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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@gmail.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Wednesday, 24 May 2017

राकेश प्रियदर्शी का हिन्दी और मगही काव्य-पाठ दिनांक 20.5.2017 को पटना में सम्पन्न

पालतू कुत्ता पैर से नs पेट से दउड़s हे
आलेख - नरेन्द्र कुमार

      दिनांक 20.05.2017 शनिवार, शाम 5 बजे। पटना में सीजन का सबसे गर्म दिनतापमान 42.2℃ था। ऐसी गर्मियों में जब महा जनकवि बिना वातानुकूलित हॉल के किसी भी गोष्ठी का निमंत्रण स्वीकार नहीं करते, हमलोग खुले वातावरण में गाँधी मैदान की गाँधी मूर्ति के पास कवि राकेश प्रियदर्शी को सुनने के लिए उपस्थित थे। संजय कुमार कुंदन, भावना शेखर, राजकिशोर राजन, प्रत्यूष चन्द्र मिश्र, समीर परिमल, डॉ सुजीत वर्मा, रामनाथ शोधार्थी, हेमंत दास 'हिम', कुमार पंकजेश, शशांक, अमरनाथ झा एवं नरेन्द्र कुमार 'दूसरा शनिवार' की गोष्ठी में सम्मिलित हुए। भावना शेखर की उपस्थिति गोष्ठी की उपलब्धि रही। कवि राकेश प्रियदर्शी ने 'पिता का चश्मा', 'एक युग का अवसान', 'नदी', 'कागज बिनता बच्चा', 'इतिहास' (मगही एवं हिंदी), 'जहाँ प्रेम तड़प रहा है', 'लोमड़ी', 'पालतू कुत्ता' (मगही एवं हिंदी), 'मुक्तिपथ', 'मछली', 'घास और बकरी', 'साँप', 'हर्ष-विषाद' एवं 'असफ़लता' शीर्षक वाली कविताएं सुनाई।


       राकेश प्रियदर्शी को सुनना जीवन को सुनना था। कवि की सरलता एवं सहजता उनकी रचनाओं में पिरोई हुई थी, पर भाव एवं अर्थ में कई गूढ़ बातें उद्घाटित कर रही थीं। कविता-पाठ के उपरांत कुमार पंकजेश का कहना था कि कवि की रचनाएं सरल एवं सुगम हैं। इन्हें सुनने के लिए कोई माथा-पच्ची करने की जरूरत नहीं पड़ती। सुनने के उपरांत श्रोताओं के मन में अपना बिंब छोड़ जाती हैं। कविताओं में आम आदमी की तकलीफ है तथा कई कविताएं व्यंग्य शैली में लिखी गयी हैं जो सोचने पर मजबूर करती हैं। हिम दास 'हिम' का मानना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं लोकभाषा में मुखर होती हैं। पालतू कुत्ता शीर्षक वाली कविता व्यंग्यात्मक शैली में बहुत असरदार है। वे रचनाओं में मुहावरों का प्रयोग करते हैं तो कई मुहावरे गढ़ भी लेते हैं। रामनाथ शोधार्थी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सभी कविताएं अच्छी लगीं। शब्दों का चयन एवं संयोजन बेहतरीन है तथा कविताएं अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं।

        संजय कुमार कुंदन ने दूसरा शनिवार का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए कहा कि राकेश प्रियदर्शी जैसे लो-प्रोफाइल कवि को एकल-पाठ के लिए चुनना सार्थक रहा। कवि जितने सीधे एवं सरल हैं, कविताएं भी वैसी ही दिख रहीं हैं पर असीम गहराई लिए हुए है। बिंबों का अद्भुत प्रयोग उनकी कविताओं में है। समीर परिमल कविता-पाठ से सन्तुष्ट दिख रहे थे। उनका कहना था कि सहज-सुबोध कविताएं प्रभावित कर गयीं। प्रत्यूष चन्द्र मिश्र ने कहा कि इतना सहज-सरल कवि आज के साहित्यिक समाज में हाशिये पर क्यों है जबकि कवि का दो संग्रह आ चुका है। कविताएं प्रचलित फॉर्मेट में रची गयी हैं तथा लयात्मकता इनकी विशेषता है। भावना शेखर ने दूसरा शनिवार में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की तथा कविताओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि सरल-सुबोध कविताएं समय के माकूल हैं तथा समाज की समस्याओं को हौले-से छू जाती हैं। इन कविताओं में तपन है। सुजीत वर्मा ने "कविता जीवन की आलोचना होती है" उद्धृत करते हुए कहा कि राकेश जी की कविताएं सीधे मन में उतरती हैं।

