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बिहार, भारत की कला, संस्कृति और साहित्य.......Art, Culture and Literature of Bihar, India ..... E-mail: editorbejodindia@yahoo.com / अपनी सामग्री को ब्लॉग से डाउनलोड कर सुरक्षित कर लें.

# DAILY QUOTE # -"हर भले आदमी की एक रेल होती है/ जो माँ के घर तक जाती है/ सीटी बजाती हुई / धुआँ उड़ाती हुई"/ Every good man has a rail / Which goes to his mother / Blowing wistles / Making smokes [– आलोक धन्वा, विख्यात कवि की एक पूर्ण कविता / A full poem by Alok Dhanwa, Renowned poet]

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Thursday, 21 September 2017

दूरदर्शन-बिहार का अनोखा धारावाहिक 'बलचनमा'- नागार्जुन के उपन्यास पर आधारित

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धूम मची है 'बलचनमा' सीरियल की 
सोम, मंगल, बुध, वृहस्पति और शुक्र को 9.30 सायं
( दूरदर्शन बिहार के टीवी सीरियल पर हेमन्त दास 'हिम' की रिपोर्ट)

"कबहू है बालचन्द्र वो, कबहू है बलचनमा
सीधा साधा मानुस है, कछु तीन पाँच नहिं मन मा"


इन दिनों अगर आप अपने किसी प्रिय को शाम मे फोन लगायें और उनका जवाब अनमना सा आये तो घबराइये नहीं. नहीं, नहीं उनका प्यार आपके लिए बिल्कुल वैसा ही है जैसा पहले था बस इतना है कि उनके जीवन में इन दिनों एक और नई चीज आ गई है जिसे वो बिल्कुल 'मिस' करना नहीं चाहते हैं. वह चीज है दूरदर्शन बिहार पर सप्ताह में 8.30 बजे सायंकाल प्रसारित होनेवाला धारावाहिक- 'बलचनमा'. हिंदी के कालजयी साहित्यकार नागार्जुन के उपन्यास पर आधारित इस सीरियल ने पूरे बिहार और भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में रह रहे भारतीयों में हलचल मचा दी है. स्थिति यह है कि दूसरे चैनल वाले भी दूरदर्शन-बिहार की ओर हसरत भरी नजर से देख रहे हैं कि कैसे उन्होंने ऐसा सीरियल बना लिया है जो बिहार के ग्रामीण जीवन की नसों को इतनी कस के पकड़ा हुआ है. इस धारावाहिक में शोषण है, पीड़ा है, हताशा है लेकिन वो सब इतने सजीव हैं मानो वह आप ही के जीवन में बीत रहा हो. साथ ही संजीवनी के समान जिजीविषा और सहज परिहास की वह अंदुरूनी लय भी है जो तमाम निराशाओं के बीच भी जीवन को रोचक बनाये रखता है. बाकि विशेष कहना बेमानी होगी. इसे देखनेवाला ही जान सकता है कि इसमें क्या कुछ है! 

15 सितम्बर, 2017 से इसका प्रसारण शुरू हुआ है और तभी से दूरदर्शन बिहार के देखनेवालों का आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. देखना है, लोकप्रियता का यह चढ़ाव कहाँ पर जाकर रुकता है. दूरदशन बिहार को नागार्जुन जैसे महान साहित्यकार की इस अनमोल कृति को इतनी संजीदगी से दिखाने हेतु बधाई दी जानी चाहिए. यह सिर्फ बिहार की ही नहीं उस वैश्विक भाषा हिन्दी की भी सेवा है जो इन दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त करने के लिए संघर्षरत है.

