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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbiharidhamaka@yahoo.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Tuesday, 20 November 2018

बिहार सरकार के उर्दू निदेशालय द्वारा संचालित उर्दू सिखाने का साठ कार्यदिवसीय कार्यक्रम - सितम्बर 2018 से संचालित बीच

साठ दिनों में सरकारी खर्चे पर ऊर्दू सिखानेवाले जादूगर
(इस कार्यक्रम से जुड़े सारे लोग कृपया नीचे दिया गया नोट अवश्य पढें) 



क्या आपने कभी एक ही राज्य सरकार के अंतर्गत कार्यरत भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.)  के उच्च अधिकारी, आरक्षी (कॉन्स्टेबल) और लिपिक को एक साथ कुर्सी पर बैठकर बिल्कुल एक समान कोई कक्षा में प्रशिक्षण लेते देखा है? .. और वह भी बिल्कुल अपनी मर्जी  से बिना किसी प्रकार की सरकारी आदेश की बाध्यता के?? तो जनाब, जान लीजिए ये नजारा आपको देखने को मिलता है भारत ही नहीं विश्व में सम-भाव का प्रतिमान स्थापित करनेवाले अद्भुत प्रांत बिहार की राजधानी पटना में. यहाँ अवस्थित उर्दू निदेशालय की प्रशिक्षणशाला में. कोई जबर्दस्ती नहीं है. जिन्हें मन करे सीखें जिन्हें नहीं मन करे कक्षा में नामांकन नहीं कराएँ. लेकिन हरदिल अजीज़ मो. नूर आलम जैसे प्रशिक्षक और उर्दू निदेशालय के प्रतिबद्ध निदेशक इम्तियाज क़रीमी साहब का जज़्बा है कि बिहार सरकार के कर्मचारियों, शिक्षकों और अन्य नागरिकों को इन कक्षाओं  में खींच लाता है. 

जिन्होंने पूरी ज़िंदगी अब तक अलिफ,बे,पे... (उर्दू के शुरुआती अक्षर)  नहीं पढ़े आज वो पचास से अधिक उम्र में इन  गुणी प्रशिक्षकों के कमाल से धड़ाधड़ उर्दू के अखबार पढ़ने लगे हैं. महज साठ दोनों में एक भाषा के निरक्षरों को उसके माध्यमिक स्तर तक का पारंगत बना देना एक जादू नहीं तो और क्या है!  बिहार सरकार भी कम नहीं है अपनी दूसरी राजभाषा उर्दू का प्रचार प्रसार करने वाले इस कदम में. कोई शुल्क नहीं, कोई कागजी अर्हता नहीं. बस आइये और नामांकन कराइये. कुछ दिन पढ़ लेने के बाद मुफ्त में क़िताबें भी मिलती हैं. उर्दू सीखने हेतु सच्चे प्रशिक्षुकों को चाय और नाश्ते का भी प्रबंध है प्रतिदिन और वो भी बिना किसी शुल्क के.

पिछले बैच में प्रशिक्षण लेने वालों में नामचीन लेखक नीलांशु रंजन, अत्यंत लोकप्रिय शायर समीर परिमल आदि रहे हैं और वर्तमान बैच में भी एक से बढ़ के एक हैं. अति लोकप्रिय पुराने फिल्मी गानों को सुनकर उर्दू में लिखवाना और शेरो-शायरी के साथ साथ छोटा-मोटा मुशायरा आयोजित होते रहना इस कक्षा को और भी रोचक बना देता है जिससे इसके छात्र यहाँ समय से पहले पहुँचने को बेताब रहते हैं.