         नरेन्द्र कुमार ने कहा कि कवि की रचनाओं में दो तरह के भाव आये हैं। एक तरफ वे समय एवं समाज की विद्रूपता को अपने व्यंग्यात्मक लहजे में पुष्ट करते हैं, वहीं प्रेम या अन्य संबंधों पर रची कविताएं उनकी सहज एवं घनीभूत संवेदना को पूर्णता में व्यक्त करती हैं। जहाँ तक आलोचकों का ध्यान न जाने का प्रश्न है तो आज अधिकांश रचनाकारों के अपने आलोचक हैं तो आलोचकों के अपने रचनाकार। इसमें सीधे-साधे एवं इन छद्मों से अलग रचनाकारों को हाशिये पर डाल ही दिया जाता है। आलोचकों को रचनाओं में चमत्कार दिखाना होता है। शशांक ने कहा बांग्ला एवं तमिल साहित्य में रचनाकर पाठकों से सीधे जुड़ते हैं क्योंकि वे स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं। आज की कविताएं सीधे श्रोताओं तक पहुंची हैं। राजकिशोर राजन का कहना था कि राकेश प्रियदर्शी की कविताएं सहजता की साधना है और इसी कारण साहित्यिक समाज में अलक्षित रह गयी हैं।

      चर्चा के उपरांत सभी रचनाकारों ने अपनी-अपनी रचनाएं सुनाईं। उसके बात चाय एवं बतकही का एक और दौर बिस्कोमान भवन के पास।

इस आलेख के लेखक: नरेन्द्र कुमार (narendrapatna@gmail.com)

लेखक के लिंक:












कवि- राकेश प्रियदर्शी (Poet- Rakesh Priyadarshi)
Writer of this article- Narendra Kumar (नरेन्द्र कुमार)












Tuesday, 23 May 2017

सामयिक परिवेश (त्रैमासिक) का मई 2017 अंक

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सामाजिक संदर्भ में साहित्यिक उजाला फैलाने का प्रयास

ममता मेहरोत्रा के प्रधान सम्पादकत्व में समीर परिमल द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका 'सामयिक परिवेश'  मई 2017 के इस नवीन अंक में गद्य और पद्य दोनो श्रेणी में अपनी स्तरीयता की कसौटी पर खरी उतरी है. विशेष रूप से कहानियाँ और कुछ चुने हुए शायरों की गज़लें तथा कसावट वाले नवगीत का चमत्कार दर्शनीय है. पाठक को आह्लाद और अपनी संंवेदनाओं से साक्षात्कार होना तय है.
                                     गद्य
      नीतू नवगीत ने चम्पारण आन्दोलन के शताब्दी वर्ष में 'चम्पारण का वह अकेला मर्द' शीर्षक  लेख में विस्तार से राजकुमार शुक्ल के उस अविस्मरणीय प्रयास के बारे में लिखा है जिसके फलस्वरूप गांधी जी चम्पारण आये और अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय आंदोलन को नई दिशा देकर महात्मा बने. भागवत शरण झा 'अनिमेष' की मिथिला चित्रकला पर शोधपरक लेख बारीकी से मधुबनी पेंटिंग के उद्भव को तो रेखांकित तो करता ही है उसकी अनोखी विशिष्टताओं को भी सरलता के साथ विश्लेषित करता है. 'हाय रे पानी' आलेख में तारकेश्वरी तरु 'सुधि' दैनिक जीवन में जल की अल्पव्ययता के उपायों को बता कर भविष्य की सबसे बड़ी समस्या को दूर करने का ईमानदार प्रयास करती दिखती हैं. भोजपुरी सिनेमा के उन्न्यन में रोड़ा बननेवाले कारणों की अंतर्वीक्षा करने का जोखिम भरा काम किया है विनोद अनुपम ने. यह डॉ. प्रदीप कुमार चित्रांशी की दार्शनिक विद्वता ही है कि उन्होंने अपने लेख में मंथरा को द्वैतवाद की पक्षधर साबित कर दिया है अपने जीव (भरत) और ब्रह्म (राम) की अनोखी व्याख्या से.

     
प्रधान सम्पादक और प्रकाशक- ममता मेहरोत्रा


    राजकुमार राजन ने त्रिलोचन की काव्य-धारा गहन साहित्यिक मीमांसा प्रस्तुत की है जिसका शीर्षक है- 'जीवन जिस धरती का कविता भी उसकी'. हिन्दी रंगमंच को शौकिया कार्यकलाप से निकल कर पेशेवर क्षेत्र में प्रवेश करना ही होगा - ऐसा कहना है रंगकर्मी अनीश अंकुर का ताकि 'रंगमंच का भविष्य' उज्ज्वल हो सके. डॉ. कासिम खुर्शीद की कहानी 'फाँस' एक अत्यन्त उच्च कोटि की कहानी है. कहानी की गुणवत्ता का कारण उसका कोई विशाल दार्शनिक सन्देश नहीं वरन आज के शहरी जीवन में रिश्तों की अहमियत को बिना किसी बनावटीपन के सामने लाना है. एक लड़की अपने अकेले पिता को विवाह के बाद अपने साथ रखना चाहती है ताकि उनकी ठीक तरह से देख-भाल हो सके. अपनी माँ की देखभाल को ही अपनी और अपनी भावी पत्नी की एक मात्र जिम्मेवारी समझनेवाला लड़का उधेरबुन में पड़ कर उस लड़की को अपनी पत्नी बनाने में चूक जाता है और जिन्दगी भर पछताता रहता है.

