारी नियति है यह!
 लोगों के दमित इच्छाओं की पूर्ति करते हैं
सामाजिक ताने-बाने मे संतुलन का नाम हैं हम!
सामाजिक संतुलन मे बतौर सेफ्टी वाल्व काम करते हैं हम!

इस झूठी दुनिया में
 झूठ ही सही, कुछ देर के लिए ही सही
व्यावसायिक तरीके से ही सही
 एक छद्म आवरण के अंदर अपने को समेटे हुए 
 कंधा मयस्सर कराते हैं अपना!
पर, क्या वजूद है समाज में हमारा!

वेश्याएं हैं हम! हमेशा परोसे जाने को तैयार!
समाज हमें घृणा की दृष्टि से देखता है। 
सामाजिक रूप से तिरस्कृत हैं हम सभी!
क्या समलैंगिक हैं हम? 
अरे! समलैंगिकों को भी हमारे यहां प्राप्त है अधिकार
 कुछ वैधानिक और कुछ सामाजिक भी
हम वेश्याएं कहाँ हैं? और क्यों?
यह जन्मजात तो नही?
वंशानुगत भी नही?
यक्ष प्रश्न?
क्या वन वे ट्राफिक है यह?
सोचिए!
.....
कवि - मनीश वर्मा 
कवि का ईमेल - itomanish@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com

Tuesday, 22 October 2019

"लघुकथा कलश" के रचना प्रकिया विशेषांक का लोकार्पण-सह-विचार गोष्ठी पटना में 20.10.2019 को सम्पन्न

लालटेन के छोटे दायरे की रौशनी से भी तय होता है लम्बा सफर
लघुकथा के सृजन में रचना प्रक्रिया पर बहस और लघुकथाओं का पाठ

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पटना के कालीदास रंगालय के प्रांगण में दिनांक 20.10.2019 को लघुकथा को समर्पित अर्धवार्षिक पत्रिका "लघुकथा कलश" के रचना प्रक्रिया विशेषांक के लोकार्पण-सह- विचार गोष्ठी में अध्यक्षता करते हुए डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने लघुकथा की रचना प्रक्रिया पर विस्तार-से चर्चा की और लघुकथा के शिल्प पर भी विचार - विमर्श जमकर हुआ। किंतु उल्लेखनीय बात यह है कि ढेर सारे प्रतिनिधि लघुकथाकारों की उपस्थिति के बावजूद लघुकथा पर विमर्श और बहस वरिष्ठ कथाकारों ने किया। इसलिए लघुकथा की उपादेयता पर कम और कहानी की रचना प्रक्रिया पर बहस अधिक हुई। इस लघुकथा संगोष्ठी की प्रासंगिकता रचना प्रक्रिया के लिए नहीं बल्कि "लघुकथा कलश "में प्रकाशित लघुकथाकारों द्वारा पढी़ जाने वाली श्रेष्ठ लघुकथा के लिए याद की जाएगी। 

इस लघुकथा की रचना प्रक्रिया की संगोष्ठी के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार अवधेश प्रीत ने लघुकथा की अस्मिता पर चर्चा करते हुए कहा कि - 
"यहां हर चीज बड़ी होती है। चाहे वह महारैली हो,या महाविशेषांक। लघुकथा हो या कहानी, रचना प्रक्रिया एक रचनात्मक अनुभूति है, जो आनंद के साथ- साथ पीड़ादायक भी है। और कमोवेश प्रत्येक रचनाकार इससे होकर गुजरता है। "

"छोटी बातें लिखना बहुत बड़ी बात है। चाहे वह छोटी कविता हो, कहानी हो या लघुकथा। लालटेन की छोटे दायरे  की रौशनी के सहारे हमें लम्बा रास्ता तय करना होता है। एक लघुकथा किन प्रक्रियाओं से गुजरते हुए, अपना आकार ग्रहण करता  है, "लघुकथा कलश" के इस लोकार्पित रचना प्रक्रिया विशेषांक की यही विशेषता है।"

उन्होंने कथा की रचनाशीलता पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि  - "रचना की कलाबाजियां और रचनाकार का विजन दोनों अलग - अलग बाते हैं। हमारी रुढ़िवादिता को तोड़ने की दिशा में भी लघुकथा की अहम भूमिका रहती है। रचना प्रक्रिया के कई आयाम होते हैं। हर लघुकथाकारों की एक ही  नजरिया हो, यह जरूरी नहीं। 

लघुकथा प्रक्रिया के स्थान पर अवधेश प्रीत ने अपनी "पोखर" कहानी की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। एक कथाकार की यही ईमानदारी भी है कि वह जो जीता और भोगता है, उसी पर चर्चा करे।

किंतु क्या पटना में लघुकथाकारों का अभाव हो गया है कि लघुकथाकारों के स्थान पर इस" लघुकथा प्रक्रिया संगोष्ठी" में कहानी की रचना प्रक्रिया पर बोलने के लिए, कथाकारों को आमंत्रित किया गया। खैर,..!