प्रशिक्षक मो. नूर आलम बताते हैं कि उर्दू सीखने का सबस बड़ा फायदा यह है कि हमें हिंदी का शुद्ध उच्चारण करने की क्षमता और बढ़ जाती है. तालव्य 'श', दन्त्य 'स' के साथ साथ हम नुख़्ते का उच्चारण करना भी सीख लेते हैं.  वे आगे बताते हैं कि उर्दू भाषा हिंदी के बिना अधूरी है और उसी प्रकार हिंदी भाषा में समाविष्ट अभिन्न रूप से प्रचलित अनेक शब्द अरबी-फारसी अर्थात उर्दू के हैं. उर्दू और हिंदी का चोली दामन का साथ है या यूँ कहें कि उनमें अन्योनाश्रय सम्बंध है. भारतीय गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रबलीकरण में उर्दू का प्रसार बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकता है.

उर्दू निदेशालय के निदेशक जनाब इम्तियास करीमी कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम उसी तरह से एक ही संस्कृति के दो नाम हैं जैसे कि हिंदुस्तानी भाषा को कुछ लोग हिंदी तो कुछ लोग उर्दू के नाम से जानते हैं जबकि दोनो एक ही भाषा है.  जिस तरह से भारतीय सिनेमा में प्रयुक्त भाषा दरअसल उर्दू होती है लेकिन उसे हिंदी के नाम से जाना जाता है उसी तरह से भारतीय हिंदू और  मुसलमान दोनो के सामाजिक व्यवहार और  व्यक्तिगत एवं पारिवारिक धारणाएँ बिल्कुल एक समान हैं मात्र एक ही अंतर है कि एक मंदिर जाता है और दूसरा मस्ज़िद. जब हम हर चीज में समान ही हैं तो फिर लड़ना किस बात का? क्यों न एक दूसरे में झूठमूठ की कमियाँ बताने की बजाय हम सभी अपने गौरवशाली देश को इस दुनिया में एक विकसित देश के रूप में तब्दील करने पर ध्यान दें, 

निदेशालय के सारे कर्मचारी और अधिकारियों में यही ज़ुनून है कि किस तरह से उर्दू का प्रचार प्रसार अधिक से अधिक किया जाय जिससे हमारे बीच की आपसी दूरी कमतर होती चली जाए. 

चाहे स्त्री हों या पुरुष, चाहे युवा हों या प्रौढ़ सभी पर्याप्त संख्या में इसमें पूरी रूचि  से प्रशिक्षण ले रहे हैं और उर्दू में अपनी व्यक्तिगत प्रगति से संतुष्ट और उत्सहित हैं. निश्चित रूप से उर्दू निदेशालय का उर्दू प्रशिक्षण का यह कार्यक्रम काबिले-तारीफ है जिसकी मुक्तकंठ प्रशंसा की जानी चाहिए. 
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आलेख- हेमन्त दास 'हिम' / लता प्रासर
छायाचित्र - बिनय कुमार
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आईडी - editorbiharidhamaka@yahoo.com
नोट- इस कक्षा के तमाम  स्टाफ और अधिकारी और विद्यार्थी अपने चित्र के साथ अपना परिचय देते हुए कक्षा के बारे में अपने विचार हमें ईमेल से भेजें ऊपर दिये गए ईमेल आइडी पर. उन्हें अवश्य प्रकाशित किया जाएगा. 


















Monday, 19 November 2018

'आखर' द्वारा उषाकिरण खान से बातचीत 16.11.2018 को पटना में सम्पन्न

विचारधारा से बंधकर लिखना मेरे लिए मुश्किल


मिथिला की महिला पहले से ही शिक्षा और कला को लेकर सजग है, जिसका उदाहरण मिथिला पेंटिंग है। ये बातें हिंदी मैथिली के प्रसिद्ध गद्यकार पद्मश्री उषाकिरण खान ने प्रभा खेतान फाउंडेशन, मसि इंक द्वारा आयोजित एंव श्री सीमेंट द्वारा प्रायोजित आखर नामक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान कही। मैथिली कवि और पत्रकार किशोर केशव से बातचीत में मैथिली भाषा साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश पड़ा। 36 पुस्तक प्रकाशित जिसमें से हिंदी की 20 और मैथिली की 16 पुस्तकें प्रकाशित है एंव 250 कथा निबन्ध, संस्मरण विभिन्न पत्र, पत्रिकाओं में छपा हुआ है। 