     शम्भू पी. सिंंह की कहानी 'इजाजत' आज के अपार्ट्मेंट संस्कृति में छीज रहे रिश्तों की तीखी पड़ताल करती है. एक व्यक्ति के मर जाने पर उसके परिवार वालों और पड़ोसियों को रोने की भी इजाजत नहीं ताकि दूसरों के भ्रमित आनन्द के जायके में बाधा न आये. सौरभ चतुर्वेदी की कहानी 'रुद्राभिषेक' भी इस अंक में है. दिनेश प्रसाद सिंह 'चित्रेश' अपनी कहानी 'श्मशान ज्ञान' में बड़ी कुशलता से मानव मनोविज्ञान के उस अफसोसजनक पहलू को दर्शाते हैं जहाँ मौत को करीब आया देख कोई आदमी निष्कपट और निर्मल हृदय  हो जाता है पर पुन: मृत्यु को दूर गया देख वह वही टुच्चापन पर उतर आता है जिसे वह घृणित समझने लगा था. असित कुमार मिश्र की कहानी 'सरहद' काफी मार्मिक ढंग से विधवा फुआ को अपनी घर की लड़की की विदाई के समय न देख पाने की सामाज की कोशिश के विरुद्ध विद्रोह का मानो आँखो देखा हाल कह रही हो. आँख में आँसू आ जाते हैं.
     
सम्पादक- समीर परिमल
  ममता मेहरोत्रा की कहानी 'जॉब' रेखांकित करती है उन महिलाओं की दशा को जो उम्र के आखरी पड़ाव में समाज को विभिन्न प्रकार से अपना योगदान करने हेतु सर्वथा सुयोग्या हैं परन्तु ऐसा करने से उन्हें रोकती है उनकी झिझक जो पुरातनकालीन सामाजिक प्रतिमन्धों से छुटकारा पाने ही नहीं देती. खुशी की बात है कि कहानी को सायास सुखान्त बनाया गया है ताकि सन्देश बिना किसी रुकावट के सीधे-सीधे पहुँचे. लघुकथा 'बिरादरी' में विनीता सुराना किरण ने एक कन्या को अपनी इच्छा से विवाह करने का एक भारी मुद्दा उठाया है मगर उसका निर्वाह कुछ और बेहतर ढंग से किया जा सकता था. जो हो, मूल सन्देश बहुत सटीक है. उपासना झा की तीन लघु प्रेम-कथाएँ हैं. डॉ.संध्या तिवारी की चार लघु-कथाएँ न सिर्फ जाति-प्रथा, लिंग-असमानता जैसी सामाजिक बुराइयों पर सफलतापूर्वक प्रहार करती हैं बल्कि परिवार के अंदर की विरूपताओं को भी खुल कर बयान करती हैं.

      राजेश कुमारी की कहानी 'शक' एक मजदूर वर्ग के पिता की कहानी है जिसे उच्च आय वर्ग वाले से अपनी बेटी की दोस्ती नागवार गुजरती है और वह उसकी हत्या कर बैठता है. बाद में जब उसे पता चलता है कि उसका शक गलत था तो वह आत्मग्लानि की आग में जल जाता है. 'सोने की बंदूक' शीर्षक से  लक्ष्मी शंकर बाजपेयी की लघु-कथा है. 'झंझावात' शीर्षक संस्मरण में ममता मेहरोत्रा अपने पिता की मुत्यु के समय का सजीव वर्णन किया है. प्रसिद्ध लोक-गायिका शारदा सिन्हा से निराला बिदेसिया का साक्षात्कार न सिर्फ कलाकार की कला-यात्रा को कमलबद्ध करता है बल्कि यह नए कलाकारों को जरूरी संदेश भी प्रदान करता है. प्रीति अज्ञात की दो व्यंग्य कथाएँ भी इस अंक में हैं और लक्षमण रामानुज लड़ीवाला की लघु-कथा  'आधार' भी.

   तीन बेहद उम्दा पुस्तक समीक्षाएँ भी हैं. राजकिशोर राजन की कविताओं की पुस्तक 'कुशीनारा से गुजरते हुए'की समीक्षा में स्वपनिल श्रीवास्तव बताते हैं कि किस तरह से कवि ने बुद्ध के जीवन को केंद्र में रख कर कविताएँ लिखने का जोखिम उठाया है. राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध कवि और काव्य-समीक्षक शहंशाह आलम ने प्रभात सरसिज के कविता-संग्रह 'लोकराग' की समीक्षा करते हुए कहा है कि प्रभात सरसिज भाषा के खंडहर को नहीं रचते बल्कि भाषा की चमचम नदी बहाते हैं. हेमंन्त दास 'हिम' के कविता-संग्रह 'तुम आओ चहकते हुए' की समीक्षा करते हुए राष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि 'हिम' के संग्रह में अकेलेपन की त्रासदी से जुड़ी कई ऐसी रचनाएँ हैं जो अंतर्मन को गहरे आन्दोलित करती है.