विशिष्ट अतिथि कथाकार संतोष दीक्षित भी एक कथाकार के नाते लघुकथा पर कम, कथा प्रक्रिया पर अधिक बोलते नजर आएं। उन्होंने कहा कि -
"रचना जब भी मैं लिखता हूं, मेरे पास कोई अनुभव नहीं होता  है। मैं अपनी कथा प्रक्रिया की ही चर्चा कर सकूंगा। कविता न कलम से लिखी जाती है न अनुभव से, कविता हाथ से लिखी जाती है। ज्ञान अनुभव की कोई जरूरत नहीं। किसी के कहे- सुने पर विचार मत करो । अपने अनुभव से लिखो। लघुकथा का कोई शास्त्रिय या सैद्धांतिक ज्ञान की जरूरत नहीं होती । आप रसोई में भी जो मौलिक लिखती हैं, तो वह भी  साहित्य है। विधाओं का कोई शास्त्र नहीं होता, ऐसा मेरा मानना है। " ( संतोष दीक्षित जी, फिर हम कुछ भी लिखकर कविता को कहानी, कहानी को लघुकथा या लघुकथा को कहानी क्यों नहीं कहते हैं ?")
                
उन्होंने कुछ लघुकथाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि-"पुलिसिया तंत्र पर लिखी गई, सिद्धेश्वर की लघुकथा "बोहनी" बहुत पुरानी रचना होते हुए भी, आज  भी प्रासंगिक है। - "उन्होंने कहा कि रचनाकारों को भाव विषय भाषा पर अवश्य ध्यान देना चाहिए - प्रकाशन के पहले। 

ध्रुव कुमार ने  संचालन क्रम में कहा कि नारी-उत्पीड़न से अब लघुकथाकारों को बाहर आना चाहिए। क्योंकि इस विशेषांक में अधिक लघुकथाएं इसी विषय पर लिखी गई है। 

मुख्य वक्ता डॉ. किशोर सिन्हा ने कहा कि लघुकथा को अभी लम्बा सफर तय करना है। और इसके लिए इस विधा से जुड़े रचनाकारों को उत्कृष्ट रचनाएं देने की आवश्यकता है। 
             
इस रपट के लेखक के मन में तत्काल एक सवाल कौंधा- "अब नाटककार किशोर सिन्हा को कौन बतलाए कि लघुकथा अब  कोई नई विधा नहीं रह गई है। और इस विधा में,प्रेमचंद, मंटो और फिर कमल चोपड़ा, सुकेश साहनी, सतीशराज पुष्करणा,, चित्रा मुद्गल से लेकर रामयतन यादव, मधुदीप, बलराम, पुष्पा जमुआर, अनिता राकेश तक सैंकड़ों ऐसे प्रतिनिधि लघुकथाकारों की ढेर सारी श्रेष्ठ लघुकथाएं मौजूद हैं। खेल, ठंडी रजाई, कफन, बोहनी, भविष्य का वर्तमान, सिर उठाते तिनके, भूख, पत्नी की इच्छा जैसी सैंकड़ों लघुकथाएं, लघुकथा के पाठकों के लिए जानी पहचानी है। 

अब किशोर सिन्हा प्रेमचंद की कफन को, चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी "उसने कहा था", विमल मित्र की साहब बीबी गुलाम, रेणु की तीसरी कसम आदि कहानी उपन्यास की चर्चा करते हुए कहते हैं कि इस तरह की कालजयी रचनाएं लघुकथा विधा में क्यों नहीं है? 

इसमें लघुकथा विधा या लघुकथाकारों का दोष कहां है? आप ईमानदारी से, निष्पक्षता पूर्वक चुनी हुई लघुकथाओं को पाठ्यक्रम में शामिल कीजिए, उन लघुकथाओं पर फिल्में और सीरियल बनाइए, फिर देखिए कि लघुकथा विधा मैं कहानियाँ की तरह कालजयी रचना है या नहीं.?