इनकी पहली रचना 18 वर्ष की उम्र में हुई । इन्होंने कविता से साहित्य लेखन में प्रवेश किया । 1976 में पहली उपन्यास अनुत्तरित प्रश्न का प्रकाशन हुआ। इनके लेखनी में गांव के कथा का प्रभाव ज्यादा है। पूर्ववर्ती लेखक में बंगला के शरतचन्द्र और हिंदी मैथिली के नागार्जुन यात्री का आंशिक प्रभाव देखने को मिलता है। पूरे भारत मे उषाकिरण खान पर कई छात्रों ने पीएचडी किया है जिसमें में से चार छात्र दक्षिण भारत के हैं। मैथिली में पहली कथा मनमोहन रे दरभंगा के परिवेश पे लिखा गया है। इनकी दूसरी उपन्यास हसीना मंजिल भारत पाकिस्तान और् बांग्लादेश के गठन की कथा है जो मिथिला के लहेरी समाज पर लिखा गया था।। डॉ खान के उपन्यास पर इतिहास का भी प्रभाव देखने को मिलता है। भामती पुस्तक पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि वाचस्पति मिश्र अपने पत्नी के पति होने का परिचय बोध कराते हैं। उनके कहानियों में पीड़ा और चिंतन का भी बोध होता है।

मैथिली स्त्री के उत्थान पर पंचायती राज में महिलाओं की तरक्की हुई, लड़कियां घर से निकलकर स्कूल, कॉलेज तक पहुंची। 

मैथिली में समीक्षा और आलोचना की काफी कमी है। विचारधारा के बारे में उन्होंने कहते हुए कहा कि विचारधारा से बंधकर लिखना मेरे लिए मुश्किल है। मैं किसी भी गुटबाजी से परहेज करती हूं। मैथिली उपन्यासकार में अपनी पसंद बताते हुए उन्होंने कहा कि हेतुकर झा, मधुकांत झा, और आशा मिश्र मेरे प्रिय लेखक है। 

पोखर रजोखिर के समर्पण में उन्होंने पाँच नए लेखकों को नाम दिया तथा उन्होंने कहा कि यही लोग अब साहित्य को आगे ले जाएंगे।

इस कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन मसि इंक की संस्थापक और निदेशक आराधना प्रधान ने किया। इस कार्यक्रम में उपन्यासकार रत्नेश्वर सिंह, धीरेंद्र कुमार झा, भैरवलाल दास, जितेंद्र वर्मा, शिव कुमार मिश्रा, शाहनवाज खान आदि लोग उपस्थित थे।
......
आलेख - सत्यम
छायाचित्र- आखर
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल आइडी- editorbiharidhamaka@yahoo.com
 





लेख्य मंजूषा द्वारा आयोजित कवि गोष्ठी 18.11.2018 को पटना में सम्पन्न

मोहब्बत में सियासत मत करो जनाब


[जिनके चित्र छुटे हैं. वो ईमेल से (editorbiharidhamaka@yahoo.com)  अथवा यहाँ कमेंट में दें नाम के साथ जिन्हें आयोजक की स्वीकृति मिलने पर सम्मिलित किया जाएगा. धन्यवाद.]

हम कविता के लिए कलम उठा पाते हैं क्योंकि किसी ने अपने हाथों में बंदूक उठाये रखकर दिनरात हमारे सीमाओं को सुरक्षित रखा है. ये फौजी भी हमारी और आपकी तरह इंसान है जिनके सीने की धड़कनें भी तेज होती हैं किसी प्रेमिका के लिए और जिसकी आँखें भी नम हो आती हैं किसी माँ के आँचल को याद करते हुए. ऐसे परम पुनीत कार्य करने वाले प्रणम्य फौजियों को मंच पर बिठाकर उनके सम्मान में कवि गोष्ठी आयोजित की गई 16.11.2018 को पटना के इंस्टीच्यूशन ऑफ इंजीनियर्स के भवन में. कवयित्रियों की भागीदारी कवियों से भी अधिक थी और कुछ वैयाकरण सम्बन्धी त्रुटियों के बावजूद सबसे उल्लेखनीय बात यह साबित करना रहा कि कलम उठाना उन्हें भी अच्छी तरह मालूम है जिन्होंने अपने हाथ परिवार और बच्चों के भविष्य के नव-सृजन में पूरे मनोयोग से लगाये रखा है. 