                                                      पद्य
      पत्रिका के इस अंक में गज़लों और गीतों की प्रचूरता है. साथ ही मुक्त-छन्द कविताएँ भी हैं. कुछ गज़लें और गीत तो जीवन की सच्चाइयों से रू-ब-रू कराती हुई अपने स्पष्ट सन्देशों को पूर्ण लालित्य के साथ सम्प्रेषित करने में पूरी तरह से सफल रहीं हैं जिनमें लक्ष्मी शंकर बाजपेयी, अनिरुद्ध सिन्हा ( विशेष रूप से दूसरी और तीसरी गज़ल), प्रज्ञा विकास, ,ममता लड़ीवाल, अंकुर शुक्ल नाचीज, संजय कुमार 'कुंदन, अरबिन्द श्रीवास्तव, अस्तित्व अंकुर, रामनाथ शोधर्थी, डॉ. महेश मनमीत, दिनकर पाण्डेय 'दिनकर. अवनीश त्रिपाठी के तीन और वीणा चंदन के चार नवगीत भी बड़े मोहक हैं. 

      साथ ही अन्य गज़लें/ गीत/ कविताएँ  भी हैं जिनमें कुछ-न-कुछ मुद्दे उभर कर आगे आते हैं. इस श्रेणी में शामिल कवियों में कांन्ति शुक्ला, कुमारी स्मृति उर्फ कुमकुम, मेरी एडलीन, सरोज तिवारी, शुभ्रा शर्मा, डॉ. सरिता शर्मा, डॉ. मीरा मिश्रा, बनज कुमार बनज, , रंजित तिवारी मुन्ना, राहुल वर्मा 'अश्क, हमजा रज़ा खान, ईशिता परिमल, प्रीति सेन, धीरज श्रीवास्तव, मुकेश कुमार सिन्हा, मंजू सिन्हा और प्रियंका वर्मा.

      पत्रिका के प्रारम्भ में सम्पादकीय लेख भी काफी सधा हुआ है. पत्रिका के अंत में कुछ साहित्यिक गतिविधियों की संक्षिप्त रिपोर्ट भी है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है पत्रिका का यह अंक न सिर्फ प्रधान सम्पादक और प्रकाशक ममता मेहरोत्रा के लिए बल्कि सम्पादक समीर परिमल के लिए भी स्मरणीय उपलब्धि है. यह अंक निस्संदेह सुधी पाठकों की सामाजिक प्रतिबद्धता को और अधिक सशक्त करते हुए उनके साहित्यिक अनुरंजन का गुरुतर कर्तव्य का निर्वाह करता प्रतीत होता है.

Monday, 22 May 2017

भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना द्वारा 21.5.2017 को कवि-गोष्ठी का आयोजित



    “रौशनियों से घर-बाहर रौशन चिराग है”

 भारतीय युवा साहित्यकार परिषद, पटना के तत्वावधान में दिनांक 21.5.2017 को राजेंद्रनगर टर्मिनल, बिहार रेलवे स्टेशन के रामवृक्ष बेनीपुरी हिन्दी पुस्तकालय में एक कवि-गोष्ठी आयोजित हुई जिसमें अनेक गणमान्य कवियों ने भाग लिया. भाग लेनेवाले कवियों में भगवती प्रसाद द्विवेदी, सिद्धेश्वर प्रसाद, शरद रंजन शरद, श्रीकान्त ब्यास, हेमन्त 'हिम' तथा कवयित्री लता प्राशर प्रमुख थीं.


        "मुक्त फलक' मासिक पत्रिका के सम्पादक श्रीकान्त ब्यास ने अपनी कुछ गज़लें पढीं जिनके कुछ शेर थे-
"प्रीत पा पाथर भी मोम-सा गलने लगे
इंद्रधनुष देख मुर्दे भी मचलने लगे
दुनिया में अजीब दिवानगी तो देखिये
दिलवर की खातिर अब खंजर चलने लगे"

       सिद्धेश्वर प्रसाद राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष पत्रिकाओं में अपने कलाचित्रों के माध्यम से दशकों से छाये हुए हैं. 'अवसर प्रकाशन' के माध्यम से सक्रिय रहते हुए ये अच्छे कवि भी हैं. इनकी कविताओं की कुछ चुनिदा पंक्तियाँ निम्न हैं-
"रत्ती भर भी
नहीं हो पाता कम
पाप का दंश
आखिरी साँस तक" तक"(1)