इन्हीं बातों को, संचालन के क्रम में ध्रुव कुमार ने भी कहा - "लघुकथा को पाठ्यक्रम में लाने का सद्प्रयास किया जा रहा है ताकि वह भी कहानी, उपन्यास, कविता की तरह अधिकांश लोगों तक पहुंच सके। किसी भी रचना को बेहतर बनाया जा सकता है और यह कई चरणों में पूरा होता है। 

इस रपट के लेखक का साथ देते हुए ध्रुव कुमार ने भी कहा कि - "लघुकथा कलश" के संपादक योगराज प्रभाकर ने "लघुकथा की रचना प्रक्रिया" पर, सचमुच अद्भुत महाविशेषांक निकाला है और इसके लिए, संपादक बधाई के पात्र हैं। लगभग 400 पृष्ठोंवाले इस महाविशेषांक में, हिन्दी के 126, नेपाली और पंजाबी के 8-8 लघुकथाकारों की, लगभग 400 प्रतिनिधि लघुकथाएं संग्रहीत है। यह ऐतिहासिक प्रयास है और लघुकथा के लिए अविस्मरणीय भी।"

खैर, कई लोगों ने इस बहस में किशोर सिन्हा के तर्क पर असहमति प्रकट की। और ध्रुव कुमार ने भी लघुकथा की शैक्षणिक उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की, जिस विषय पर इस रपट के लेखक ने भी एक लेख लिखा है और वह की पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ है। 

हां, मंचित एकमात्र लघुकथा लेखिका और समीक्षक  अनिता राकेश ने कहा कि - "लगातार लेखन से रचनाकारों की रचनाओं में निखार आया है। श्रेष्ठ लघुकथा लेखन के रचना प्रक्रिया में, अनुभव और जन्मजात प्रतिभा का सामंजस्य होता है। 

इस साहित्यिक संगोष्ठी के दूसरे सत्र में,इस महाविशेषांक में प्रकाशित पटना के लघुकथाकारों ने अपनी अपनी लघुकथाओं का पाठ किया जिसका आरंभ सिद्धेश्वर द्वारा लघुकथा के पाठ से हुआ और फिर वीरेंद्र भारद्वाज, विभा रानी श्रीवास्तव, पुष्पा जमुआर, जयप्रकाश, मृणाल, सतीशराज पुष्करणा, ध्रुव कुमार, अनिता रश्मि आलोक चोपड़ा आदि लघुकथाकारों ने लघुकथा का पाठ कर समारोह को यादगार बना दिया। समारोह में रवि श्रीवास्तव, मधुरेश नारायण, अभिलाषा दत्त, संगीता मधुप्रिया, प्रियंका, मीरा प्रकाश, ऋचा वर्मा, नुपूर नेहा, मो नसीम अख्तर, सुबोध कुमार सिन्हा, मीना कुमारी परिहार राजकांता राज, मीरा सिंहा आदि की सह भागीदारी महत्वपूर्ण रही। 
....

आलेख - सिद्धेश्वर
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
लेखक का ईमेल - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com












Sunday, 20 October 2019

डा. सुधा सिन्हा के प्रथम कविता संग्रह "गगरिया छलकत जाय " का लोकार्पण 18.10.2019 को पटना में सम्पन्न

स्वजन तेवर बदल कर बोलते हैं / सच्चाई भी संभल कर बोलते हैं

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"कविता पीड़ा हरती है। एक नई उर्जा प्रदान करती है।
एक शेर है कि - "बात बेसलीका हो भली/ बात कहने का सलीका चाहिए। "
-और यही सलीका सिखाती है कविता।

अभिव्यक्ति की आरंभिक विधा है कविता। किंतु कविता अपने फार्म में होना चाहिए। लालित्यपूर्ण ढंग से कही गई पंक्तियां कविता है। यदि उसमें लयात्मकता न हो। तो वह गीत नहीं। काफिया नहीं, छंद नहीं तो वह गजल क्यों? त्रुटियों से भरी रचनाएं हमारी छवि बिगाड़ देती है। बेहतर हो कि रचनाओं को संशोधन के बाद प्रकाशित करवाया जाए। सुधा सिंहा की यह काव्य पुस्तक स्वागत योग्य है किंतु प्रकाशन के पहले इन कविताओं का संशोधन होता, तो बात कुछ और होती।  कुछ ऐसी ही चर्चा चल पड़ी मंच पर बैठे अतिथि साहित्यकारों के द्वारा।

अतिथि रामउपदेश सिंह ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक में टिकाऊ और बड़ी कविता लिखने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।

मुख्य अतिथि जियालाल आर्य ने कहा कि इस पुस्तक में आत्मीय ढंग से लिखी हुई कविताएं हैं। नृपेन्द्रनाथ गुप्त ने कहा कि  डॉ सुधा की कविताओं में मोती की सुगंध है।  