कई दिग्गज रचनाकार और शायर भी उपस्थित थे किंतु युवा स्वर बहुतायत में दिखे जिनमें पुरुष और स्थियाँ दोनो शामिल थे. पढ़ी गई रचनाओं की झलकी प्रस्तुत है- 

समीर परिमल-
गर मुहब्बत जवान हो जाए / ये ज़मीं आसमान हो जाए बन गया मैं अज़ान मस्जिद की / तू भी मुरली की तान हो जाए

भगवती प्रसाद द्विवेदी-
उनका जाना / महज एक जीवन का अंत नहीं था
विरह विदग्धा थी शकुंतला / पर दुष्यंत नहीं था

नसीम अख्तर -
वक्त के साँचे में ढलते जाइये / वरना अपने हाथ मलते जाइये
ज़िंदा रहना है अगर इस दौर में / ज़िंदगी का रुख बदलते जाइये

विभा रानी श्रीवास्तव-
मधुयामिनी / संकेतक रौशनी / पर्दे के पास (हाइकू-1)
दोस्ती की हद / खल की मजबूरी / हद में रहे (हाइकू-2)

स्वाति सिंह-
शुष्क है मौसम शहर / सूखा हर शज़र है 
चंद सफों पर जो लिखी थी कविता 
उन्हीं को पढ़ कर आँखें तर है

सुनील कुमार-
आशिकों में जिसे शुमार मिला / शख्स ज़ख्मी वो तार तार मिला
शाख पर फूट आया फिर कोंपल / गुलफ़िशानी का ऐतबार मिला

हेमन्त दास 'हिम' -
तुम आए तो ऐसा लगा / धूप में शीतल पवन बहा
पत्ते पत्ते फूल व खुशबू / प्यारा प्यारा हर लम्हा

पीयूष पराशर (वायुसेना) , निवास- गाज़ीपुर -
होऊँ जब कुर्बान वतन की राहों में 
तोड़ूँ मैं ये दम धरती माँ की बाहों में

विशाल नारायण (भारतीय नौसेना)-
तेरे आशीष की आस लिए मैं / बापू बापू रोज पुकारूँ
जाने किन राहों में मिलोगे / हर राह मैं रोज निहारूँ

डॉ. सतीशराज पुस्करणा -
आज के साधु /  माँगते चलें भीख 
नाता नहीं है / वेद से, पुराण से 
क्या देंगे कोई सीख

विभूति कुमार -
दिलो-ज़ाँ दे चुके हैं इस मुहब्बत में हजारों
मैं इससे बेहतर नज़राना ढूँढता हूँ

अमीर हमजा-
मैं हूँ नादान मुझे नादान रहने दो / सियासत से दूर गिरेबान रहने दो
मोहब्बत में सियासत मत करो जनाब / हमारे बीच अमन का पैगाम रहने दो

संजय कुमार सिंह -
आज़ादी के बाद किसी ने पूछा भारत माँ से / सब मना रहे जश्ने- आजादी तू उदास क्यो
खुशियाँ फैली है फिज़ाओं में / तुम निराश क्यों

मधुरेश नारायण-
देखने वालों को दिखता है ये सारा मंज़र / कहीं पर रात होती है कहीं पर सुबह होती है
क्यूँ बनाया इंसा को ये रब ही जानता है / उससे चलती है दुनिया ये वो भी मानता है

प्रतिमा सिन्हा-
ऐसे ना मिलूंगी कभी / कि तुम जुनून ठानो
तुम साजिशें रचो / कई दिल दुखाओ