पकड़ो, पकड़ो 
भागी कविता!
कलम की नोक से
कोई 
हथिया न ले उसको" (2)

        सभा में उपस्थित एक मात्र कवयित्री लता प्राशर ने भी देश और समाज पर अपनी कविताओं का पाठ किया. एक कविता 'राजनीति का व्याकरण' के अंश निम्नवत थे-
"संज्ञा संग करें नेताजी
देते सब को ज्ञान
कहीं जाति की बात करें तो
कहीं व्यक्ति प्रधान"
        कवयित्री ने एक व्यंगात्मक कविता पढ़ी जिस में मुहावरों का प्रयोग करते हुए करारे व्यंग्य किये गए थे. कुछ को देखिये-
"नाच न जाने आँगन टेढ़ा
देश-विदेश में मेरा बसेरा
अपना हाथ जगन्नाथ
बाकी दुनिया रहे अनाथ"

      कवि हेमन्त 'हिम' ने संवेदना के रंग को और गहराते हुए एक गज़ल पढ़ी जिसकी एक झलक प्रस्तुत है-
"पत्थर बन के देख लो मैं हूँ कितने चैन से
तुम भी अपनी भावनाएँ यूँ ही थमीं रहने दो
उड़ने से अब डर मुझे है, रख लो मेरा आसमाँ
खड़े रहने के लिए बस थोड़ी जमीं रहने दो"
     फिर श्रोताओं की फरमाईश पर 'हिम' ने एक मुक्तछन्द कविता भी पढ़ी जिसका शीर्षक था 'अन्तरिम'. इसकी अन्तिम पंक्तियों में आम जन के आधुनिक जीवन-दर्शन को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा-
"सच!
क्या तुम्हें नहीं लगता 
कि
पूरी की पूरी जिन्दगी ही 
एक अन्तरिम व्यवस्था है?"

       प्रसिद्ध गज़लगो और कवि शरद रंजन शरद ने अपनी कुछ प्रभावकारी गज़लें सुनाईं जिनकी बानगी देखिये-
"वक्त उनको और भी ऊँचा उठा
मुझको है अपनी जगह से देखना
एक बच्चे की तरह से देखना 
ज़िन्दगी को इस वजह से देखना"
       आगे चल कर शरद रंजन ने मुक्तछन्द कविताएँ सुनाईं जिन में से एक थी 'खबर खेल'. उसकी अन्तिम पंक्तियाँ थीं-
"जैसे पूछ रहा मुझसे 
इतने बरस अभ्यास के बाद
क्या खेल सकते 
इस तरह खबर से?"

      भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अध्यक्षीय जिम्मेवारी का निर्वाह करते हुए सभी कवियों द्वारा किये गए कविता-पाठ पर अपनी संक्षिप्त टिपण्णी की और अंत में अपनी कविताएँ पढीं. उच्च और निम्न आर्थिक वर्गों के बीच की खाई को उजागर करनेवाली एक कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं-
"नभ को छूती ऊंचाई के 
स्वामी आप रहे हैं
देश और दुनिया से बड़े 
सुनामी आप रहे हैं
अंधियारी में रोशनियों के
मोती बोते जन हैं
हम तो छोटे जन हैं."
         श्री द्विवेदी की एक और प्रभावकारी कविता का टुकड़ा कुछ यूँ था-
"दियासलाई 
की एक तीली
आग-आग है
रौशनियों से
घर-बाहर 
रौशन चिराग है"

      इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार और कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने की. सिद्धेश्वर प्रसाद द्वारा संचालित इस सभा के समापन पर धन्यवाद ज्ञापन हेमन्त 'हिम' ने किया.
अपने सुझाव ई-मेल से भेजें: hemantdas_2001@yahoo.com









'नदी का पानी' नामक पटना में मंचित नाटक के कुछ छायाचित्र (Some pics related to'Water of River'- a play staged in Patna)

The effort of Boogey Woogey Academy should be encouraged. The play was directed by Niraj Kumar and the writer of the play is Chaturbhuj, the maestro of Historical plays. Venue was Kalidas Rangalaya, Patna and date of presentation was 18.5.2017. 
The king wants to snatch the right of common public on the water of the river. The queen is against this idea. A fight ensues. The dialogue of a commander touched the hearts of everyone when he requests the soldier from his enemy to kill him. That soldier has a great respect for this commander from opposite side though he discharges his duty by striking and killing the enemy's commander though very unwillingly. 
......................................
बूगी वूगी अकादमी के प्रयास को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह नाटक नीरज कुमार द्वारा निर्देशित था और इसके लेखक चतुरभुज हैं, जो ऐतिहासिक नाटकों के लिए प्रसिद्ध हैं। प्रस्तुति का स्थान था कालीदास रंगलाय, पटना और तारीख थी18.5.2017।
राजा नदी के पानी पर आम जनता के अधिकार को छीनना चाहता है। रानी इस विचार के खिलाफ है। दो सेनाओं में इस वास्ते एक लड़ाई छिड़ जाती है एक पक्ष के सेनापति के उस संवाद ने हर किसी के दिलों को छुआ, जब वह शत्रु के एक सैनिक से स्वयं को मारने के लिए अनुरोध करता है। उस सिपाही के मन में यद्यपि विपरीत पक्ष से इस सेनापति के प्रति बहुत सम्मान का भाव है, फिर भी वह दुश्मन के कमांडर को  मारने के द्वारा अपने कर्तव्य निर्वहन करता है हालांकि बहुत अनिच्छा से।

