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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@gmail.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.
# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]
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Sunday, 23 February 2020
स्टे. रा.भा.का.स. पूर्व मध्य रेल और भा.यु.सा.प. द्वारा पटना में एकल काव्य पाठ और कवि गोष्ठी 22.2.2020 को सम्पन्न
Monday, 17 February 2020
'कलमगार' द्वारा "ओ री चिड़ैया' शीर्षक के अंतर्गत पर्यावरण विषयक कवि-गोष्ठी का आयोजन 16.2.2020 को पटना में सम्पन्न
हम अक्सर उन्हीं चीजों को भूल जाते हैं जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होती हैं - जैसे जीवन सँवारने में माँ, कॅरियर निर्माण में शिक्षक और जीवन के बचे रहने हेतु पर्यावरण।
लाखों रुपयों के ऑक्सीजन के सिलिंडर खरीदकर हम रख लें तो भी वो उसकी क्षतिपूर्ति नहीं कर पाएगा जो बाहर की स्वच्छ हवा के प्रदूषित होने से होती है। हमारी पारिस्थितिकी का एक-एक जंतु और पौधा एक-दूसरे से किसी-न-किसी कड़ी के तहत जुड़ा है और अगर हम किसी प्रजाति को विलुप्त कर देते हैं जैसा कि बिहार की राजकीय पक्षी गौरैया के साथ लगभग हो रहा है, तो किसी न किसी तरह से पूरे जीवन-शृंखला को ही तोड़ने जा रहे हैं। कविगण तो हमेशा से प्रकृति से बेपनाह प्यार करनेवाले रहे हैं। इसलिए पर्यावरण और गौरैया पर जागृति लाने हेतु एक कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया पटना में।
संस्कारशाला पुस्तकालय के सभागार में, 'कलमगार' द्वारा आयोजित जल, हवा, पानी और गौरेया को बचाओ योजना के तहत आयोजित, कार्यशाला एवं कवि गोष्ठी का सारस्वत आयोजन किया गया।
सुलगती धूप में पनाह पाई थी
हर ओर जले थे प्रेम के दीये
अंधेरी रात की तक़दीर जगमगाई थी।
"कौन लिख रहा /पत्ते -पत्ते पर
काले धुएं का गीत ?
आकाश के सुंदर चेहरे पर
कौन कालिख पोत रहा ?
*धरती पर कौन
प्रदूषण का बीज बो रहा
शोर में कौन बदल रहा
धरती का मधुर संगीत
*अपराधी है कौन?
हम सब हैं / जो धरती को बांट रहे
जीव-जंतु, पेड़, पहाड़ तक उनको काट रहे
मातमी चुम्बन लेकर कौन कर रहा
विनाश से प्रीत?
बैंक अधिकारी होते हुए हुए भी साहित्य की अनवरत साधना कर मिसाल कायम करनेवाले युवा कवि संजय कुमार, प्रकृति को दिल की गहराइयों से प्यार करते हैं और उसे बचाने की उनकी आकांक्षा आज वेदना के रूप में उभर रही है -
किसे याद रहता है
पहाड़ नदियां पेड़ और पौधे
जो कभी कोई सुध ले
कि हमारी वेदना है क्या
जल जीवन और हरियाली
तुम्हारी चेतना के निकट
कभी जा पाती है क्या
"कैसे करूं मैं वर्णन
तू है मेरा पर्यावरण के साथ
मणिकान्त कौशल लुप्तप्राय प्यारी सी नहीं गौरैया पंक्षी को बेचैनी से साथ खोजते दिखे -
"जाने कहां वो चली गई /जाने क्या- क्या खाती है ,/
वो प्यारी- प्यारी गौरैया / नजर नहीं अब आती है !/
अमृतेश मिश्रा द्वारा ने पानी का अपव्यय करनेवाले नए धनाढ्यों को एक झटका दिया गया-
"ओ ! पम्प मोटर वालों ,/अरे पानी बचा लो /
भावप्रवण युवाकवि केशव कौशिक की गीत
बादलों में तैरते गाँव घर
कहो सुखन कभी देखा है
*वहाँ गगन को छूते पहाड़
उनसे गुजरते पक्के रास्ते
देख यह मन हर्षित होता
स्कूल जाते बच्चे विहँसते
ऊँचे पहाड़ों से गिरता निर्झर
कहो सुखन.....