अपने अध्यक्षीय उद्बबोधन के पश्चात अनिल सुलभ ने कहा कि - 
"कौन सा गम खा रहा तुझको सुलभ? 
वह राज कहो जो तुम्हारे दिल में है।"     

कवि गोष्ठी का आरंभ हुआ तो कवि घनश्याम ने कहा कि - 
"स्वजन तेवर बदल कर बोलते हैं।
सच्चाई भी संभल कर बोलते हैं।
इसे घनश्याम की खूबी समझिए। 
जहां पर जाते , जमकर बोलते हैं। "

दूसरी तरफ  डा मेहता नागेन्द्र सिंह ने कहा कि --
" दौलत नहीं मगर, शोहरत मेरे पास है
कुदरत का हूं सेवक, कुदरत मेरे पास है।

 सिद्धेश्वर ने की मुक्तक पेश किया -
"झूठ और कत्लेआम को, संघर्ष का नाम न दो 
सुना है, इस आजाद मुल्क में, इंसानियत कहीं लेट गई है!"

विजय गुंजन ने  गत्यात्मक  दो गीतों का सस्वर पाठ किया।

इसी तरह की सारगर्भित कविताओं से गूंजता रहा बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का सभागार। अवसर था- डॉ.सुधा सिन्हा की काव्य कृति "गगरिया छलकत जाए" के लोकार्पण का।

इस अवसर पर कवि घनश्याम/शंकर प्रसाद, श्रीकांत व्यास, मेहता नागेन्द्र सिंह, ओम प्रकाश. पांडेय ,श्याम जी सहाय,कल्याणी सिंस, कालिनी त्रिवेद, जनार्दन प्रसाद, पंचूराम, पुष्पा जमुआर,/पूनम श्रेय, अनुपमा, कुमारी मेनका, जय प्रकाश पुजारी, मीना कुमारी परिहार, मनोज गोवर्ध, इंदुमाधुरी, सिंधु कुमारी। पूरे समारोह का संचालन किया योगेन्द्र मिश्र ने। 

योगेन्द्र मिश्र और कार्यक्रम अध्यक्ष अनिल सुलभ आदि ने  कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को मनमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम दिनांक 18.10.2019 को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन, पटना के सभागार में आयोजित हुआ था।
...

प्रस्तुति - सिद्धेश्वर
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
लेखक का ईमले - sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejdindia@yahoo.com












 







Thursday, 17 October 2019

इस दिवाली / कवि - दिलीप कुमार के परिचय के साथ

इस दिवाली

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इस दिवाली
कुम्हारों की दशा पर तरस खा 
माटी के दीए मत जलाना

दूधिया रोशनी की चौंधियाहट
और पटाखों के शोरगुल के बीच
खोए हुए हो तुम
सघन अंधियारे और सन्नाटे में

हो सके तो
हौले से दिल के दरवाजे खोलना
कुछ दिखाई ना दे, फिर भी टटोलना

मिल जाए यदि वहां बचपन वाली नादानी
मिल जाए यदि वहां नानी की कहानी 
मिल जाए यदि गुलमोहर की वह लाली
मिल जाए यदि गांव वाली वह हरियाली

तो फिर पूछना खुद से
कृत्रिमता की चमक में तुम क्या खो आए हो
खुशियों की बगिया उजाड़, उदासी का कौन सा पौधा बो आए हो

कि कहां दफन हो गई है वह दुआर की रंगोली 
कहां खो गई है वह उन्मुक्त हंसी-ठिठोली

कुछ जवाब अगर दे सके वह दिन पुराना
तभी तुम कुम्हार के घर आना
माटी के दीए ले जाना
अपनेपन का तेल और प्यार की बाती डाल, उसे जलाना
उस जलते दिए की रोशनी में 
खुद को फिर से पाना।
...
कवि - दिलीप कुमार
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@yahoo.com
कवि का परिचय - श्री दिलीप कुमार एक बिहार के एक गम्भीर युवा कवि हैं जिनमें आम आदमी की कसक, जमीन की महक और परिवेशगत विसंगतियों के प्रति क्षोभ के दर्शन होते हैं. रेलवे विभाग के उच्च पर पर शोभायमान होते हुए भी लोक-संस्कृति के प्रति इनकी आस्था और सक्रियता देखते बनती है. इनका कविता संग्रह "अप और डाउन में फँसी ज़िंदगी" कार्यालय और वास्तविक ज़िंदगी के बीच के द्वंद्व को बखूबी दर्शाता है.