 
















Sunday, 21 May 2017

'भउजी' और अन्य बज्जिका कविताएँ- भागवत 'अनिमेष' (भाग-2) [Bajjika Poems of Bhagwat 'Animesh' with poetic English translation (part-2)]

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Poem-1
  भउजी ..! 
(Wife of elder brother)

भउजी के रंग
झकाझक
गोर
भउजी के दाल
गमकइत ...
पनटिटोर ..!
The complexion of my 'Bhauji' 
(Bhauji = brother's wife)
Milky white
Savory and watery pulses
Cooked by Bhauji spright


भउजी के साड़ी
अजनास 
साड़ी के
फाटल कोर
The saree of Bhauji
(Saree = traditional attire of women)
Is a peculiar one
The sides of which are
badly torn.


भउजी
नल से दूर दमयन्ती
पूस के भोर
भउजी के आँख
मखान पोखर में हल्का हिलकोर
Bhauji
A Damyanti, separated from Nal
(Nal is a mythical king and Damyanti her beloved)
Is a mournful morning
The eyes of Bhauji
Is like in a pond of makhan
('makhan' is a kind of fruit that grow in water)
Slightly rippling

भउजी के आँख
भादो के भरल-पूरल बादल
भउजी के आँख में लोर
ऊ लोर
जेक्कर न कोई ओर
न कोई छोर।
The eyes of Bhauji
Is like a cloud in rainy season
With tears in her eyes
The mass of tears 
Has no end so far
And can still rise.

कवि - भागवतशरण झा 'अनिमेष(Poet- Bhagwat Sharan Jha 'Animesh')
Poetic English Translation by Hemant Das 'Him'
...........................

Poem-2
 कदलीबन में (बज्जिका काविता)
In the banana orchard (Bajjika Poem)
कदलीबन में बिलमs बलमजी
बिलमs कदलीबन में
Stay in banana orchard, sweetheart
Stay in banana orchard

बीजू बन में बहुत बिलमलs
छाँकी जइसन तनलs लमलs
लम्मs केरा-घउर-फरल बन
भगजोगनी के मन में
बिलमs कदलीबन में
You stayed long in the bamboo garden
  You bowed like twigs and did straighten 
Now please bow down as a bunch of banana
In eyes of firefly, canard
Stay in the banana orchard

हाड़ तोड़ कs मेहनत कइली
मेहनत के सुख पिया न पइली
महाअधम तिरिया के जीबन
लुचबा लटकल तन में
बिलमs कदलीबन में
Excess hard labour I did
Still no money to live, candid
The female's life - too miserable
Keep safe from scoundrels is hard
Stay in banana orchard


खाली खखरी खनके जिनगी
बूझ रहल जिनगी के चिनगी
करजा में बूरल है परजा
लगल आग तन-मन में
बिलमs कदलीबन में
Life is ringing like a hollow grain
Life is ending, fading it's flame
The subject are devastated by loans
The body and mind are charred
Stay in banana orchard

कदलीबन के भाग जगा दs
नयका निम्मन राग जगा दs
इहाँ बिराजs बासुदेब बन
निम्मन नयकापन में
बिलमs कदलीबन में
Please wake up the banana garden's fate
Please wake up the novel melody great
Sit here like God Vasudeva
Remain afresh, off-guard
Stay in the banana orchard

कदलीबन में बिलमs बलमजी
बिलमs कदलीबन में।।
Stay in banana orchard, sweetheart
Stay in banana orchard.

कवि - भागवतशरण झा 'अनिमेष(Poet- Bhagwat Sharan Jha 'Animesh')
Poetic English Translation by Hemant Das 'Him'