कुंदन आनंद-
वो महाभोगी नहीं देते / मातृभूमि को प्यार 
प्रिय की जंघाओं पर जिनका / बसता है संसार

नूतन सिन्हा-
नदी की धारा बहती है 
बहती है कुछ कहती है

शाम्भवी-
आज खामोश हूँ फिर भी बोल रही हूँ
आज उदास हूँ फिर भी हँस रही हूँ

शुभांगी-
वो कहते हैं मैं उनकी परचाई सी दिखती हूँ
माथे के ललाट से लेकर पैरों की उँगली तक 
अपने पिता से मिलती हूँ

कमला अग्रवाल-,
एक दिन मैंए पूछा ज़िंदगी से / ज़िंदगी तू क्या है
तू खुशी है या तू है ग़मों का सागर

संगीता गोविल-
चलते चलल्ते छोप में थक गए हैं पाँव 
ढूँढते हैं कहीं मिल जाए थोड़ी सी छाँव

सुबोध सिन्हा-
तमाम उम्र मैं हैरान,परेशान हलकान सा / तो कभी लहुलुहान सा बना  रहा
मानो मुसलमानों के हाथों में गीता / तो कभी हिंदुओं के हाथों में कुरान बना रहा

सरोज तिवारी-
जब तक दम में दम मेरे / प्राणों से प्यारे वतन मेरे
हो जायें तुझपे हम कुरबान / यही तो है अरमान

ईशाकी सरकार-
न गिरने का मलाल हो / न उड़ने पर धमाल हो
कदम उठे तो चल पड़े / रुके कदम पर मुड़े नहीं

राजकांता राज-
जब वो पहली बार मिले / हाय हेलो मुझसे बोले
हेलो सुन मुझे गुस्सा आया / लेकिन मन ही मन मुस्काया

रंगना सिंह कल्पना-
साँय साँय करते हुए वन में / थिरकते हुए पत्तों के बीच
एक दूजे से लिपटी हुई लगाएँ / दूर कहीं से शेर की दहाड़

मीनू झा- 
जन्म का आधार तुम्ही हो / मेरा पहला प्यार तुम्ही हो
होंठ लगे जो श्रोत प्र अमृत / उष्मा थी जिस गोद सृजित
माँ वो तुम्हीं तो हो

अजीत कुमार-
मोहब्बत में इक उसूल है अपना / जो है पहली वही आखरी अपनी
माँ रोज नजर उतारती है / है उसकी भी डाक्टरी अपनी

शाईस्ता अंजुम-
अंधेरा है कैसा तुम्हारा खत पढ़ूँ / लिफाफे में जरा रौशनी भेज देते
चलो चाँद का किरदार अपना लें हम / दाग अपने पास रख लें 

शशि कांत श्रीवास्तव-
कैसा ज़माना आ गया / कैसा ज़माना आ गया
रोटी मँहगी हो गई / टेलीफोन सस्ता हो गया

प्रभात कुमार धवन-
ओ कवि / तब तुम नहीं रहोगे
फिर भी तुम्हें जीवन देगी / तुम्हारी कविता

सुशांत सिंह- 
बिक तो जाएंगे हम भी / कोई खरीदार तो मिले
दिल हम भी लगा लेंगे / कोई दिलदार तो मिले

एकता कुमारी- 
अब मुझे भी तुम्हारी जरूरत नहीं / हर दिन टूटते बिखरते सपने
हर वक्त समेटने में गुजरता वक्त / बिखरते टूटते ख्वाब

प्रेमलता सिंह-
काश! हम सइर्फ इंसान होते / ना ही कोई धर्म की दीवार होती
ना ही कोई जाति का बंधन होता / आपस में भाईचारा होता

मधु रानी-
ड्योढ़ी घर की / स्वागत कर रही 
खुले दिल से / अपनी बाँहें फैलाए
.......
प्रस्तुति- हेमन्त दास 'हिम'
छायाचित्र- बिहारी धमाका 
प्रतिक्रिया हेतु ईमेल- editorbiharidhamaka@yahoo.com