*छोटे - छोटे उनके पक्के घर
जिनमें रहते हैं लोग प्यारे
मेघ अंजलि भर पानी देता
प्रकृति के वे अति दुलारे
दहकते आग जैसा दिनकर
कहो सुखन.....
*कल-कल स्वर से बहती नदियाँ
घर - घर पानी का नलका रहता
बचपन के पूरे होते सपने
मेघ पकड़-पकड़ जेब में रखता
घन - घटा का ऊन -सा मंजर
कहो सुखन.....
कवयित्री रश्मि गुप्ता की नजरों में प्रकृति के नयनाभिराम दृश्यों का नहीं दिखना सबसे बड़ी वंचना है -
बहुत दिनों से
नही देखी थी उसने हरियाली
फूल, चिड़िया, झरना
सुबह की लाली या शाम की सुहानी बेला।
इस प्रकार पर्यावरण को समर्पित कवि=गोष्ठी में उत्साहपूर्वक भाग लेकर एक जन-जागृति लाने का जोरदार प्रयास सम्पन्न हुआ।
रपट का आलेख - सिद्धेश्वर
छायाचित्र - सिद्धेश्वर
प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'
रपट के लेखक का ईमेल- sidheshwarpoet.art@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com
नोट - जिन प्रतिभागियों की पंक्तियाँ इसमें शामिल नहीं हो पाईं हों वो उन्हें ऊपर दिये गए सम्पादक के ईमेल पर भेज सकते हैं.
Sunday, 9 February 2020
बाबा बैद्यनाथ झा की पर्यावरण संरक्षण पर कुण्डलियाँ और ग़ज़ल
3. पर्यावरण - ग़ज़ल
इन्सान दानवों सा जंगल उजाड़ता है
अन्याय देख रोकर पर्वत पुकारता है
बन गिद्ध नोचता है हर अंग को कसाई
विस्फोट कर जड़ों से सबको उखाड़ता है
विध्वंस हो रहा है वनसम्पदा विलोपित
मगरूर हँस रहा है शेखी बघारता है
नदियाँ भी सूखती हैं वन, शैल सब नदारत
इन्सान ज़िन्दगी को खुद ही बिगाड़ता है
नदियों में स्वच्छ जल हो, वन, शैल सब हरे हों
उनको उजाड़ मानव जीवन बिगाड़ता है
है पुण्यभूमि भारत उत्तर खड़ा हिमालय
जिसके चरण युगल को सागर पखारता है
है लुप्त प्राणदायक विषयुक्त ही हवा है
अब भी न चेत मानव ग़लती सुधारता है
जो पेड़ है लगाता, पर्वत रखे बचाकर
समझो वही जगत का जीवन सँवारता है
......
कवि का पता - हनुमान नगर,श्री नगर हाता, पूर्णियाँ (बिहार) 854301
कवि का मोबाईल नम्बर- 7543874127 (वाट्सअप)
प्रतिक्रिया हेतु इस ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@gmail.com
पत्नी--- डॉ.हीरा प्रियदर्शिनी (बी ए एम एस, ए एम)
जन्म तिथि- 3 अगस्त,1955
जन्म स्थान- कचहरी बलुआ,भाया- बनैली,जिला- पूर्णियाँ (बिहार) 854201
शिक्षा--एम ए (द्वय) - हिन्दी (स्वर्ण पदक प्राप्त) + दर्शन शास्त्र,CAIIB, होमियोपैथ
प्रकाशित पुस्तकें-
"बाबा की कुण्डलियाँ" (270 कुण्डलियों का संकलन)
"जाने-अनजाने न देख ( 104 ग़ज़लों का संग्रह),
"निशानी है अभी बाकी" (105 ग़ज़्लों का संग्रह)-2019
"पढ़ें प्रतिदिन कुण्डलियाँ" (300 कुण्डलियों का संग्रह)2019
"ईमान यहाँ बिकता" (100 ग़ज़लों का संग्रह)--2019
'पहरा इमानपर' (मैथिली गजल संग्रह), '-1989 कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन
हिन्दी एवं मैथिली साहित्य की प्रायः हर विधा में लेखन
सम्पादन-"मिथिला सौरभ", "त्रिवेणी", "भारती मंडन" आदि
आकाशवाणी पटना,दरभंगा एवं पूर्णियाँ से पचासाधिक बार- काव्यपाठ एवं रेडियो नाटकों में अभिनय
दर्जनों साहित्यिक सम्मान से विभूषित.
अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा आयोजित कवि-सम्मेलनों/मुशायरों में अध्यक्षता तथा काव्यपाठ।
Saturday, 8 February 2020
भा. युवा साहित्यकार परिषद और स्टे.रा..भा. क्रि. समिति, राजेंद्रनगर टर्मिनस की साहित्यिक गोष्ठी 5.2.2020 को पटना में सम्पन्न

इस अवसर पर सुप्रसिद्ध चित्रकार-कथाकार एवं कवि सिद्धेश्वर की काव्य पुस्तिका "काव्य कलश" का लोकार्पण भी किया गया. कवि गोष्ठी का संचालन श्री सिद्धेश्वर और धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ गीतकार मधुरेश नारायण ने किया..
कविता की विविध रंगों की सारगर्भित रचनाओं को लेकर कवि सिद्धेश्वर ने समकालीन संदर्भों को बहुत ही शिद्दत के साथ अपनी नई किताब "काव्य कलश" में उकेरा है। साहित्यिक संस्था "भारतीय युवा साहित्यकार परिषद" और राजेंद्र नगर टर्मिनल स्टेशन राजभाषा कार्यान्वयन समिति के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित लघु पुस्तक "काव्य कलश" का लोकार्पण करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार भगवती प्रसाद दिवेदी ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किए।
समारोह के आरंभ में सचिव मो, नसीम अख्तर ने स्वागत भाषण के दौरान कहा कि कम पृष्ठों में अधिक सामग्री को संजोना सिद्धेश्वर जी की कलात्मक सूझ-बूझ है।
"*चल करें फूलों की खेती, सुगंधित मन प्राण हो ।
सुवासित कण-कण धरा सब के लिए वरदान हो
*सिंचाई हो स्नेह की और खाद होवे प्रीत की
नेह के छिड़काव पर खेती हो उत्तम गीत के
सांस के अंतिम शिखर तक भाव में कल्याण हो!
*सब में हो सद्भावना तो एकता का भाव हो
प्यार के खलिहान में तिल भर भी न दुर्भाव हो
कि अब जो बोएँ बीज उसमें संतुलित सम्मान हो!
*शास्त्रीयता हो हरी साहित्य की हर उपज में
जैसे पंखुड़ियाँ सजी होती हैं नीले जलद में
परागों में शब्द के तुलसी भी हों रसखान हो!
आदर्श, नैतिकता, प्रतिभा न तो मानवता है बहुत कुछ
देश को लूटने वालों की चर्चा है बहुत कुछ
न जाति, न धर्म, न आबरू, न शरम
पेट के लिए रोटी का टुकड़ा है बहुत कुछ!"
"रहे शादाब हर दम ये चमन अपना
रहे शादां हमेशा ये वतन अपना
न आए आंच अज़मत पर कभी उसकी
न हो नापाक फिर ग॓ग व जमन अपना "
"हाथ में जब सभी के ही पत्थर रहे
किस तरह सलामत कोई सर रहे !"
"नदी बदल लेती है धारा
रास्ता खुद चुन लेती है अपने बहाव का
इंसान बदल लेता है है वस्त्र
नहीं बदल पाता है / अपने स्वभाव को "
"गगन में उड़ने दो
एक कर्मण्य पुरुष को कार्य में ही आनंद आता है सो कार्यालय का कार्यकाल समाप्त हो जाने का अहसास तक नहीं होता। पूर्व में अन्य कवियों द्वारा पढ़ी गई रचनाओं पर अपनी संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए इस गोष्ठी के अध्यक्ष भगवती प्रसाद द्विवेदी कहते हैं-
"समझ में कुछ भी ना आया, कब रिटायर हो गए!
फुदकती आंगन की चिड़ईं मैं उड़ाने भर गया था !"
आलेख - मो. नसीम अख्तर / घनश्याम
छायाचित्र सौजन्य - घनश्याम
प्रस्तुति - हेमन्त दास 'हिम'/ सिद्धेश्वर
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल - editorbejodindia@gmail.com
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Wednesday, 5 February 2020
कथाकार हरिवंश नारायण और उनका रचनाकर्म / भगवती प्रसाद द्विवेदी
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| व्याख्यान कर्ता - भगवती प्रसाद द्विवेदी |































