Bhagwat Sharan Jha 'Animesh'
भागवतशरण झा'अनिमेष' बिहार की साहित्यिक विभूति हैं. इन्हें मुक्तछन्द के साथ-साथ छन्दबद्ध कविता में भी सिद्धस्तता प्राप्त है. इनके दो संयुक्त कविता-संग्रह के अलावे एक एकल काव्य-संग्रह 'आशंका से उबरते हुए'  भी प्रकाशित हुआ है जिसकी शहंशाह आलम सरीखे राष्ट्रीय कवि-आलोचकों ने प्रखर समसामयिक तेवर हेतु भूरि-भूरि प्रशंसा की है. वर्तमान में आयकर अधिकारी (अंतर्राष्ट्रीय कराधान, बिहार) के पद पर कार्यरत हैं. इनका मोबाइल नं. है 91-8986911256 तथा ई-मेल आइ.डी.है. bhagwatsharanjha@gmail.com
Bhagwat Sharan Jha 'Animeesh' is renowned literary figure of Bihar. He has eual authority over the .rhyme as well as free-style verses. Apart from the two joint poetry collections, a single poetry collection has been published, 'Recovering from fear'(in Hindi) , which has been praised by national poet-critics like Shaheshshah Alam for an intense contemporary inclination. Currently he is working as an Income Tax Officer (International Taxation, Bihar) Their mobile number Is 91-8986911256 and e-mail ID  is bhagwatsharanjha@gmail.com

Sunday, 14 May 2017

'त्रिलोकीनाथ जिन्दाबाद' नाटक की प्रस्तुति इमेज आर्ट सोसाइटी द्वारा 13.5.2017 को पटना में सम्पन्न

निम्न मध्यमवर्ग का आंतरिक संघर्ष
(Read English version of this article at http://biharidhamaka.blogspot.in/2017/05/trilokinath-zindabad-stage-play.html)

   शहरी असहाय वर्ग का वास्तव में एक क्लर्क त्रिलोकिनाथ द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया है, जिसे पिछले चौदह वर्ष से कोई पदोन्नति नहीं मिली है। वह अपने कार्यालय में सबसे वरिष्ठ क्लर्क हैं और उनकी आकांक्षाओं में कुछ असामान्य नहीं है। लेकिन बात यह है कि वह निम्न मध्यम वर्ग से हैं, जिसके पास किसी प्रकार के अधिकार नहीं होते न ही उसे किसी भी अच्छे अनुभव का सपना देखना चाहिए। असली दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि उनके सबसे बड़े दुश्मन उच्च आर्थिक स्तर पर बैठे व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि उनके स्वयं के सहकर्मीगण हैं जिन्हें कि स्वयं इसी तरह के दुर्भाग्य का  सामना करना पड़ रहा है। पर इस नाटकीय रूप से प्रसिद्ध राष्ट्रीय लेखक भीष्म साहनी द्वारा लिखे गए कहानी 'सिफारसी चिट्ठी' को मंच पर प्रदर्शित करने में कामयाब रहे निर्देशक शुभ्रो भट्टाचर्य की इस प्रस्तुति में इसी विरोधाभास का प्रदर्शन किया गया, जो ज्यादातर नये कलाकरों के समूह के साथ किया गया। एक शानदार यथार्थवादी तरीके से नाटकीय रूप में इसे मंच पर चित्रण करने में प्रसिद्ध निर्देशक शुभ्रो भट्टाचार्य ने अपनी कुशलता दिखायी.

कथा: त्रिलोकीनाथ चौदह वर्षों से बिना किसी पदोन्नति के काम कर रहे एक ईमानदार और समय पर कार्यालय जानेवाले क्लर्क है। उनकी पदोन्नति की आकांक्षा में कुछ भी असामान्य नहीं है फिर भी उन्हें इस कारण खुद अपने ही सहकर्मियों के द्वारा मजाक का पात्र बनना पड़ता है। आगे यह पता चलता है कि वह बीएचयू में अपनी कक्षा का सबसे होनहार छात्र थे जब महाविद्यालय में निर्देशक और अपने मित्र से मिलते आते हैं। दोनों दोस्त हैं। प्रोफेसर, त्रिलोकिनथ को सार्वजनिक रूप से पढ़ाई करते समय उनके तत्कालीन प्रोफेसर (अब शिक्षा विभाग के एक सेवानिवृत्त प्रमुख) उनके कार्यालय में जाकर उनके पीठ ठोकते हैं और उनकी स्तुति में कोई शब्द नहीं छोडते हैं। त्रिलोकीनाथ के सभी सहयोगियों और यहां तक ​​कि मालिक भी आश्चर्यचकित होते हैं इतना ही नहीं, वो, त्रिलोकीनाथ की पदोन्नति की सिफा रिश करने वाले त्रिलोकीनाथ के पक्ष में अधिकारियों को एक पत्र लिखने की पेशकश करते हैं। त्रिलोकीनाथ खुद को अत्यंत खुश  महसूस करता है।