मशहूर गायक उदित नारायण ने इस सीरियल के गीत को आवाज दी है और संगीत सीताराम सिंह का है. निर्देशन दूरदर्शन बिहार के केंद्र निदेशक पुरुषोत्तम नारायण सिंह हैं. इसमें बिहार के लगभग सौ प्रवीण कलाकर अपना जौहर दिखा रहे हैं जिनमें एक-एक का चयन कठिन ऑडिशन में उत्तीर्ण होने पर ही हुआ है. 'बलचनमा' की भूमिका में बुलू  कुमार हैं और एक अन्य महत्वपूर्ण भूमिका में रूबी खातून भी शामिल हैं. पटकथा कुणाल जी ने लिखी है. शीर्षक गीत (टाइटल सौंग) के लेखक हैं पुरुषोत्तम नारायण सिंह.
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इस रिपोर्ट के लेखक- हेमन्त दास 'हिम'
आप अपनी प्रतिक्रिया ईमेल से भेज सकते हैं जिसके लिए आईडी है- hemantdas_2001@yahoo.com
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(नीचे प्रस्तुत है 'बलचनमा' उपन्यास का एक अंश)
आखिर बलचनमा पुन: अपना गॉंव लौटा।बहन रेबनी पंद्रहवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी थी।वह चाहता था कि रेबनी का गौना हो जाय,लेकिन मॉं नहीं चाहती थी।मॉं का मानना था कि दो-तीन साल और नइहर में खाए-खेले,फिर तो जिनगी भर गिरहस्ती का पहाड़ सिर पर ढोना ही है।बलचनमा जमींदारों के व्यवहार के प्रति शंकालु था।जमींदारों के प्रति उसकी राय थी-” बड़े लुच्चे होते हैं ये लोग।असूल-तहसील का काम गुमस्ता-बराहिल के हवाले,घर-गिरस्ती की देख-रेख छुटभइयों के हवाले,सेवा-टहल का काम बहिया-खबास के हवाले।……..किसी की लडकी सयानी हुई नहीं कि निशाना साधने लग जाते हैं।”(पृ.१६६) हालत यह थी कि गौना होकर कोई नई-नवेली किसी के घर आती तो इन लुच्चों की ऑंख उसकी घूँघट के इर्द-गिर्द मँडराया करती।कई बार तो ऐसा होता कि जिसपर बाप बेताब हो उठता उसी पर बेटा फ़िदा।लेकिन बलचनमा की मॉं की राय कुछ अलग थी।मॉं कहती-“जिन लोगों का जूठन खाकर तू बड़ा हुआ है,उन्हीं के बारे में ऐसी-ऐसी बात सोचता है? अधरम होगा रे बलचनमा,अधरम! गोसैंया नाराज़ हो जायेंगे।सहर जाकर यही इलम सीख आया है? बूढ़े-पुराने भी तो तेरे इन्हीं लोगों का जूठन खाकर ,फेरन-फारन पहन-ओढ़कर अपनी ज़िंनगी गुदस्त कर गए।इतना उड़ॉंत मत बन बेटा।”(पृ. १६७)मॉं भले जमींदार को ईश्वर माने ,लेकिन उसकी निगाह में तो पाप भरा था।एकदम आखिर छोटे मालिक ने रेबनी के साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश की।रेबनी किसी तरह से जान बचाकर भाग गई।छोटे मालिक बेशर्मी पर उतर आये।बलचनमा की मॉं को पलंग से बॉंध दिया और गुर्राकर कहा-” बोल साली,अपनी बेटी को यहॉं ले आयेगी या नहीं?”मॉं टस से मस नहीं हुई।उसकी बड़ी पिटाई हुई।सारा दर्द और सारी पीड़ा पी गयी,लेकिन बेटी को लाना स्वीकार नहीं किया।मालिक ने बलचनमा पर चोरी का इल्ज़ाम लगाते हुए थाने में रिपोर्ट कर दी।बलचनमा ने अपनी ओर से पक्का किया कि क़ैद काटूँगा ,फॉंसी चढ़ूँगा,गॉंव से उजड़ जाऊँगा ,लेकिन बहन को रखैल कभी नहीं बनने दूँगा।

बलचनमा धारावाहिक में दुल्हन को पालकी में ले जाने की तैयारी

बलचनमा धारावाहिक के कलाकार

बलचनमा सीरियल की सूटिंग का दृश्य

जहाँगीर खान, रूबी खातून और अन्य कलाकार

बुलू कुमार, रूबी खातून और अन्य कलाकार

बुलू कुमार, रूबी खातून और अन्य कलाकार
बुलू कुमार और अन्य कलाकार


पी.एन.सिंह निर्देशन करते हुए

पी.एन.सिंह निर्देशन करते हुए





बलचनमा की भूमिका में बुलू कुमार

निर्देशक पुरुषोत्तम एन. सिंह