     त्रिलोकीनाथ जब घर लौटते हैं तो वह अपने पदोन्नति के लिए अपने पूर्व शिक्षक से अपेक्षित अनुशंसा की अच्छी खबर बताते हैं। प्रारंभ में उनकी पत्नी को इस दफ्तरी बातों में रुचि नहीं है। हालांकि उन्हें अचानक यह खबर बहुत दिलचस्प लगता है जब उन्हें लगता है कि पदोन्नति के कारण अवैध आय का बहुत बड़ा फायदा हो सकता है वह अपने पति पर अपने सभी प्यार और स्नेह को बरसाने लगती है ताकि वे भविष्य में बड़े पैमाने पर अवैध आय लाए। लेकिन जब त्रिलोकिनाथ घोषणा करते हैं कि वह किसी भी रिश्वत को स्वीकार नहीं करेंगे तो वह फिर से मोहभंग कर बैठती है। त्रिलोकिनथ नींद की कोशिश करता है यद्यपि बेकार में। वह बेचैन सोच रहा है कि यदि उनके पूर्व प्रोफेसर ने उनके पक्ष में एक पत्र लिखा है तो उनके काम-अधीक्षक उसे पसंद नहीं करेंगे और अपनी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी दे देंगे, जो अब तक एक निर्दोष कैरियर में निशान लगा देगा। अगर उनके पूर्व प्रोफेसर ने उनके लिए इस तरह के अनुकूल पत्र लिखते हैं, तो उनके स्वयं के सहयोगियों ने उन्हें अपने समूह से बाहर कर दिया और उन्हें उपहास का एक पात्र बना देंगे। 

     त्रिलोकीनाथ ये सोचने में असमर्थ हैं कि ये परेशान हो रहे हैं। उनकी पत्नी को सांत्वना देने की कोशिश होती है लेकिन त्रिलोकीनाथ आंतरिक रूप से इतने परेशान हैं कि उसे बुरी तरह से झिड़क देते हैं। बिना नींद की रात के बादत्रिलोकीनाथ को इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सिफारिश के पत्र उसके लिए एक वरदान की अपेक्षा अभिशाप साबित होगा। वह अपने पूर्व प्रोफेसर के दरवाजे पर जाते हैं और अनुरोध करते हैं कि उनके लिए कोई सिफारिश पत्र नहीं लिखा जाय। जब वह अपने कार्यालय में पहुंचते है तो उनके सहयोगियों को  सब मालूम हो जाता है  हैं और त्रिलोकीनाथ से पुराने रुखरे अंदाज में मानते हैंत्रिलोकीनाथ को लगता है कि उसके लिए यह सुखदायक है।

समीक्षा: यह निश्चित रूप से एक निर्देशक का नाटक था जिसमें अधिकांश अभिनेताओं ने उन्हें सिखाये सबक का पालन किया। शुभ्रो भट्टाचार्य एक निपुण निदेशक हैं जो अभिनव कौशल से भरे हैं। जिस तरह उन्होंने अपने हाथों में दीपक या अन्य वस्तुओं के साथ मंच के पीछे के कलाकारों की एक टीम का इस्तेमाल किया और पृष्ठभूमि में खेला गया धुन के साथ अपने लय में लहराते हुए त्रिलोकीनाथ के आंतरिक दुविधा को दिखाया वह बेजोड़ था। त्रिलोकिनाथ जब सपना देख रहे होते हैं तो उसे जीवंत रूप में एक समूह के खेल के अनुक्रम से दिखाया गया था जिसमें त्रिलोकिनाथ एक ऐसी फाइल का पीछा कर रहा है जो सभी कर्मचारियों के हाथों से चल रहा है जिसमें सभी शानदार कौशल का उपयोग कर रहे हैं।

    इसके अलावा, एक कलाबाज अभिनेता ने सभी दर्शकों के दिलों को अपने अनोखे शारीरिक करतबों के  प्रदर्शन के साथ चुरा लिया, जो वास्तव में नाटक के चरम-विन्दु  पर त्रिलोकीनाथ की भावनाओं की अंत:क्रिया को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह सफल रहा। बेशकरानू बाबू (त्रिलोकीनाथ ), अमित कुमार (कार्यालय निदेशक), आलोक अरव (कार्यालय अधीक्षक) और हरेंद्र सिंह (पूर्व प्रोफेसर) जैसे कुछ अभिनेताओं ने सफलतापूर्वक अपनी जगह बनाई। इसके अलावा, शांडिल्य मनीष तिवारी को 'चनावाला', निशांत प्रियदर्शी, विजय कुमार, संदीप तिवारी, अनोज कुमार, अविनाश कुमार (सभी कार्यालय कर्मचारी के रूप में) ने निर्देशक की मांग के मुताबिक अच्छा काम किया। और अंत में नाटक की मुख्य अभिनेत्री के बारे में कहना लाज़मी होगा कि कुंती सिंह ने अपना सर्वश्रेष्ठ काम किया और रानू बाबू जैसे अन्य मंझे हुए अभिनेताओं को अपना बहुमूल्य सहयोग दिया।

    यह नाटक इमेज आर्ट सोसायटी द्वारा प्रस्तुत किया गया था जिसमें राजीव रोय की प्रका-व्यवस्था, सुधांशु शेखर की च्वनि-व्यवस्था और जीतू के रूप सज्जा नाटक की आवश्यकताओं के अनुसार पूरी तरह से उपयुक्त थे।

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